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प्राचीन शिवमंदिर अंधेरिया बाग श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
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रादौर। रादौर का प्राचीन शिवमंदिर अंधेरिया बाग सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर में सावन के अलावा हर दिन भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। सुबह-शाम महाआरती में भक्तों का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन ने यहां स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी।
मंदिर के महंत पंडित इंदु शेखर परासर ने बताया कि अंधेरिया बाग शिव मंदिर में शिवलिंग को किसी ने स्थापित नहीं किया, यहां स्वयंभू शिवलिंग हैं। शिव मंदिर में स्थापित शिव धूनी की अग्नि को उत्तराखंड के प्राचीन स्थल त्रियुगी नारायण मंदिर से लाया गया था। यह वह प्राचीन स्थल है, जहां पर शिव-पार्वती का विवाह श्री नारायण की उपस्थिति में संपन्न हुआ था और तभी से उस स्थान पर विवाह की अग्नि आज भी प्रज्वलित है।
मंदिर के जीर्णोद्धार एक दिसंबर 1992 में उस समय कराया गया था, जब मंदिर के मौजूदा महंत यमुना गिरि शास्त्री नजदीक के खुखनी गांव से यहां आए थे। फरवरी 1995 को वसंत पंचमी के मौके पर मंदिर धर्मशाला की नींव रखी गई। महंत ने बताया कि मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन ने यहां स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी। उस समय यहां पर घना जंगल था। यही कारण है कि बाद में इस पवित्र भूमि को प्राचीन शिव मंदिर अंधेरिया बाग का नाम दिया गया।
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1998 में बनाई गई यज्ञशाला
मंदिर के महंत इंदु शेखर के मुताबिक 1998 में यज्ञशाला और 1999 में मां भगवती मंदिर का निर्माण हुआ। 2007 में पुन: मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू हुआ। मंदिर में वर्ष में तीन मुख्य आयोजन होते हैं। शिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। यह पर्व फाल्गुन मास की चौदस को मनाया जाता है। इस पर्व का विशेष महत्व है और लोग श्रद्धा व विश्वास के साथ इस दिन भगवान शिव की आराधना करते हैं। इस दिन मंदिर में भी विशेष पूजन का आयोजन किया जाता है। उसके तहत जागरण, हवन, रुद्राभिषेक और चार पहर की पूजा की जाती है। दूसरा आयोजन जन्माष्टमी और तीसरा गोवर्धन पूजा के दिन होता है।
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मंदिर के महंत पंडित इंदु शेखर परासर ने बताया कि अंधेरिया बाग शिव मंदिर में शिवलिंग को किसी ने स्थापित नहीं किया, यहां स्वयंभू शिवलिंग हैं। शिव मंदिर में स्थापित शिव धूनी की अग्नि को उत्तराखंड के प्राचीन स्थल त्रियुगी नारायण मंदिर से लाया गया था। यह वह प्राचीन स्थल है, जहां पर शिव-पार्वती का विवाह श्री नारायण की उपस्थिति में संपन्न हुआ था और तभी से उस स्थान पर विवाह की अग्नि आज भी प्रज्वलित है।
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मंदिर के जीर्णोद्धार एक दिसंबर 1992 में उस समय कराया गया था, जब मंदिर के मौजूदा महंत यमुना गिरि शास्त्री नजदीक के खुखनी गांव से यहां आए थे। फरवरी 1995 को वसंत पंचमी के मौके पर मंदिर धर्मशाला की नींव रखी गई। महंत ने बताया कि मंदिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन ने यहां स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी। उस समय यहां पर घना जंगल था। यही कारण है कि बाद में इस पवित्र भूमि को प्राचीन शिव मंदिर अंधेरिया बाग का नाम दिया गया।
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1998 में बनाई गई यज्ञशाला
मंदिर के महंत इंदु शेखर के मुताबिक 1998 में यज्ञशाला और 1999 में मां भगवती मंदिर का निर्माण हुआ। 2007 में पुन: मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू हुआ। मंदिर में वर्ष में तीन मुख्य आयोजन होते हैं। शिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। यह पर्व फाल्गुन मास की चौदस को मनाया जाता है। इस पर्व का विशेष महत्व है और लोग श्रद्धा व विश्वास के साथ इस दिन भगवान शिव की आराधना करते हैं। इस दिन मंदिर में भी विशेष पूजन का आयोजन किया जाता है। उसके तहत जागरण, हवन, रुद्राभिषेक और चार पहर की पूजा की जाती है। दूसरा आयोजन जन्माष्टमी और तीसरा गोवर्धन पूजा के दिन होता है।