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Sonipat News: 1710 में बनी हवेली का झरोखा बढ़ा रहा संग्रहालय की शोभा
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संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। जिले का प्राचीन इतिहास ऐतिहासिक पुस्तकों के साथ पुरानी हवेलियों में भी दिखाई देता है। वर्ष 1710 में निर्मित कंवर दलीप सिंह की हवेली इसी विरासत का हिस्सा है। हवेली का लाल पत्थर से बना आकर्षक झरोखा अब स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय में स्थापित किया गया है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
हवेली के मालिक गिरीश कुंवर के अनुसार, प्राचीन समय में सोनीपत में प्रवेश के चार प्रमुख दरवाजे थे। साबर दरवाजे के पास उनके पुरखों की लखौरी ईंटों से बनी यह हवेली स्थित थी। हवेली ने अपने दौर की कई ऐतिहासिक घटनाओं को करीब से देखा है।
उन्होंने बताया कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान से विस्थापित होकर सोनीपत पहुंचे हिंदू परिवारों को हवेली में शुरुआती दौर में आश्रय मिला था। उनके बुजुर्गों ने जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को यहां निशुल्क शिक्षा भी दी।
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हवेली का धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ाव रहा है। जिस मार्ग पर यह स्थित थी, वहां से पिछले कई दशकों से रामलीला की सवारियां गुजरती रही हैं। बताया जाता है कि सवारी के हवेली के पास पहुंचने पर कुछ देर ठहराव होता था और भगवान राम की पूजा-अर्चना की जाती थी।
अब हवेली का ऐतिहासिक झरोखा संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इसके साथ तस्वीरें लेकर सोनीपत की विरासत से जुड़ी यादें साथ ले जा रहे हैं। झरोखा शहर के इतिहास, स्थापत्य और सामाजिक सरोकारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।
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सोनीपत। जिले का प्राचीन इतिहास ऐतिहासिक पुस्तकों के साथ पुरानी हवेलियों में भी दिखाई देता है। वर्ष 1710 में निर्मित कंवर दलीप सिंह की हवेली इसी विरासत का हिस्सा है। हवेली का लाल पत्थर से बना आकर्षक झरोखा अब स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय में स्थापित किया गया है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
हवेली के मालिक गिरीश कुंवर के अनुसार, प्राचीन समय में सोनीपत में प्रवेश के चार प्रमुख दरवाजे थे। साबर दरवाजे के पास उनके पुरखों की लखौरी ईंटों से बनी यह हवेली स्थित थी। हवेली ने अपने दौर की कई ऐतिहासिक घटनाओं को करीब से देखा है।
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उन्होंने बताया कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान से विस्थापित होकर सोनीपत पहुंचे हिंदू परिवारों को हवेली में शुरुआती दौर में आश्रय मिला था। उनके बुजुर्गों ने जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को यहां निशुल्क शिक्षा भी दी।
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हवेली का धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ाव रहा है। जिस मार्ग पर यह स्थित थी, वहां से पिछले कई दशकों से रामलीला की सवारियां गुजरती रही हैं। बताया जाता है कि सवारी के हवेली के पास पहुंचने पर कुछ देर ठहराव होता था और भगवान राम की पूजा-अर्चना की जाती थी।
अब हवेली का ऐतिहासिक झरोखा संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इसके साथ तस्वीरें लेकर सोनीपत की विरासत से जुड़ी यादें साथ ले जा रहे हैं। झरोखा शहर के इतिहास, स्थापत्य और सामाजिक सरोकारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।