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भगवान के प्रसन्न होने पर भक्त को नहीं रहती कोई कमी : जयदेव दाधिच

Fri, 28 Feb 2025 11:27 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा Updated Fri, 28 Feb 2025 11:27 PM IST
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When God is pleased, the devotee does not lack anything: Jaidev Dadhich
 कथा का वाचन करते शास्त्री जयदेव एवं श्रवण करते श्रद्धालु। 
ओढां। गांव पन्नीवाला मोटा में स्थित श्री कृष्ण गोशाला में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के दूसरे दिन शुक्रवार को कथावाचक शास्त्री जयदेव दाधिच ने कहा कि हमें भगवान को पुकारने का ढंग होना चाहिए। भगवान किसी दान-चढ़ावे या दिखावे से नहीं बल्कि अंतर्मन की भावना से प्रसन्न होते हैं। तब भक्त को किसी चीज की कमी नहीं रहती।
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इसके बाद उन्होंने श्रद्धालुओं को राजा परीक्षित का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि एक बार राजा परीक्षित आखेट के लिए वन में गए। वहां प्यास लगने पर जल की खोज में वह शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे। तब ऋषि ध्यान में लीन थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल मांगा लेकिन ध्यानमग्न होने के कारण ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया।
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कलियुग राजा के सिर पर स्वर्ण मुकुट पर निवास कर रहा था। इस प्रभाव से राजा परीक्षित को लगा कि ये ऋषि ध्यान का ढोंग कर उनका अपमान कर रहे हैं। इस क्रोधवश राजा परीक्षित ने एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठा कर ऋषि के गले में डाल दिया। ये देखकर ऋषि के पुत्र शृंगी ने क्रोधित होकर राजा परीक्षित को ये श्राप दे दिया कि आज से 7वें दिन तक्षक सर्प के डसने से उसकी मृत्यु हो जाएगी। ध्यान टूटने पर जब ऋषि को इसका पता चला तो उन्हें अत्यंत दुख हुआ और उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि उसने घोर पाप कर डाला है। छोटी भूल के लिए इतनी बड़ी सजा देना गलत था।
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जब राजा परीक्षित अपने महल में पहुंचे और स्वर्ण मुकुट को उतारा तो कलियुग का प्रभाव समाप्त हो गया और ज्ञान की पुन: उत्पत्ति हुई। राजा ने सोचा कि उन्होंने ऋषि का अपमान कर घोर पाप कर डाला है। इसी दौरान ऋषि शमीक ने राजा परीक्षित के दरबार में शिष्य भेजकर श्रृंगी के क्रोध की जानकारी दी। तब राजा परीक्षित ने कहा कि ऋषि कुमार ने श्राप देकर उन पर उपकार किया है।


इसके बाद राजा परीक्षित ने सब कुछ त्याग कर अपने जीवन के शेष सात दिन ज्ञान प्राप्ति और ईश्वर भक्ति में बिताने का संकल्प लिया। इसके बाद वे शुकदेव मुनि के पास गए जहां शुकदेव मुनि ने उन्हें सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई। राजा परीक्षित को पहले मृत्यु का भय था, लेकिन शुकदेव मुनि ने जब उन्हें श्रीमद्भागवत कथा सुनाई तो वे जीवन का असली उद्देश्य समझे और उनके मन से मृत्यु का भय समाप्त हो गया। श्राप के अनुसार सातवें दिन तक्षक सर्प के डसने पर राजा परीक्षित परलोक गमन कर गए।
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