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मजदूरों के दर्द से कराह रहा यूपी-हरियाणा बॉर्डर, सिस्टम के छलावों की पोल खोल रहे पांव के छाले

Tue, 19 May 2020 11:13 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो निरंजन कुमार राणा, यमुनानगर
निरंजन कुमार राणा, यमुनानगर Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 19 May 2020 11:13 AM IST
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Migrant Workers are waiting to enter in uttar pradesh and bihar, Lockdown
पेड़ की छांव में सोता बच्चा
ये उस सिस्टम के लिए एक सबक है, जो प्रवासी मजदूरों की व्यवस्था बेहतर होने का दावा कर रहा है। एक बेबस मजदूर का दर्द क्या होता है, ये कोई मध्यप्रदेश के छत्तरपुर जिला निवासी पप्पू से पूछे। लुधियाना में मजदूरी करते हैं, फिलहाल इंजीनियरिंग कॉलेज के निर्माण में लगे थे। लॉकडाउन में जिंदगी थमी तो काम धंधा भी बंद हो गया।
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पचास दिन तक इंतजार के बाद उम्मीद टूटी तो पत्नी कमला और दो बच्चों के साथ 10 दिन पहले पैदल ही चल दिए। धागे से जुड़ी चप्पलें रास्ते में जवाब दे गईं, तो नंगे पैर चले। दोपहरी में लोग घरों में कैद थे, तब ये परिवार नंगे पैर तपती सड़क पर दुश्वारियां झेल रहा था। तीन साल की बच्ची के पैर सड़क पर जलते तो कमला कुछ देर के लिए गोद लेतीं, लेकिन कब तक, खुद भी थकी थी। कुछ कदम बाद मजबूरी में बेटी को नीचे उतारना पड़ता।
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रास्ते में प्यास से हलक सूखे तो उसने एक हाथ में सामान का कट्टा और गोद में एक साल की दूसरी बेटी को उठा लिया। पैदल आने पर सवाल हुआ, तो बेबस आंखों से निहारा। बोले, पैसे होते तो चप्पल खरीद लेते। रास्ते में दयालु लोग खाना देते हैं। करीब दो सौ किमी की पैदल दूरी तय कर यमुनानगर में दाखिल हुए, लेकिन यहां भी बेबसी ही हाथ लगी। शाम तक कलानौर बॉर्डर पहुंचे, लेकिन यूपी में एंट्री नहीं करने दी गई।
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पैर ने थकाया, फिर भी बढ़ाए कदम

बिहार के बेगूसराय निवासी समेत 15 श्रमिक लुधियाना में प्राइवेट कंपनी में कर्मचारी हैं। चार दिन पहले चले थे। किसी तरह हरियाणा बॉर्डर पहुंचे। यहां पुलिस ने रोक लिया और गंदा नाला पार करके हरियाणा में एंट्री की सलाह दी। चार फीट गहरे नाले को पार किया और दो किमी पैदल चलने के बाद एक ट्यूबवेल के नीचे नहाकर गंदगी साफ की। उन्होंने बताया कि पैर जवाब दे चुके हैं, लेकिन अब घर पहुंचकर ही रुकेंगे।

अगले जन्म में मजदूर ना बनाएं
पंजाब के खन्ना से आ रहे रामभज, सोनू, रामकिशन, शैली, चंचल देवी को छपरा जाना है। एक सप्ताह से पैदल चल रहे हैं। वे बताते हैं कि दो माह पहले ही हम सब गए थे, अभी तो कमाई भी नहीं हुई थी कि सब बंद हो गया। जो पैसे थे, लॉकडाउन में पेट भरने में खर्च हुए। अब तो रास्ते में दानवीरों का भोजन ही सहारा है। एक ही दुआ है कि अगले जन्म में मजदूर न बनाए।

खेलने की उम्र में कर रहे सैकड़ों किमी का सफर
मजदूरों की आंखों की भाव-भंगिमाएं तो उनकी बेबसी बयां कर ही रही हैं, लेकिन बच्चों को देखकर हर कोई कह रहा था कि किसी के जीवन में ऐसा संकट दोबारा न आए। समस्तीपुर के रहने वाली बीना अपने पति और दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ यमुनानगर पहुंची है। महिला जरूरी सामान को लिए हुए हैं तो उसकी पांच साल की मासूम बेटी अपनी ही दो साल की छोटी बहन को लेकर साथ-साथ चल रही था।

बच्चों को देखकर लोग अनायास ही कहने लगे, देखे इसे कहते मजबूरी। जिस उम्र में बच्चे गोद में खेलते हैं उस उम्र में ऐसी बच्ची अपनी बहन को गोद में लिए हुए सैकड़ों किमी का सफर कर रही है
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