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तीन तलाक के मामले में पंचायत ने कराया समझौता, पत्नी को घर सौंपकर नई बीवी के संग गए मियां
Updated Tue, 14 Aug 2018 12:53 AM IST
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तीन तलाक के मामले में पंचायत ने कराया समझौता, पत्नी को घर सौंपकर नई बीवी के संग गए मियां
छछरौली। रहीमियां कॉलोनी में हुए तीन तलाक मामले में बिरादरी की पंचायत व पुलिस के हस्तक्षेप से मियां-बीबी के बीच समझौता करवा दिया गया है, लेकिन पीड़ित महिला इस समझौते से खुश नहीं है। समझौते के मुताबिक आरोपी पति अपनी बीवी को मकान देकर यहां से चला गया है। वह न तो यहां आएगा और न ही इस मकान पर उसका कोई हक रहेगा। वहीं महिला का कहना है कि इस उम्र में वह न तो अकेली रह सकती और न ही इस्लामी शरीयत के हिसाब से दूसरा निकाह कर सकती। यानि फैसले के बाद भी पीड़ित महिला के लिए मुसीबतें कम नहीं हुई है। इस्लामी शरीयत के हिसाब से एक तलाकशुदा महिला को तलाक के बाद 90 दिन के लिए घर की चारदीवारी में नजरबंद रहना पड़ता है। पीड़ित महिला का कहना है कि एक तो उसके बच्चों के सर से दो रोटी का सहारा छिन गया। और ऊपर से यह बिरादरी ने सरिया कानून उस पर थोप दिया है। कि वह अपने शौहर से तलाक के बाद 90 दिन के लिए घर में ही नजरबंद रहेगी। महिला का कहना है कि जब उसके बच्चों को कोई सहारा नहीं रहा उनके पास घर का कोई ठिकाना नहीं रहा। धर्म के ठेकेदार ऐसे हालात में उन पर शरिया कानून भी ठोंक रहे हैं कि वह 90 दिन तक घर के अंदर नजरबंद रहे। इस हालात में वह जब जीवन यापन करने का कोई सहारा नहीं रहा तो अपना व अपने बच्चों का पेट किस तरह पालेगी। महिला का कहना है कि शरिया कानून बनाने वालों को इस बारे में तो सोचना चाहिए कि जब एक महिला का अपने शौहर से तलाक हो जाता है। तो उसके बाद उसके पास जीवन यापन करने का कोई सहारा नहीं रहता और इस दौरान उसको और परेशान न किया जाएं। पहले ही उसके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। महिला का कहना है कि शरीयत कानून बनाने वालों को इस बात का तो अंदाजा होना चाहिए कि बिना कारण से अपने व अपने परिवार अपने बच्चों का पालन पोषण करने वाली महिला को तलाक देने का कोई आधार तो होना चाहिए। एक सच्ची ग्रहणी की तरह अपना घर परिवार अपने फर्ज निभाते हुए अगर किसी महिला को उसके बावजूद भी उसके द्वारा दिए गए त्याग और बलिदान के रूप में तीन तलाक जैसी भयानक सजा भोगने पड़े तो इससे खराब कानून किसी भी मजहब का नहीं हो सकता।
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छछरौली। रहीमियां कॉलोनी में हुए तीन तलाक मामले में बिरादरी की पंचायत व पुलिस के हस्तक्षेप से मियां-बीबी के बीच समझौता करवा दिया गया है, लेकिन पीड़ित महिला इस समझौते से खुश नहीं है। समझौते के मुताबिक आरोपी पति अपनी बीवी को मकान देकर यहां से चला गया है। वह न तो यहां आएगा और न ही इस मकान पर उसका कोई हक रहेगा। वहीं महिला का कहना है कि इस उम्र में वह न तो अकेली रह सकती और न ही इस्लामी शरीयत के हिसाब से दूसरा निकाह कर सकती। यानि फैसले के बाद भी पीड़ित महिला के लिए मुसीबतें कम नहीं हुई है। इस्लामी शरीयत के हिसाब से एक तलाकशुदा महिला को तलाक के बाद 90 दिन के लिए घर की चारदीवारी में नजरबंद रहना पड़ता है। पीड़ित महिला का कहना है कि एक तो उसके बच्चों के सर से दो रोटी का सहारा छिन गया। और ऊपर से यह बिरादरी ने सरिया कानून उस पर थोप दिया है। कि वह अपने शौहर से तलाक के बाद 90 दिन के लिए घर में ही नजरबंद रहेगी। महिला का कहना है कि जब उसके बच्चों को कोई सहारा नहीं रहा उनके पास घर का कोई ठिकाना नहीं रहा। धर्म के ठेकेदार ऐसे हालात में उन पर शरिया कानून भी ठोंक रहे हैं कि वह 90 दिन तक घर के अंदर नजरबंद रहे। इस हालात में वह जब जीवन यापन करने का कोई सहारा नहीं रहा तो अपना व अपने बच्चों का पेट किस तरह पालेगी। महिला का कहना है कि शरिया कानून बनाने वालों को इस बारे में तो सोचना चाहिए कि जब एक महिला का अपने शौहर से तलाक हो जाता है। तो उसके बाद उसके पास जीवन यापन करने का कोई सहारा नहीं रहता और इस दौरान उसको और परेशान न किया जाएं। पहले ही उसके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। महिला का कहना है कि शरीयत कानून बनाने वालों को इस बात का तो अंदाजा होना चाहिए कि बिना कारण से अपने व अपने परिवार अपने बच्चों का पालन पोषण करने वाली महिला को तलाक देने का कोई आधार तो होना चाहिए। एक सच्ची ग्रहणी की तरह अपना घर परिवार अपने फर्ज निभाते हुए अगर किसी महिला को उसके बावजूद भी उसके द्वारा दिए गए त्याग और बलिदान के रूप में तीन तलाक जैसी भयानक सजा भोगने पड़े तो इससे खराब कानून किसी भी मजहब का नहीं हो सकता।