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कपालमोचन : तीनों लोकों के पाप से यहां मिलती है मुक्ति
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पुराणों के अनुसार कपाल मोचन तीर्थ तीनों लोकों के पाप से मुक्ति दिलाने वाला स्थल है। इसके पवित्र सरोवरों में स्नान करने से ब्रह्म हत्या जैसे महापाप का निवारण होता है। आदि काल में कार्तिक पूर्णिमा की अर्धरात्रि के समय ही भगवान शिव की ब्रह्म कपाली इसी कपाल मोचन सरोवर में स्नान करने से दूर हुई थी। प्राचीनकाल से ही इस भू-भाग पर पांच तीर्थ कपालेश्वर महादेव(कलेसर) और चंडेश्वर महादेव(कालाआंब)स्थित है, इनके मध्य 360 यज्ञ कुंड हैं। इनमें कपालेश्वर तीर्थ प्रमुख एवं केंद्र बिंदु है। राजा परीक्षित के शासन काल में कलयुग के आगमन पर ऋषि मुनियों ने एक महायज्ञ का आयोजन किया।
इस यज्ञ के सार से एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सरस्वती रखा गया। ब्रह्म की अपनी पुत्री के प्रति कुदृष्टि हो गई। सरस्वती को इसका आभास होने पर वह अपनी सुरक्षा के लिए शिवालिक की पहाड़ियों में आदि बद्री के स्थान पर तपस्या लीन भगवान शिव की शरण में चली गई। ब्रह्मा भी सरस्वती को ढूंढते ठीक शिव की तपस्या स्थली पर पहुंच गए और उन्होंने सरस्वती को उन्हें सौंपने का आग्रह किया। परंतु भगवान शिव के कहने पर सरस्वती आकाश की और चली गई तो ब्रह्म का पांचवां मुख ऊपर की ओर प्रकट हो गया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाभारत के रचयिता महर्षि पाराशर के पुत्र भगवान वेद व्यास की कर्म भूमि भी बिलासपुर रही है। उन्हीं के विश्राम स्थान का नाम व्यास आश्रम पड़ा। समय बीतने के साथ बकरवाला और कुरडी खेडा गांव के लोग व्यास आश्रम के साथ रहने लगे, जिससे इस स्थान का नाम व्यासपुर पड़ा। जो कलांतर में बिलासपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ । व्यास आश्रम के पूर्व में एक मील की दूरी पर तीर्थ गंगा सागर(चंदाखेडी तीर्थ), रामसर (पीरूवाला तीर्थ) और श्रीकुंड तीर्थ एवं गंगा मंदिर जगाधरी स्थित है। व्यास आश्रम के पश्चिम में सरस्वती मंदिर है, जबकि उत्तर में तीर्थ कपाल मोचन स्थित है । इस पवित्र धाम में सोम सरोवर के अतिरिक्त ऋण मोचन, धनौरा रोड पर पूर्व दिशा की और सूर्यकुंड स्थित है। प्राचीन समय में यहां चंद्रकुंड होने की मान्यता भी है, इस समय इसके अवशेष नहीं है।
कपाल मोचन तीर्थ पर राम मंदिर के बारे में अकबर-ए-आजम के शासनकाल की भी एक कथा है। एक दिन अकबर साम्राज्य के परगना साढौरा के काजी फिमूदीन जोकि निसंतान एवं वृद्घ थे, शिकार खेलते हुए पानी की तलाश में यहां आए तो उन्होंने स्वयं को निसंतान होने की बात कही एवं संतान की कामना की । इस पर केशवदास ने उन्हें एक वर्ष बाद अपनी बेगम सहित आने को कहा। इसी अवधि में काजी के घर एक लड़का पैदा हुआ और एक वर्ष बाद काजी ने सपरिवार यहां आकर केशवदास को 1300 बीघा जमीन देकर भगवान श्रीराम का तीन मंजिला मंदिर बनवाया, जिसके ऊपर रोजाना चिराग जलाया जाता था।
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इस यज्ञ के सार से एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सरस्वती रखा गया। ब्रह्म की अपनी पुत्री के प्रति कुदृष्टि हो गई। सरस्वती को इसका आभास होने पर वह अपनी सुरक्षा के लिए शिवालिक की पहाड़ियों में आदि बद्री के स्थान पर तपस्या लीन भगवान शिव की शरण में चली गई। ब्रह्मा भी सरस्वती को ढूंढते ठीक शिव की तपस्या स्थली पर पहुंच गए और उन्होंने सरस्वती को उन्हें सौंपने का आग्रह किया। परंतु भगवान शिव के कहने पर सरस्वती आकाश की और चली गई तो ब्रह्म का पांचवां मुख ऊपर की ओर प्रकट हो गया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाभारत के रचयिता महर्षि पाराशर के पुत्र भगवान वेद व्यास की कर्म भूमि भी बिलासपुर रही है। उन्हीं के विश्राम स्थान का नाम व्यास आश्रम पड़ा। समय बीतने के साथ बकरवाला और कुरडी खेडा गांव के लोग व्यास आश्रम के साथ रहने लगे, जिससे इस स्थान का नाम व्यासपुर पड़ा। जो कलांतर में बिलासपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ । व्यास आश्रम के पूर्व में एक मील की दूरी पर तीर्थ गंगा सागर(चंदाखेडी तीर्थ), रामसर (पीरूवाला तीर्थ) और श्रीकुंड तीर्थ एवं गंगा मंदिर जगाधरी स्थित है। व्यास आश्रम के पश्चिम में सरस्वती मंदिर है, जबकि उत्तर में तीर्थ कपाल मोचन स्थित है । इस पवित्र धाम में सोम सरोवर के अतिरिक्त ऋण मोचन, धनौरा रोड पर पूर्व दिशा की और सूर्यकुंड स्थित है। प्राचीन समय में यहां चंद्रकुंड होने की मान्यता भी है, इस समय इसके अवशेष नहीं है।
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कपाल मोचन तीर्थ पर राम मंदिर के बारे में अकबर-ए-आजम के शासनकाल की भी एक कथा है। एक दिन अकबर साम्राज्य के परगना साढौरा के काजी फिमूदीन जोकि निसंतान एवं वृद्घ थे, शिकार खेलते हुए पानी की तलाश में यहां आए तो उन्होंने स्वयं को निसंतान होने की बात कही एवं संतान की कामना की । इस पर केशवदास ने उन्हें एक वर्ष बाद अपनी बेगम सहित आने को कहा। इसी अवधि में काजी के घर एक लड़का पैदा हुआ और एक वर्ष बाद काजी ने सपरिवार यहां आकर केशवदास को 1300 बीघा जमीन देकर भगवान श्रीराम का तीन मंजिला मंदिर बनवाया, जिसके ऊपर रोजाना चिराग जलाया जाता था।
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