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सड़क हादसे ने छीन लिया था परिवार का सहारा, दिहाड़ी-मजदूरी कर घर संभाला

Fri, 18 Feb 2022 01:59 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 18 Feb 2022 01:59 AM IST
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The road accident had snatched the support of the family, took care of the house by doing daily wages
परिवार के साथ रामफल। संवाद - फोटो : Sonipat
सड़क हादसे में पिता की मौत के बाद महज नौ साल के बच्चे ने भारी मुसीबतें झेलते हुए न सिर्फ अपने परिवार को संभाला, बल्कि समाज मेें अपने लिए एक अलग पहचान भी बनाई है। दिन में पढ़ाई और रात को फैक्टरियों में काम करने वाले जोशी चौहान निवासी रामफल ने नम आंखों से पिता की हादसे में हुई मौत व जीवन संघर्ष की दास्तां बयां की। रामफल का कहना है कि भले कितनी ही मुसीबतें क्यों ना आई हों, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं डगमगाया।
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गांव जोशी चौहान निवासी रामफल ने बताया कि मेरे पिता रामेश्वर खेतीबाड़ी करते थे। 1 जनवरी 1981 को वह साइकिल पर जा रहे थे। बहालगढ़ चौक पर तेज रफ्तार ट्रक ने उनको टक्कर मारी और रौंदते हुए निकल गया। पिता की मौत के बाद हमारा पूरा परिवार उजड़ गया था। हादसे के समय मेरी उम्र महज 9 साल थी। मुझसे बड़ा मेरा भाई राजकुमार 11 साल का था, जबकि दो बहनें, पहली 7 वर्ष की और दूसरी गोदी में थी। पिता की मौत के बाद आय का साधन भी बंद हो गया था। घर में खाने तक को दाने नहीं थे। पिता की तेरहवीं के दिन मां को लत्ता ओढ़ाने (दूसरी शादी) की बात चली, लेकिन मां ने साफ इनकार कर दिया था। आय का साधन न होने पर घर चलाने के लिए बड़ा भाई ड्राइवर बनने चला गया। उसके बाद मैंने मां के साथ दिहाड़ी-मजदूरी कर घर चलाना शुरू किया।
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12 घंटे की ड्यूटी के बाद मिलते थे 10 रुपये
रामफल ने बताया कि बचपन से पढ़ने का शौक था, इसलिए स्कूल भी जाता रहा। पिता की मौत हुई, उस समय तीसरी कक्षा में पढ़ता था। पांचवीं कक्षा तक स्कूल भी जाता और छुुट्टी के दिन मां के साथ दिहाड़ी करता था। पांचवीं कक्षा के बाद एक फैक्टरी में काम मिला, जहां 12 घंटे की ड्यूटी करने के बाद 10 रुपये मिलते थे। दिन में स्कूल जाता और रात को फैक्टरी में चौकीदारा करता था। एक दिन फैक्टरी मालिक ने सोते पकड़ लिया और नौकरी से निकाल दिया। 1987 में 10वीं कक्षा में होने तक कई फैक्टरियों से निकाला गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। इस समय तक दिहाड़ी भी बढ़कर 40 रुपये तक हो गई थी। पढ़ता रहा और जो भी दिहाड़ी-मजदूरी मिल जाती, करता रहा। उस समय परिवार की हालत ऐसी थी कि जन्माष्टमी के दिन व्रत खोलने के लिए 10 रुपये भी उधार मांगने पड़े थे।
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10वीं में पास होने वाला एकमात्र विद्यार्थी था
रामफल ने बताया कि 1987 में स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव किया गया था। उस साल आसपास के स्कूलों में 10वीं कक्षा मेें कोई भी पास नहीं हुआ था। मेरी और एक लड़की की कंपार्टमेंट आई थी। मैं कंपार्टमेंट में पास हो गया था, लेकिन लड़की भी फेल हो गई थी। उसके बाद मैंने आईटीआई में दाखिला लिया। दिन में आईटीआई मेें जाता था और रात को ड्यूटी करता था। इसी संघर्ष के बीच जीवन आगे बढ़ता रहा।
घर चलाने के लिए छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
वर्ष 1991 में दोनों बहनों की शादी की। खर्च बढ़ने और घर चलाने के लिए मुरथल की एक कंपनी में 1200 रुपये महीना की नौकरी शुरू की। नौकरी करने के कारण आईटीआई नहीं जा सका। घर चलाने के लिए मजबूरन आईटीआई से नाम कटवाना पड़ा। काम करते हुए वर्ष 1993 में बड़े भाई की भी शादी की, क्योंकि चालक लाइन में जाने के कारण भाई अशिक्षित रह गया था। मेरे सहपाठी आज जेई तक बने हुए हैं।

संघर्ष करते हुए निभाईं सभी जिम्मेदारियां
रामफल ने बताया कि मुरथल स्थित फैक्टरी में 1996 तक 8 साल काम किया। उसके बाद 1997 में पानीपत में खराद की मशीन लगाई, जहां 2000 तक काम किया। जुलाई 2001 में 28 साल की उम्र में शादी हो गई। शादी के बाद 40 हजार रुपये में वर्कशॉप बेच दी। उसके बाद स्क्रैप का काम शुरू किया। आज भी वही कर रहा हूं। शादी के बाद तीन बच्चे हुए, दो बेटी व एक बेटा। जीवन भर कड़ा संघर्ष कर सभी जिम्मेदारी निभाई। अगर चालक इतनी लापरवाही से ट्रक न चलाता तो शायद जीवन में इतनी मुसीबतें न झेलनी पड़ती। फिर भी मैं आज संघर्ष करते हुए जहां पहुंचा, उसमें खुश हूं। आज अपना कारोबार करने के साथ ही 4-5 परिवारों को भी रोजगार दे रहा हूं।
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