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Sonipat News: राजतंत्र तथा लोकतंत्र का मिला-जुला रूप होता है राजा
Wed, 25 Feb 2026 02:40 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Wed, 25 Feb 2026 02:40 AM IST
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सोनीपत सेक्टर 14 कम्युनिटी सेंटर में वैदिक यज्ञ समिति के कार्यक्रम में प्रवचन सुनते श्रद्धालु
सोनीपत। हमारा राजा राजतंत्र तथा लोकतंत्र का मिला-जुला रूप होता है। राजा पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं होता। यद्यपि राजा अदण्य होता है फिर भी राजा कोई राष्ट्र के विपरीत कार्य करता है। तो उसके ऊपर भी धर्माधिकारी होता है जो राजा को दंड दे सकता है।
यह जानकारी मंगलवार को आचार्य वेदपाल ने अथर्ववेद के मंत्रों की व्याख्या करते हुए दी। वे सेक्टर 14 कम्युनिटी सेंटर में वैदिक यज्ञ समिति की ओर से वृहद यज्ञ के बाद चर्चा कर रहे थे। समिति के 47 वें वार्षिकोत्सव के द्वितीय दिन आयोजन हुआ।
इसमें बताया कि राजा को सभी वर्गों के प्रति समान भाव से पदार्थ का वितरण करना चाहिए। राजा युद्ध में प्रवृति न रखते हुए भी दूसरों को भयभीत रखें, इसी से प्रजा संतुष्ट रहती है।
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प्रदीप शास्त्री ने ईश्वर पर आस्था व्यक्त करते हुए ओम नाम का औढ दुशाला तथा दाता तेरे सुमिरन का वरदान जो मिल जाए भजनों पर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया।
मुख्य वक्ता आचार्य अंकित प्रभाकर ने गायत्री मंत्र में आए वरेण्यम् शब्द की व्याख्या करते हुए बताया कि वह ईश्वर हमारे द्वारा चुनने योग्य है। यद्यपि हम ईश्वर को अपने सांसारिक कामनाओं को प्राप्त करने का आधार मानते हैं जबकि ईश्वर हमारी आत्मा का समर्पण चाहता है। इससे जीवात्मा लाभ व सुरक्षा को प्राप्त कर सके।
कार्यक्रम का संचालन आचार्य दीक्षा आर्या की ओर से किया गया। इसमें महेंद्र शास्त्री, दीनदयाल मदान, अशोक मदान, अनीता चावला, मीनाक्षी मदान उपस्थित रहे।
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यह जानकारी मंगलवार को आचार्य वेदपाल ने अथर्ववेद के मंत्रों की व्याख्या करते हुए दी। वे सेक्टर 14 कम्युनिटी सेंटर में वैदिक यज्ञ समिति की ओर से वृहद यज्ञ के बाद चर्चा कर रहे थे। समिति के 47 वें वार्षिकोत्सव के द्वितीय दिन आयोजन हुआ।
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इसमें बताया कि राजा को सभी वर्गों के प्रति समान भाव से पदार्थ का वितरण करना चाहिए। राजा युद्ध में प्रवृति न रखते हुए भी दूसरों को भयभीत रखें, इसी से प्रजा संतुष्ट रहती है।
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प्रदीप शास्त्री ने ईश्वर पर आस्था व्यक्त करते हुए ओम नाम का औढ दुशाला तथा दाता तेरे सुमिरन का वरदान जो मिल जाए भजनों पर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया।
मुख्य वक्ता आचार्य अंकित प्रभाकर ने गायत्री मंत्र में आए वरेण्यम् शब्द की व्याख्या करते हुए बताया कि वह ईश्वर हमारे द्वारा चुनने योग्य है। यद्यपि हम ईश्वर को अपने सांसारिक कामनाओं को प्राप्त करने का आधार मानते हैं जबकि ईश्वर हमारी आत्मा का समर्पण चाहता है। इससे जीवात्मा लाभ व सुरक्षा को प्राप्त कर सके।
कार्यक्रम का संचालन आचार्य दीक्षा आर्या की ओर से किया गया। इसमें महेंद्र शास्त्री, दीनदयाल मदान, अशोक मदान, अनीता चावला, मीनाक्षी मदान उपस्थित रहे।