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Sonipat News: शीतला सप्तमी व्रत आज, विधि-विधान से की गई पूजा देगी फल
Mon, 01 Apr 2024 07:16 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Mon, 01 Apr 2024 07:16 AM IST
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सोनीपत। हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी व्रत को एक महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता हैं। शीतला सप्तमी के दिन महिलाएं पूरे दिन का उपवास करती हैं। मान्यता है कि शीतला सप्तमी व्रत को विधि-विधान पूवर्क करने से माता प्रसन्न होती हैं और व्रतियों को मनोवांछित फल प्रदान करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शीतला सप्तमी का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों को चिकन पाॅक्स व चेचक जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए देवी शीतला की पूजा करती हैं।
ज्योषिचार्य पंडित मनमोहन मिश्रा ने बताया कि शीतला सप्तमी व्रत देश में मनाया जाता है। देवी शीतला को भारत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण राज्यों में देवी पोलेरम्मा या देवी मरिअम्मन के रूप में पूजा जाता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में एक समान त्योहार मनाया जाता है, इसे पोलाला अमावस्या के नाम से जाना जाता है। दिल्ली के पास गुरुग्राम में देवी शीतला का मंदिर स्थित है। इस दिन शीतला देवी मंदिर में सुबह से भक्तों की लंबी लाइन लगती है। उन्होंने बताया कि शीतला सप्तमी वर्ष में दो बार मनाई जाती है। पहले चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी को यह त्योहार मनाया जाता है। इसका विशेष महत्व होता है। दूसरी बार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को भी यह त्योहार मनाया जाता है।
इस मुहूर्त में करें पूजन
सप्तमी तिथि प्रारंभ : 31 मार्च को रात 9:30 बजे
सप्तमी तिथि समाप्त : 1 अप्रैल को रात्रि 9:09 बजे ( उदया तिथि के कारण शीतला सप्तमी व्रत 1 अप्रैल को रखा जाएगा)
शीतला सप्तमी पूजा मुहूर्त : प्रातः 6:11 से सायं 6:39 तक
शीतला सप्तमी का महत्व
देवी शीतला को माता पार्वती का अवतार माना जाता है। स्कन्द पुराण में शीलता सप्तमी के महत्व का वर्णन किया गया है। यह त्योहार शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन लोग ठंडा भोजन करते हैं। इस व्रत में भक्त एक दिन पुराना बनाया हुआ बासी खाना खाते हैं। इस वजह से इस त्योहार को बसौड़ा, बसियौरा व बसोरा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गंधयुक्त फोडे, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के निशान व शीतला जनित दोष दूर हो जाते हैं।
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ज्योषिचार्य पंडित मनमोहन मिश्रा ने बताया कि शीतला सप्तमी व्रत देश में मनाया जाता है। देवी शीतला को भारत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण राज्यों में देवी पोलेरम्मा या देवी मरिअम्मन के रूप में पूजा जाता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में एक समान त्योहार मनाया जाता है, इसे पोलाला अमावस्या के नाम से जाना जाता है। दिल्ली के पास गुरुग्राम में देवी शीतला का मंदिर स्थित है। इस दिन शीतला देवी मंदिर में सुबह से भक्तों की लंबी लाइन लगती है। उन्होंने बताया कि शीतला सप्तमी वर्ष में दो बार मनाई जाती है। पहले चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी को यह त्योहार मनाया जाता है। इसका विशेष महत्व होता है। दूसरी बार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को भी यह त्योहार मनाया जाता है।
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इस मुहूर्त में करें पूजन
सप्तमी तिथि प्रारंभ : 31 मार्च को रात 9:30 बजे
सप्तमी तिथि समाप्त : 1 अप्रैल को रात्रि 9:09 बजे ( उदया तिथि के कारण शीतला सप्तमी व्रत 1 अप्रैल को रखा जाएगा)
शीतला सप्तमी पूजा मुहूर्त : प्रातः 6:11 से सायं 6:39 तक
शीतला सप्तमी का महत्व
देवी शीतला को माता पार्वती का अवतार माना जाता है। स्कन्द पुराण में शीलता सप्तमी के महत्व का वर्णन किया गया है। यह त्योहार शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन लोग ठंडा भोजन करते हैं। इस व्रत में भक्त एक दिन पुराना बनाया हुआ बासी खाना खाते हैं। इस वजह से इस त्योहार को बसौड़ा, बसियौरा व बसोरा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गंधयुक्त फोडे, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के निशान व शीतला जनित दोष दूर हो जाते हैं।
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