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Yamuna Nagar News: श्राद्ध पक्ष 17 से, मिलेगा पितृों का आशीर्वाद
Thu, 12 Sep 2024 03:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Thu, 12 Sep 2024 03:45 AM IST
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साढौरा। हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान, और अन्य धार्मिक क्रियाएं करते हैं। माना जाता है कि पितृपक्ष के दौरान हमारे पितृ, जो पितृलोक में निवास करते हैं, वो धरती पर आते हैं और उनके नाम से किए गए पूजा-पाठ, दान और तर्पण से उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस साल पितृपक्ष 17 सितंबर से दो अक्तूबर तक रहेगा। ये जानकारी गायत्री ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक पंडित रामराज कौशिक ने दी।
उन्होंने बताया कि पितृपक्ष 17 सितंबर से शुरू होने वाला है। लोग अपने पूर्वजों की तृप्ति के लिए भोजन और जल अर्पित करते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उन्हें दान-दक्षिणा देकर पितृ की आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं। यह भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि तक रहता है। पितृपक्ष के दौरान शुभ व मांगलिक कार्य जैसे कि शादी-विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन या नई चीजों की खरीदारी भी वर्जित होती है। इसमें केवल पितृ का श्राद्ध करने की परंपरा है। पितृपक्ष में तिथि अनुसार ही पितरों का श्राद्ध किया जाता है।
किस समय करना चाहिए श्राद्ध
शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में सुबह और शाम के समय देवी-देवताओं की पूजा होती है। जबकि दोपहर का समय पितृ को समर्पित होता है। इसलिए पितृ का श्राद्ध दोपहर के समय करना ही उत्तम होता है। पितृपक्ष में आप किसी भी तिथि पर दोपहर 12 बजे के बाद श्राद्धकर्म कर सकते हैं। इसके लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त सबसे अच्छे माने जाते हैं। इस दौरान पितरों का तर्पण करें, गरीब ब्राह्मणों को भोज कराएं, उन्हें दान-दक्षिणा दें तथा श्राद्ध के दिन कौवे, चींटी, गाय, कुत्ते को भोग लगाएं।
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पितृ पक्ष की श्राद्ध तिथिया
मंगलवार, 17 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध
बुधवार, 18 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध
वीरवार, 19 सितंबर- द्वितीय श्राद्ध
शुक्रवार, 20 सितंबर- तृतीय श्राद्ध
शनिवार, 21 सितंबर- चतुर्थ श्राद्ध
रविवार, 22 सितंबर- पंचम श्राद्ध
सोमवार, 23 सितंबर- षष्ठी श्राद्ध और सप्तमी श्राद्ध
मंगलवार, 24 सितंबर- अष्टमी श्राद्ध
बुधवार, 25 सितंबर, नवमी श्राद्ध
वीरवार, 26 सितंबर- दशमी श्राद्ध
शुक्रवार, 27 सितंबर- एकादशी श्राद्ध
शनिवार, 29 सितंबर- द्वादशी श्राद्ध
रविवार, 30 सितंबर- त्रयोदशी श्राद्ध
सोमवार, 1 अक्टूबर- चतुर्दशी श्राद्ध
मंगलवार, 2 अक्टूबर- सर्व
पितृ अमावस्या श्राद्ध।
रामराज कौशिक ने बताया की 28 सितंबर को किसी भी तिथि का श्राद्ध नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध केवल उन लोगों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु शस्त्र, विष या दुर्घटनाओं (अपमृत्यु) के कारण हुई हो, भले ही उनकी मृत्यु किसी अन्य तिथि पर हुई हो। चतुर्दशी तिथि के सामान्य मृत्यु वालों का श्राद्ध अमावस्या तिथि पर किया जाता है। पितृपक्ष के दौरान किए गए श्राद्ध और तर्पण से न केवल पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है, बल्कि यह हमारे जीवन को भी समृद्ध बनाता है। यह परंपरा हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती है और हमें यह याद दिलाती है कि हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद के बिना हमारा जीवन अधूरा है।
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उन्होंने बताया कि पितृपक्ष 17 सितंबर से शुरू होने वाला है। लोग अपने पूर्वजों की तृप्ति के लिए भोजन और जल अर्पित करते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उन्हें दान-दक्षिणा देकर पितृ की आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं। यह भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि तक रहता है। पितृपक्ष के दौरान शुभ व मांगलिक कार्य जैसे कि शादी-विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन या नई चीजों की खरीदारी भी वर्जित होती है। इसमें केवल पितृ का श्राद्ध करने की परंपरा है। पितृपक्ष में तिथि अनुसार ही पितरों का श्राद्ध किया जाता है।
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किस समय करना चाहिए श्राद्ध
शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में सुबह और शाम के समय देवी-देवताओं की पूजा होती है। जबकि दोपहर का समय पितृ को समर्पित होता है। इसलिए पितृ का श्राद्ध दोपहर के समय करना ही उत्तम होता है। पितृपक्ष में आप किसी भी तिथि पर दोपहर 12 बजे के बाद श्राद्धकर्म कर सकते हैं। इसके लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त सबसे अच्छे माने जाते हैं। इस दौरान पितरों का तर्पण करें, गरीब ब्राह्मणों को भोज कराएं, उन्हें दान-दक्षिणा दें तथा श्राद्ध के दिन कौवे, चींटी, गाय, कुत्ते को भोग लगाएं।
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पितृ पक्ष की श्राद्ध तिथिया
मंगलवार, 17 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध
बुधवार, 18 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध
वीरवार, 19 सितंबर- द्वितीय श्राद्ध
शुक्रवार, 20 सितंबर- तृतीय श्राद्ध
शनिवार, 21 सितंबर- चतुर्थ श्राद्ध
रविवार, 22 सितंबर- पंचम श्राद्ध
सोमवार, 23 सितंबर- षष्ठी श्राद्ध और सप्तमी श्राद्ध
मंगलवार, 24 सितंबर- अष्टमी श्राद्ध
बुधवार, 25 सितंबर, नवमी श्राद्ध
वीरवार, 26 सितंबर- दशमी श्राद्ध
शुक्रवार, 27 सितंबर- एकादशी श्राद्ध
शनिवार, 29 सितंबर- द्वादशी श्राद्ध
रविवार, 30 सितंबर- त्रयोदशी श्राद्ध
सोमवार, 1 अक्टूबर- चतुर्दशी श्राद्ध
मंगलवार, 2 अक्टूबर- सर्व
पितृ अमावस्या श्राद्ध।
रामराज कौशिक ने बताया की 28 सितंबर को किसी भी तिथि का श्राद्ध नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध केवल उन लोगों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु शस्त्र, विष या दुर्घटनाओं (अपमृत्यु) के कारण हुई हो, भले ही उनकी मृत्यु किसी अन्य तिथि पर हुई हो। चतुर्दशी तिथि के सामान्य मृत्यु वालों का श्राद्ध अमावस्या तिथि पर किया जाता है। पितृपक्ष के दौरान किए गए श्राद्ध और तर्पण से न केवल पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है, बल्कि यह हमारे जीवन को भी समृद्ध बनाता है। यह परंपरा हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती है और हमें यह याद दिलाती है कि हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद के बिना हमारा जीवन अधूरा है।