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-नहर के नाम पर हुई खूब राजनीति पर खेतों में नहीं पहुंचा नहर का पानी-
Updated Thu, 28 Sep 2017 12:47 AM IST
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नहर पर खूब हुई राजनीति, खेतों में नहीं पहुंच सका पानी
यमुनानगर। आखिरकार प्रदेश सरकार ने दादुपुर-नलवी नहर प्रोजेक्ट को डिनोटिफाई कर दिया, जल्द ही यह नहर इतिहास बन जाएगी। इस नहर को बंद करने के फैसले से उन किसानों को मायूसी मिली है, जिनकी जमीन इस नहर के लिए अधिग्रहीत की गई थी। अधिग्रहीत जमीन का अधिक मुआवजा लेने के लिए कुछ किसान न्यायालय की चौखट तक गए, न्यायालय के आदेश पर मुआवजा राशि कई बार बढ़ाई गई। हाईकोर्ट ने अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा वर्ग मीटर के हिसाब से देने का आदेश सुनाया था। इस हिसाब से सरकार को किसानों को करोड़ों रुपये मुआवजा राशि देनी पड़ती। इससे बचने के लिए अब प्रदेश सरकार ने इस नहर को ही बंद कर देने का फैसला कर लिया।
मानसून सीजन में यमुना नगर में उफान पर बहने वाली यमुना नदी के पानी के सदुपयोग के लिए दादुपुर-नलवी नहर प्रोजेक्ट अस्तित्व में आया था। वर्ष 1987 में नहर के लिए जमीन अधिग्रहण का कार्य शुरू किया गया। यमुनानगर के अलावा अंबाला और कुरुक्षेत्र के 225 गांवों से गुजरने वाली नहर के लिए करीब 1090 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई। वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने नहर के निर्माण का शिलान्यास किया। कांग्रेस शासनकाल के दौरान वर्ष 2009 में यह नहर चालू कर दी गई।
आज तक नहीं हो पाया नहर के पानी का सिंचाई में इस्तेमाल
दादुपुर-नलवी नहर प्रोजेक्ट भूमिगत जल की रिचार्जिंग और खेतों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। सिंचाई विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट को दो फेज में पूरा किया जाना था। पहले फेज में दादूपुर से नलवी तक नहर का निर्माण किया जाना था और दूसरे फेज में नहर से माइनर और खालों की मदद से खेतों तक पानी पहुंचाया जाना था, ताकि धान की फसलों को भरपूर पानी मिल सके। बड़ी सच्चाई यह है इस नहर के पानी का आज तक सिंचाई के लिए इस्तेमाल हो ही नहीं पाया। इस नहर की क्षमता 598 क्यूसेक की है। यमुना नदी लबालब होने के बावजूद दादुपुर-नलवी नहर में कभी भी क्षमता के अनुरूप पानी छोड़ा ही नहीं गया। नहर के पानी का सिंचाई में इस्तेमाल न होने के कारण नहर में क्षमता से काफी कम पानी छोड़ा जाता रहा। सिंचाई विभाग के अधिकारी भी दबी जुबान में कहते हैं कि दादुपुर-नलवी नहर जिन उद्देश्यों के लिए बनाई गई थी, वे पूरे नहीं हो पाए। हालांकि मानसून सीजन में नहर में आने वाले पानी से भूजल रिचार्ज होता रहा। नहर निर्माण के बाद से ही यह राजनीतिक मुद्दा बनी रही।
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खारवन और बलाचौर के किसानों को मिला सबसे अधिक मुआवजा
खारवन के किसान पवन कुमार की दो एकड़ एक कनाल 14 मरले जमीन दादुपुर-नलवी नहर के लिए अधिग्रहीत की गई थी। अधिग्रहण के समय सरकार ने पांच लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से किसानों को मुआवजा दिया। इस मुआवजा राशि से असंतुष्ट खारवन के करीब 30 और बलाचौर गांव के 9 किसानों ने वर्ष 2005 में सेशन कोर्ट में केस दायर किया। कोर्ट ने वर्ष 2014 किसानों को प्रति एकड़ 16.50 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश सुनाया। इसके बाद पवन कुमार को सरकार से 87 लाख चार हजार रुपये मुआवजा मिला। वहीं, केस करने वाले अन्य किसानों को भी इसी दर से मुआवजा दिया गया। मुआवजा लेने के बाद किसानों ने फिर हाईकोर्ट में केस दायर कर दिया। वर्ष 2016 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि किसानों को 2887 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा दिया जाए। सरकार की ओर से मुआवजा राशि न दिए जाने पर बलाचौर और खारवन के अलावा 13 अन्य गांवों के किसान सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गए। वहां भी किसानों के हक में फैसला आया।
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यमुनानगर। आखिरकार प्रदेश सरकार ने दादुपुर-नलवी नहर प्रोजेक्ट को डिनोटिफाई कर दिया, जल्द ही यह नहर इतिहास बन जाएगी। इस नहर को बंद करने के फैसले से उन किसानों को मायूसी मिली है, जिनकी जमीन इस नहर के लिए अधिग्रहीत की गई थी। अधिग्रहीत जमीन का अधिक मुआवजा लेने के लिए कुछ किसान न्यायालय की चौखट तक गए, न्यायालय के आदेश पर मुआवजा राशि कई बार बढ़ाई गई। हाईकोर्ट ने अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा वर्ग मीटर के हिसाब से देने का आदेश सुनाया था। इस हिसाब से सरकार को किसानों को करोड़ों रुपये मुआवजा राशि देनी पड़ती। इससे बचने के लिए अब प्रदेश सरकार ने इस नहर को ही बंद कर देने का फैसला कर लिया।
मानसून सीजन में यमुना नगर में उफान पर बहने वाली यमुना नदी के पानी के सदुपयोग के लिए दादुपुर-नलवी नहर प्रोजेक्ट अस्तित्व में आया था। वर्ष 1987 में नहर के लिए जमीन अधिग्रहण का कार्य शुरू किया गया। यमुनानगर के अलावा अंबाला और कुरुक्षेत्र के 225 गांवों से गुजरने वाली नहर के लिए करीब 1090 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई। वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने नहर के निर्माण का शिलान्यास किया। कांग्रेस शासनकाल के दौरान वर्ष 2009 में यह नहर चालू कर दी गई।
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आज तक नहीं हो पाया नहर के पानी का सिंचाई में इस्तेमाल
दादुपुर-नलवी नहर प्रोजेक्ट भूमिगत जल की रिचार्जिंग और खेतों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। सिंचाई विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट को दो फेज में पूरा किया जाना था। पहले फेज में दादूपुर से नलवी तक नहर का निर्माण किया जाना था और दूसरे फेज में नहर से माइनर और खालों की मदद से खेतों तक पानी पहुंचाया जाना था, ताकि धान की फसलों को भरपूर पानी मिल सके। बड़ी सच्चाई यह है इस नहर के पानी का आज तक सिंचाई के लिए इस्तेमाल हो ही नहीं पाया। इस नहर की क्षमता 598 क्यूसेक की है। यमुना नदी लबालब होने के बावजूद दादुपुर-नलवी नहर में कभी भी क्षमता के अनुरूप पानी छोड़ा ही नहीं गया। नहर के पानी का सिंचाई में इस्तेमाल न होने के कारण नहर में क्षमता से काफी कम पानी छोड़ा जाता रहा। सिंचाई विभाग के अधिकारी भी दबी जुबान में कहते हैं कि दादुपुर-नलवी नहर जिन उद्देश्यों के लिए बनाई गई थी, वे पूरे नहीं हो पाए। हालांकि मानसून सीजन में नहर में आने वाले पानी से भूजल रिचार्ज होता रहा। नहर निर्माण के बाद से ही यह राजनीतिक मुद्दा बनी रही।
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खारवन और बलाचौर के किसानों को मिला सबसे अधिक मुआवजा
खारवन के किसान पवन कुमार की दो एकड़ एक कनाल 14 मरले जमीन दादुपुर-नलवी नहर के लिए अधिग्रहीत की गई थी। अधिग्रहण के समय सरकार ने पांच लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से किसानों को मुआवजा दिया। इस मुआवजा राशि से असंतुष्ट खारवन के करीब 30 और बलाचौर गांव के 9 किसानों ने वर्ष 2005 में सेशन कोर्ट में केस दायर किया। कोर्ट ने वर्ष 2014 किसानों को प्रति एकड़ 16.50 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश सुनाया। इसके बाद पवन कुमार को सरकार से 87 लाख चार हजार रुपये मुआवजा मिला। वहीं, केस करने वाले अन्य किसानों को भी इसी दर से मुआवजा दिया गया। मुआवजा लेने के बाद किसानों ने फिर हाईकोर्ट में केस दायर कर दिया। वर्ष 2016 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि किसानों को 2887 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा दिया जाए। सरकार की ओर से मुआवजा राशि न दिए जाने पर बलाचौर और खारवन के अलावा 13 अन्य गांवों के किसान सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गए। वहां भी किसानों के हक में फैसला आया।