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महिला अस्पताल के लिए 71 साल पहले दान में मिला भवन बना खंडहर
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भवन की दीवार पर लगा शिला लेख।
- फोटो : Yamuna Nagar
साढौरा। बात 1951 की है। तब 71 साल पहले लाला इंद्रसेन अग्रवाल ने अपनी स्वर्गीय धर्मपत्नी तारावती की याद में मेन बाजार में महिला अस्पताल के भवन का निर्माण करवाया था। उसके बाद इस भवन को सरकार को दान कर दिया था, ताकि महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। उस दौरान यहां सुविधाएं मिलनी शुरू हो चुकी थीं, लेकिन 23 बरस पहले चिकित्सक और स्टॉफ के तबादले के बाद से इस अस्पताल में ताला लटक गया।
उल्लेखनीय है कि लाला इंद्रसेन ने महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का जो सपना देखा था वह स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता से अधूरा रह गया। स्वास्थ्य विभाग इस भवन की देखभाल नहीं कर सका। सरकार की इस अनदेखी के चलते अब अस्पताल का भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है। यहां बड़ी-बड़ी घास उग गई है। उधर इंद्रसेन के बेटे गोपाल अग्रवाल के मुताबिक उनके पिता इंद्रसेन द्वारा दान में दिए गए इस भवन की वर्तमान हालत से उनके परिवार को ठेस पहुंची है। चिकित्सालय न चलाने की सूरत में वे भवन वापस लेने की कार्रवाई करेंगे।
भवन की दीवार पर लगा शिलालेख साक्षी
मेन बाजार से सटी गली में खंडहर हो चुके इस भवन की दीवार पर लगा शिलालेख लाला इंद्रसेन अग्रवाल के दान की गवाही दे रहा है।
शिलालेख पर लिखा है कि कस्बे के दानी सज्जन लाला इंद्रसेन अग्रवाल ने 1951 में अपनी स्वर्गीय धर्मपत्नी तारावती की याद में इस भवन का निर्माण करवाया था। यह भी लिखा है कि इस भवन में उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता संत लाल की याद में स्त्रियों तथा बालकों के लिए धर्मार्थ औषधालय खोला है। इंद्रसेन के बेटे और शिमला में होटल व्यवसाय करने वाले गोपाल अग्रवाल ने बताया कि महिला अस्पताल खोलने के लिए यह भवन सरकार दान में दिया गया था। संयुक्त पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपी चंद भार्गव ने लाला इंद्रसेन की भावना का आदर करते हुए इस भवन में महिला अस्पताल खोलने की मंजूरी प्रदान देते हुए स्वयं इसका उद्घाटन किया था।
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1999 में हो गए सभी के तबादले
इस अस्पताल में सरकार द्वारा एक महिला चिकित्सक के साथ महिला फार्मासिस्ट और अन्य स्टॉफ तैनात किया गया था। तब से लेकर 1999 तक महिला अस्पताल सही तरीके से चलता रहा। इस अस्पताल के कस्बे के मध्य में स्थित होने के कारण यहां रोजाना 30 से 40 महिलाएं अपने उपचार के लिए आती थीं। 1999 में महिला चिकित्सक के तबादले के बाद सरकार ने यहां किसी महिला चिकित्सक की तैनाती नहीं की। थोड़े समय बाद स्टाफ का भी यहां से तबादला कर दिया गया। तब से यह अस्पताल बंद है और स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस भवन का रखरखाव न किए जाने से कमरे ढहने के कगार पर हैं। मेन गेट पर ताला लटका हुआ है और परिसर में चारों तरफ घास उगा हुआ है।
आर्थिक सहायता के लिए भी तैयार : गोपाल
शिमला के होटल व्यवसायी व समाजसेवी गोपाल अग्रवाल ने बताया कि उनके पिता इंद्रसेन द्वारा दान में दिये गए इस भवन की वर्तमान हालत से उनके परिवार को ठेस पहुंची है। उनका परिवार चाहता है कि भवन दान देते समय हुए करार के अनुसार यहां महिला चिकित्सालय चलाया जाना चाहिए। इसके लिए अगर कोई आर्थिक सहायता की जरूरत है तो परिवार इसके लिए भी तैयार है। लेकिन अगर सरकार इसे चलाने में असमर्थ रहती है तो वह इस भवन को सरकार से वापस लेकर किसी सामाजिक संस्था को अस्पताल चलाने के लिए सौंपने की कार्रवाई करेंगे।
इस भवन की मलकियत व वर्तमान हालत के बारे में उच्चाधिकारियों को अवगत करवाया जाएगा। इसके बाद ही इसकी हालत सुधारने और महिला अस्पताल शुरू करने की योजना तैयार होगी।
-डॉ. अमरीश मंगला, एसएमओ, सीएचसी।
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उल्लेखनीय है कि लाला इंद्रसेन ने महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का जो सपना देखा था वह स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता से अधूरा रह गया। स्वास्थ्य विभाग इस भवन की देखभाल नहीं कर सका। सरकार की इस अनदेखी के चलते अब अस्पताल का भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है। यहां बड़ी-बड़ी घास उग गई है। उधर इंद्रसेन के बेटे गोपाल अग्रवाल के मुताबिक उनके पिता इंद्रसेन द्वारा दान में दिए गए इस भवन की वर्तमान हालत से उनके परिवार को ठेस पहुंची है। चिकित्सालय न चलाने की सूरत में वे भवन वापस लेने की कार्रवाई करेंगे।
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भवन की दीवार पर लगा शिलालेख साक्षी
मेन बाजार से सटी गली में खंडहर हो चुके इस भवन की दीवार पर लगा शिलालेख लाला इंद्रसेन अग्रवाल के दान की गवाही दे रहा है।
शिलालेख पर लिखा है कि कस्बे के दानी सज्जन लाला इंद्रसेन अग्रवाल ने 1951 में अपनी स्वर्गीय धर्मपत्नी तारावती की याद में इस भवन का निर्माण करवाया था। यह भी लिखा है कि इस भवन में उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता संत लाल की याद में स्त्रियों तथा बालकों के लिए धर्मार्थ औषधालय खोला है। इंद्रसेन के बेटे और शिमला में होटल व्यवसाय करने वाले गोपाल अग्रवाल ने बताया कि महिला अस्पताल खोलने के लिए यह भवन सरकार दान में दिया गया था। संयुक्त पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपी चंद भार्गव ने लाला इंद्रसेन की भावना का आदर करते हुए इस भवन में महिला अस्पताल खोलने की मंजूरी प्रदान देते हुए स्वयं इसका उद्घाटन किया था।
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1999 में हो गए सभी के तबादले
इस अस्पताल में सरकार द्वारा एक महिला चिकित्सक के साथ महिला फार्मासिस्ट और अन्य स्टॉफ तैनात किया गया था। तब से लेकर 1999 तक महिला अस्पताल सही तरीके से चलता रहा। इस अस्पताल के कस्बे के मध्य में स्थित होने के कारण यहां रोजाना 30 से 40 महिलाएं अपने उपचार के लिए आती थीं। 1999 में महिला चिकित्सक के तबादले के बाद सरकार ने यहां किसी महिला चिकित्सक की तैनाती नहीं की। थोड़े समय बाद स्टाफ का भी यहां से तबादला कर दिया गया। तब से यह अस्पताल बंद है और स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस भवन का रखरखाव न किए जाने से कमरे ढहने के कगार पर हैं। मेन गेट पर ताला लटका हुआ है और परिसर में चारों तरफ घास उगा हुआ है।
आर्थिक सहायता के लिए भी तैयार : गोपाल
शिमला के होटल व्यवसायी व समाजसेवी गोपाल अग्रवाल ने बताया कि उनके पिता इंद्रसेन द्वारा दान में दिये गए इस भवन की वर्तमान हालत से उनके परिवार को ठेस पहुंची है। उनका परिवार चाहता है कि भवन दान देते समय हुए करार के अनुसार यहां महिला चिकित्सालय चलाया जाना चाहिए। इसके लिए अगर कोई आर्थिक सहायता की जरूरत है तो परिवार इसके लिए भी तैयार है। लेकिन अगर सरकार इसे चलाने में असमर्थ रहती है तो वह इस भवन को सरकार से वापस लेकर किसी सामाजिक संस्था को अस्पताल चलाने के लिए सौंपने की कार्रवाई करेंगे।
इस भवन की मलकियत व वर्तमान हालत के बारे में उच्चाधिकारियों को अवगत करवाया जाएगा। इसके बाद ही इसकी हालत सुधारने और महिला अस्पताल शुरू करने की योजना तैयार होगी।
-डॉ. अमरीश मंगला, एसएमओ, सीएचसी।

Donated building 71 years ago became ruins for women's hospital- फोटो : Yamuna Nagar