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Yamuna Nagar News: धड़का बच्चों का दिल, परिजनों की लौटी मुस्कान

Sat, 23 Mar 2024 05:04 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर Updated Sat, 23 Mar 2024 05:04 PM IST
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Children's hearts beat, family members' smiles returned
संवाद न्यूज एजेंसी
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यमुनानगर। ऐसे बच्चे को जन्मजात ही गंभीर बीमारियों से ग्रस्त थे, वह कभी ठीक हो पाएंगे भी या नहीं। इसकी उम्मीद भी उनके माता-पिता ने छोड़ दी थी। यदि उम्मीद थी तो उनके उपचार में आने वाला खर्च सुनते ही माता-पिता पीछे हट जाते थे। ऐसे में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आबीएसके) ऐसे बच्चों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
जिले में गत 11 माह में 94 बच्चों को इस कार्यक्रम के तहत नया जीवनदान मिला। यहां तक कि जो बच्चे न तो कुछ सुन पाते थे और न ही बोलते थे। वह भी सफल उपचार के बाद अब सुनने लगे हैं। इन बच्चों के उपचार पर आने वाला सारा खर्च स्वास्थ्य विभाग ने वहन किया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार की ओर से मार्च महीने को राष्ट्रीय जन्म दोष जागरूकता सप्ताह के तौर पर मनाया जा रहा है।
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दरअसल जितने भी बच्चे हर साल जन्म लेते हैं उनमें से छह प्रतिशत अपने जन्म से विकृत होते हैं। जैसे इन बच्चों के दिल में छेद होना, दिल के वाल्व का ठीक से काम न करना, होंठ कटे होना, पीठ में फोड़ा होना, डाउन सिंड्रोम, जन्मजात मोतिया, कूल्हे का विकास न होना, पौष्टिकता का अभाव, एनीमिया, बाल्य अवस्था रोग व शारीरिक विकास में देरी आदि।
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इन बीमारियों को स्वास्थ्य विभाग की ओर से चार भागों में बांटा गया है। ऐसे बच्चों की पहचान करने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा साल में दो बार आंगनबाड़ी व एक बार स्कूल स्तर पर अभियान चलाया जाता है। इसमें जीरो से 18 साल तक के जन्म दोष वाले बच्चों की पहचान करके उनका उपचार कराया जाता है। कार्यक्रम के तहत 700 बच्चों को स्कूलों में कैंप लगाकर चश्में भी वितरित किए गए हैं।

विभाग उठाता है सारा खर्च : डॉ. बुलबुल
आरबीएसके की नोडल ऑफिसर एवं डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. बुलबुल तहलान ने बताया कि जन्म दोष से ग्रस्त बच्चों के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम काफी लाभकारी सिद्ध हुआ है। 2014-15 से अब तक जिले में पांच करोड़ 96 लाख रुपये ऐसे बच्चों के उपचार पर खर्च किए जा चुके हैं। दो बच्चों के कान की सर्जरी कराई गई है। इनमें डेढ़ साल का एक बच्चा सुन नहीं सकता था और बोलता भी नहीं था। उसके उपचार पर 6.12 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। अब वह सुनने लगा है। धीरे-धीरे बोलने भी लगेगा। इस साल में 94 बच्चों की सर्जरी कराई जा चुकी है। जिनमें 44 बच्चे तो दिल की बीमारी से ही ग्रस्त थे। उनका उपचार पीजीआई चंडीगढ़ में कराया गया। दो एमओ, एक फार्मासिस्ट व एक एएनएम की टीम ऐसे बच्चों की पहचान करने में मदद करती है।
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