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Yamuna Nagar News: सत्संग में आचार्य आनंद की मनाई जयंती
Mon, 05 Aug 2024 03:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 05 Aug 2024 03:30 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। मॉडल टाउन स्थित एसएस जैन सभा प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 16वें दिन श्रवण संघ के द्वितीय पाट्ट धर आचार्य सम्राट आनंद ऋषि महाराज की 125वीं जन्म जयंती मनाई गई। इस दौरान श्रद्धालुओं को जाप करवाया गया।
प्रवचन में साध्वी डॉ. स्वाति ने कहा कि आचार्य आनंद का जीवन बड़ा विलक्षण था। आचार्य आनंद ऋषि महाराज का जन्म महाराष्ट्र के गांव चिचोड़ी गांव में माता हुलसा देवी एवं पिता देवीचंद के घर हुआ था। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में रतन ऋषि महाराज से जैन दीक्षा ली और 80 वर्ष की आयु तक अपना संयम पाला। उन्हें आचार्य सम्राट की उपाधि से विभूषित किया गया और उन्होंने पूरे भारत में पैदल भ्रमण कर जैन धर्म का प्रचार किया। उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था।
हर साल आनंद ऋषि महाराज की जन्म दिवस श्रद्धा पूर्वक मनाई जाती है। 13 वर्ष की खाने खेलने की उम्र में उन्होंने संसार से विरक्त होकर जैन भागवती दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेकर अपना संपूर्ण जीवन जप तप स्वाध्याय व गुरु सेवा में लगा दिया। प्रवचनों से उन्होंने जैन शासन के बारे बताया। ऐसी भाव आत्माएं इस संसार में विरली ही होती हैं जो खुद को जीवन का बलिदान करके संसार का कल्याण करती हैं। डॉ. स्वाति ने आचार्य आनंद ऋषि के जीवन से शिक्षा लेकर उनके पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित किया।
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जगाधरी। मॉडल टाउन स्थित एसएस जैन सभा प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 16वें दिन श्रवण संघ के द्वितीय पाट्ट धर आचार्य सम्राट आनंद ऋषि महाराज की 125वीं जन्म जयंती मनाई गई। इस दौरान श्रद्धालुओं को जाप करवाया गया।
प्रवचन में साध्वी डॉ. स्वाति ने कहा कि आचार्य आनंद का जीवन बड़ा विलक्षण था। आचार्य आनंद ऋषि महाराज का जन्म महाराष्ट्र के गांव चिचोड़ी गांव में माता हुलसा देवी एवं पिता देवीचंद के घर हुआ था। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में रतन ऋषि महाराज से जैन दीक्षा ली और 80 वर्ष की आयु तक अपना संयम पाला। उन्हें आचार्य सम्राट की उपाधि से विभूषित किया गया और उन्होंने पूरे भारत में पैदल भ्रमण कर जैन धर्म का प्रचार किया। उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था।
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हर साल आनंद ऋषि महाराज की जन्म दिवस श्रद्धा पूर्वक मनाई जाती है। 13 वर्ष की खाने खेलने की उम्र में उन्होंने संसार से विरक्त होकर जैन भागवती दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेकर अपना संपूर्ण जीवन जप तप स्वाध्याय व गुरु सेवा में लगा दिया। प्रवचनों से उन्होंने जैन शासन के बारे बताया। ऐसी भाव आत्माएं इस संसार में विरली ही होती हैं जो खुद को जीवन का बलिदान करके संसार का कल्याण करती हैं। डॉ. स्वाति ने आचार्य आनंद ऋषि के जीवन से शिक्षा लेकर उनके पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित किया।
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