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Yamuna Nagar News: ...यहां भगवान शिव स्वयं भू शिवलिंग के रूप में विराजमान
Tue, 05 Mar 2024 02:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Tue, 05 Mar 2024 02:29 AM IST
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नवाब खान
प्रतापनगर। जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर छछरौली-पांवटा नेशनल हाईवे पर गांव कलेसर में यमुना नदी किनारे बने श्री कालेश्वर महादेव मठ श्रद्धालुओं की आस्था केंद्र बना हुआ है। यह मठ चार राज्यों की सीमाओं से सटा हुआ है। कलेसर राष्ट्रीय उद्यान व यमुना के तट पर कालेश्वर महादेव मठ में भगवान शंकर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान है। उनके साथ मां पार्वती शक्ति स्वयंभू पिंडी के रूप में यहां स्थापित है। मंदिर में नवग्रह का विशाल मंदिर, त्रिवेणी वृक्ष, हजारों साल पुराना बरगद का पेड़ भी यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। सिद्ध पीठ श्रीकालेश्वर महादेव मंदिर शिवालिक पर्वत श्रृंखला एवं यमुना नदी के पश्चिम किनारे पर गांव कलेसर के साथ स्थित है।
यहां सिद्ध पीठ के बारे में मान्यता है कि इस स्थान पर कालका नाम के एक ऋषि रहा करते थे। उन्होंने इस स्थान को तप स्थली बनाकर सैकड़ों सालों तक यहां भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। जिससे भगवान प्रसन्न हाे गए और उन्होंने प्रकट होकर ऋषि को वर मांगने को कहा। उन्होंने प्रभु से निरंतर दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की और स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर यहां विराजमान रहने का वर मांगा। ऋषि कालका ने इस तपस्थली को पूजा स्थल के रूप में स्थापित कर दिया, जिसके चलते इस जगह का नाम कालेश्वर पड़ा। मंदिर की उत्तर दिशा में नवग्रह का विशाल मंदिर है, जिसकी गुंबद 121 फीट की है। मान्यता है कि यदि व्यक्ति सच्चे मन से यहां पर आराधना करता है तो जीवन पर पड़ने बाले ग्रह का असर कम हो जाता है। सिद्ध पीठ के उत्तर दिशा में त्रिवेणी वृक्ष स्थित है। पीपल, आंवला व वटवृक्ष विराजमान है। मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों को वनवास हुआ था। तब उन्होंने अपने वनवास के 13 वर्ष काटे थे। बाद में अज्ञातवास का 14वां वर्ष इसी क्षेत्र के आसपास बिताया गया।
साल 1933 में बनी कलेश्वर मठ संस्था
संस्था के वरिष्ठ सदस्य चौधरी बलबीर सिंह ने बताया कि साल 1933 में गांव कलेसर निवासी चौधरी मामराज ने मठ में अपनी जमीन देकर यहां पर भंडारा शुरू किया था, क्योंकि यहां से पहाड़ी रास्ते से होते हुए यमुना के साथ हिमाचल का रास्ता निकलता था। ऊबड़-खाबड़ कच्चा रास्ता व घना जंगल होने की वजह से यहां से निकलने वाले राहगीरों के लिए खाने और रहने का इंतजाम भी किया गया था। इनके प्रयासों से आज यह मठ एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के तौर पर विकसित हुआ है। उनके बाद महात्मा शंकर गिरी महाराज मठ के प्रधान बने। फिर स्वामी महानंद महाराज ने गद्दी संभाली। उनके बाद स्वामी देव मूर्ति जो कि योग शिक्षा में राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित भी हुए। वर्तमान में स्वामी शांतानंद महाराज कालेश्वर मठ की गद्दी पर विराजमान हैं।
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बड़ी हस्तियों आती हैं आशीर्वाद लेने
कालेश्वर महादेव मठ से राजनेताओं व बड़े अधिकारियों का भी खास लगाव रहा है। यहां पर साल 1979 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी यहां पहुंची। साल 1996, 97 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां पहुंचे थे। साल 2007 में राज्यपाल एआर किदवई व उत्तर प्रदेश के गवर्नर रहते हुए राज्यपाल सूरजभान यहां कई बार आए। मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल भी लगभग 22 साल पहले जब हरियाणा प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री होते हुए यहां पर अक्सर आते रहते थे। पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहते आईडी स्वामी, नवीन जिंदल, भूपेंद्र स्थित हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल के पुत्र प्रताप सिंह चौटाला समेत बड़ी संख्या में नेता यहां आशीर्वाद लेने आते हैं।
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प्रतापनगर। जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर छछरौली-पांवटा नेशनल हाईवे पर गांव कलेसर में यमुना नदी किनारे बने श्री कालेश्वर महादेव मठ श्रद्धालुओं की आस्था केंद्र बना हुआ है। यह मठ चार राज्यों की सीमाओं से सटा हुआ है। कलेसर राष्ट्रीय उद्यान व यमुना के तट पर कालेश्वर महादेव मठ में भगवान शंकर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान है। उनके साथ मां पार्वती शक्ति स्वयंभू पिंडी के रूप में यहां स्थापित है। मंदिर में नवग्रह का विशाल मंदिर, त्रिवेणी वृक्ष, हजारों साल पुराना बरगद का पेड़ भी यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। सिद्ध पीठ श्रीकालेश्वर महादेव मंदिर शिवालिक पर्वत श्रृंखला एवं यमुना नदी के पश्चिम किनारे पर गांव कलेसर के साथ स्थित है।
यहां सिद्ध पीठ के बारे में मान्यता है कि इस स्थान पर कालका नाम के एक ऋषि रहा करते थे। उन्होंने इस स्थान को तप स्थली बनाकर सैकड़ों सालों तक यहां भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। जिससे भगवान प्रसन्न हाे गए और उन्होंने प्रकट होकर ऋषि को वर मांगने को कहा। उन्होंने प्रभु से निरंतर दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की और स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर यहां विराजमान रहने का वर मांगा। ऋषि कालका ने इस तपस्थली को पूजा स्थल के रूप में स्थापित कर दिया, जिसके चलते इस जगह का नाम कालेश्वर पड़ा। मंदिर की उत्तर दिशा में नवग्रह का विशाल मंदिर है, जिसकी गुंबद 121 फीट की है। मान्यता है कि यदि व्यक्ति सच्चे मन से यहां पर आराधना करता है तो जीवन पर पड़ने बाले ग्रह का असर कम हो जाता है। सिद्ध पीठ के उत्तर दिशा में त्रिवेणी वृक्ष स्थित है। पीपल, आंवला व वटवृक्ष विराजमान है। मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों को वनवास हुआ था। तब उन्होंने अपने वनवास के 13 वर्ष काटे थे। बाद में अज्ञातवास का 14वां वर्ष इसी क्षेत्र के आसपास बिताया गया।
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साल 1933 में बनी कलेश्वर मठ संस्था
संस्था के वरिष्ठ सदस्य चौधरी बलबीर सिंह ने बताया कि साल 1933 में गांव कलेसर निवासी चौधरी मामराज ने मठ में अपनी जमीन देकर यहां पर भंडारा शुरू किया था, क्योंकि यहां से पहाड़ी रास्ते से होते हुए यमुना के साथ हिमाचल का रास्ता निकलता था। ऊबड़-खाबड़ कच्चा रास्ता व घना जंगल होने की वजह से यहां से निकलने वाले राहगीरों के लिए खाने और रहने का इंतजाम भी किया गया था। इनके प्रयासों से आज यह मठ एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के तौर पर विकसित हुआ है। उनके बाद महात्मा शंकर गिरी महाराज मठ के प्रधान बने। फिर स्वामी महानंद महाराज ने गद्दी संभाली। उनके बाद स्वामी देव मूर्ति जो कि योग शिक्षा में राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित भी हुए। वर्तमान में स्वामी शांतानंद महाराज कालेश्वर मठ की गद्दी पर विराजमान हैं।
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बड़ी हस्तियों आती हैं आशीर्वाद लेने
कालेश्वर महादेव मठ से राजनेताओं व बड़े अधिकारियों का भी खास लगाव रहा है। यहां पर साल 1979 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी यहां पहुंची। साल 1996, 97 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां पहुंचे थे। साल 2007 में राज्यपाल एआर किदवई व उत्तर प्रदेश के गवर्नर रहते हुए राज्यपाल सूरजभान यहां कई बार आए। मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल भी लगभग 22 साल पहले जब हरियाणा प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री होते हुए यहां पर अक्सर आते रहते थे। पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहते आईडी स्वामी, नवीन जिंदल, भूपेंद्र स्थित हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल के पुत्र प्रताप सिंह चौटाला समेत बड़ी संख्या में नेता यहां आशीर्वाद लेने आते हैं।