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मौत के कुएं के खेल जैसा ताजेवाला-लालढांग का सफर
अमर उजाला ब्यूरो, यमुनानगर।
Updated Sat, 31 Dec 2016 12:05 AM IST
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मार्ग
- फोटो : यमुनानगर
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अमर उजाला ब्यूरो
यमुनानगर/खिजराबाद। जिले की हिमाचल प्रदेश से लगती सीमा पर ताजेवाला से लालढांग तक का करीब 12 किलोमीटर सफर मौत के कुएं के खेल जैसा लगता है। मार्ग के बीच छह जानलेवा तीव्र मोड़ हैं, इनमें से एक-आध पर ही पूर्व सूचना बोर्ड लगा है। जबकि अन्यों पर वाहन चालक को अचानक मोड़ का पता चलता है। इस कारण वाहन अकसर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। फॉग सीजन में हादसों की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
बीते वर्षों में भी दिसंबर-फरवरी के बीच धुंध व मार्ग पर यातायात प्रबंध अधूरे होने के कारण दर्जनों हादसों में कई लोग अकाल मौत का ग्रास बने तो कई घायल हुए। हादसों के ग्राफ को देखते हुए संबंधित विभाग को हादसों से सबक लेना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं हो पाया। इस बार भी फॉग सीजन दस्तक दे चुका है, किंतु मार्ग पर ढेरों खामियां ज्यों की त्यों हैं।
बता दें कि एनएच-73ए (जगाधरी-पावंटा) के इस मार्ग से हरियाणा से हिमाचल व यूपी से ट्रैफिक आता-जाता है
देहरादून, पांवटा साहिब, मंसूरी, नाहन, चकरौता जैसी जगहों पर जाने के लिए भी लोग इसी रास्ते से गुजरते हैं। विभाग की ओर से बरम आदि में मिट्टी का भराव कराया जा चुका है, लेकिन कई जगहों पर बरमों की स्थिति वैसी ही बनी हुई है। नेशनल हाईवे पर कई जगह तो सड़क से सफेद पट्टी भी गायब हो चुकी है। ताजेवाला चांदसौत बैरियर से आगे सड़क के दोनों ओर बर्मों और गहरे गड्ढों की वजह से वाहन चालक दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इन्हीं खामियों के बीच भी कई बार चालक वाहन से नियंत्रण खो देते हैं व खुद और दूसरों को हादसे की चपेट में ले लेते हैं। संबंधित विभाग ने निर्माण के बाद सड़क किनारों के मरम्मत व बर्म लेवल सही करने सहित सुरक्षित यातायात के प्रबंधों को लेकर ध्यान नहीं दिया। आलम यह है कि ताजेवाला से आगे लालढांग तक की सड़क की दोनों साइड क्षतिग्रस्त हैं और यातायात प्रबंध भी अधूरे हैं।
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बॉ1स
पग-पग पर जान का खतरा, सुरक्षा के नहीं कोई इंतजाम:
ताजेवाला से लालढांग तक करीब 12 किलोमीटर मार्ग से दोनों ओर कहीं साथ में पेड़ सटे हैं तो कहीं जगह-जगह गहरी खाइयां हैं। इन पेड़ों से टकराने व अनियंत्रित होकर खाई में गिरने के कई हादसे हो चुके हैं। यही नहीं मार्ग पर आठ नंबर जैसे व अंग्रेजी के यू की बनावट जैसे कई मोड़ हैं। इनमें सबसे खतरनाक लालढांग मोड़ है, जहां बीते वर्षों में कई सड़क दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। आसपास कोई आवासीय क्षेत्र व रोशनी का प्रबंध न होने से रात में मार्ग पर घुप अंधेरा छा जाता है। यह मार्ग पहाड़ी व जंगली क्षेत्र में लगता है, इस कारण कई बार जानवर सड़क पर आ जाते हैं। भूख-प्यास लगने पर जंगली जानवर अचानक मार्ग पर बिलकुल सामने आ जाते हैं। इससे अनियंत्रित होकर या जानवरों की टक्कर से कई बार वाहन चालक चोटिल हो जाते हैं।
बॉ1स
ग्रामीण बुलाने लगे खूनी मोड़, प्रशासन अभी भी है मौन: फैजपुर निवासी प्रमोद, विक्रम, कलेसर निवासी बलबीर चौधरी, प्रदीप चौधरी, रविंद्र कुमार का कहना है कि फॉग सीजन में हर वर्ष ताजेवाला से लालढांग के बीच काफी सड़क हादसे होते हैं। इनमें अधिकांश तीव्र मोड़ों पर हुए, जिस कारण ग्रामीण इन्हें खूनी मोड़ बुलाने लगे हैं। किंतु मार्ग के हालात देख लगता है कि प्रशासन अभी मौन है। तीन राज्यों को जोड़ने के कारण मार्ग पर 24 घंटे वाहनों की आवाजाही रहती है, बावजूद इसके मार्ग के किनारे क्षतिग्रस्त हैं और जगह-जगह गड्ढे बने हुए हैं। इसके अलावा बर्म भी गायब है, जिससे सड़क व साथ लगते कच्चे रास्ते के लेवल में काफी अंतर आ गया है।
बॉक्स
इन बिंदुओं पर अमल जरूरी:-
मार्ग के सभी तीव्र मोड़ों के दोनों ओर कुछ दूरी पहले उनके पूर्व सूचना बोर्ड लगे होने चाहिए।
मार्ग के दोनों ओर जहां खाई हो,वहां स्पोटर (बाउंड्रीवाल) व खतरे का संकेतक लगा होना चाहिए।
मार्ग के गड्ढों सहित क्षतिग्रस्त किनारे व बर्म के लेवल को सही किया जाए।
जंगली व पहाड़ी क्षेत्र से सटे मार्ग के किनारों पर जाल लगाया जाए, ताकि जानवर व पत्थर सड़क पर न आए।
मार्ग पर जगह-जगह कैटआई, सेंटर व पेजलाइन और रेट्रो रिफलेक्टर सूचना बोर्ड व संकेतक लगे हों।
वर्जन
ताजेवाला से आगे लालढांग तक विभाग के कर्मचारी बरमों को ठीक करने में लगे हुए हैं। यह काम कई दिन से चल रहा है, लेकिन वन विभाग ने नियमानुसार काम न करने से उनकी जेसीबी मशीन को जब्त कर लिया है। विभाग की ओर से कोशिश की जा रही है मजदूर लगाकर इस काम को जल्द ही पूरा कराया जाए।
विकास सुरजेवाला, एक्सईएन, नेशनल हाईवे।
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यमुनानगर/खिजराबाद। जिले की हिमाचल प्रदेश से लगती सीमा पर ताजेवाला से लालढांग तक का करीब 12 किलोमीटर सफर मौत के कुएं के खेल जैसा लगता है। मार्ग के बीच छह जानलेवा तीव्र मोड़ हैं, इनमें से एक-आध पर ही पूर्व सूचना बोर्ड लगा है। जबकि अन्यों पर वाहन चालक को अचानक मोड़ का पता चलता है। इस कारण वाहन अकसर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। फॉग सीजन में हादसों की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
बीते वर्षों में भी दिसंबर-फरवरी के बीच धुंध व मार्ग पर यातायात प्रबंध अधूरे होने के कारण दर्जनों हादसों में कई लोग अकाल मौत का ग्रास बने तो कई घायल हुए। हादसों के ग्राफ को देखते हुए संबंधित विभाग को हादसों से सबक लेना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं हो पाया। इस बार भी फॉग सीजन दस्तक दे चुका है, किंतु मार्ग पर ढेरों खामियां ज्यों की त्यों हैं।
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बता दें कि एनएच-73ए (जगाधरी-पावंटा) के इस मार्ग से हरियाणा से हिमाचल व यूपी से ट्रैफिक आता-जाता है
देहरादून, पांवटा साहिब, मंसूरी, नाहन, चकरौता जैसी जगहों पर जाने के लिए भी लोग इसी रास्ते से गुजरते हैं। विभाग की ओर से बरम आदि में मिट्टी का भराव कराया जा चुका है, लेकिन कई जगहों पर बरमों की स्थिति वैसी ही बनी हुई है। नेशनल हाईवे पर कई जगह तो सड़क से सफेद पट्टी भी गायब हो चुकी है। ताजेवाला चांदसौत बैरियर से आगे सड़क के दोनों ओर बर्मों और गहरे गड्ढों की वजह से वाहन चालक दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इन्हीं खामियों के बीच भी कई बार चालक वाहन से नियंत्रण खो देते हैं व खुद और दूसरों को हादसे की चपेट में ले लेते हैं। संबंधित विभाग ने निर्माण के बाद सड़क किनारों के मरम्मत व बर्म लेवल सही करने सहित सुरक्षित यातायात के प्रबंधों को लेकर ध्यान नहीं दिया। आलम यह है कि ताजेवाला से आगे लालढांग तक की सड़क की दोनों साइड क्षतिग्रस्त हैं और यातायात प्रबंध भी अधूरे हैं।
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पग-पग पर जान का खतरा, सुरक्षा के नहीं कोई इंतजाम:
ताजेवाला से लालढांग तक करीब 12 किलोमीटर मार्ग से दोनों ओर कहीं साथ में पेड़ सटे हैं तो कहीं जगह-जगह गहरी खाइयां हैं। इन पेड़ों से टकराने व अनियंत्रित होकर खाई में गिरने के कई हादसे हो चुके हैं। यही नहीं मार्ग पर आठ नंबर जैसे व अंग्रेजी के यू की बनावट जैसे कई मोड़ हैं। इनमें सबसे खतरनाक लालढांग मोड़ है, जहां बीते वर्षों में कई सड़क दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। आसपास कोई आवासीय क्षेत्र व रोशनी का प्रबंध न होने से रात में मार्ग पर घुप अंधेरा छा जाता है। यह मार्ग पहाड़ी व जंगली क्षेत्र में लगता है, इस कारण कई बार जानवर सड़क पर आ जाते हैं। भूख-प्यास लगने पर जंगली जानवर अचानक मार्ग पर बिलकुल सामने आ जाते हैं। इससे अनियंत्रित होकर या जानवरों की टक्कर से कई बार वाहन चालक चोटिल हो जाते हैं।
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ग्रामीण बुलाने लगे खूनी मोड़, प्रशासन अभी भी है मौन: फैजपुर निवासी प्रमोद, विक्रम, कलेसर निवासी बलबीर चौधरी, प्रदीप चौधरी, रविंद्र कुमार का कहना है कि फॉग सीजन में हर वर्ष ताजेवाला से लालढांग के बीच काफी सड़क हादसे होते हैं। इनमें अधिकांश तीव्र मोड़ों पर हुए, जिस कारण ग्रामीण इन्हें खूनी मोड़ बुलाने लगे हैं। किंतु मार्ग के हालात देख लगता है कि प्रशासन अभी मौन है। तीन राज्यों को जोड़ने के कारण मार्ग पर 24 घंटे वाहनों की आवाजाही रहती है, बावजूद इसके मार्ग के किनारे क्षतिग्रस्त हैं और जगह-जगह गड्ढे बने हुए हैं। इसके अलावा बर्म भी गायब है, जिससे सड़क व साथ लगते कच्चे रास्ते के लेवल में काफी अंतर आ गया है।
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इन बिंदुओं पर अमल जरूरी:-
मार्ग के सभी तीव्र मोड़ों के दोनों ओर कुछ दूरी पहले उनके पूर्व सूचना बोर्ड लगे होने चाहिए।
मार्ग के दोनों ओर जहां खाई हो,वहां स्पोटर (बाउंड्रीवाल) व खतरे का संकेतक लगा होना चाहिए।
मार्ग के गड्ढों सहित क्षतिग्रस्त किनारे व बर्म के लेवल को सही किया जाए।
जंगली व पहाड़ी क्षेत्र से सटे मार्ग के किनारों पर जाल लगाया जाए, ताकि जानवर व पत्थर सड़क पर न आए।
मार्ग पर जगह-जगह कैटआई, सेंटर व पेजलाइन और रेट्रो रिफलेक्टर सूचना बोर्ड व संकेतक लगे हों।
वर्जन
ताजेवाला से आगे लालढांग तक विभाग के कर्मचारी बरमों को ठीक करने में लगे हुए हैं। यह काम कई दिन से चल रहा है, लेकिन वन विभाग ने नियमानुसार काम न करने से उनकी जेसीबी मशीन को जब्त कर लिया है। विभाग की ओर से कोशिश की जा रही है मजदूर लगाकर इस काम को जल्द ही पूरा कराया जाए।
विकास सुरजेवाला, एक्सईएन, नेशनल हाईवे।