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पंजाबी कवि दिलबर जूझ रहे कैंसर से, सरकार ने नहीं की कोई मदद

Thu, 20 Mar 2014 12:41 AM IST
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sirsa Updated Thu, 20 Mar 2014 12:41 AM IST
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Punjabi poet beloved battling cancer, no government help

दुनिया भर में अपनी विशेष शैली की रचनाओं ‘चौके-छक्कों’ से धमाल मचाने वाले पंजाबी कविता के ‘सचिन तेंदुलकर’ हरी सिंह दिलबर में 84 वर्ष की उम्र में भी नौजवानों जैसा जोश है।

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पिछले लंबे समय से कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रहे दिलबर हंसते हुए कहते हैं कि शरीर कमजोर हो चुका है, एक आंख की नजर भी जा चुकी है, लेकिन जैसे ही वे किसी मंच पर पहुंचते हैं तो उनके शरीर में ऐसी शक्ति आ जाती है कि लगातार एक घंटा तक अपने अनोखे अंदाज में कविताओं की बरसात कर सकते हैं।
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दिलबर 114 बार लाल किले पर प्रस्तुति दे चुके हैं, उनकी दो पुस्तकें बाजार में आ चुकी हैं, वे 2500 कविताएं लिख चुके हैं, लेकिन हरियाणा सरकार की ओर से उन्हें कभी सम्मान से नवाजा नहीं गया। उन्होंने कभी खुद किसी सम्मान के लिए आवेदन नहीं किया।
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पाकिस्तान के लायलपुर में 1929 को पिता मौता सिंह और माता दुर्गा देवी के घर में जन्में हरी सिंह इन दिनों सिरसा के वार्ड नंबर सात की एमसी कॉलोनी  में रहते हैं।

उन्होंने आठवीं कक्षा पंजाब के सुल्तानपुर लोधी से पास की थी। उनकी हिंदी और पंजाबी दोनों पर अच्छी पकड़ है। 84 वर्ष की उम्र और एक आंख की नजर बिल्कुल बंद हो जाने के बावजूद दिन का अधिकतर समय वे साहित्य पढ़ने और नई रचनाएं लिखने में गुजारते हैं। कैंसर से जूझ रहे दिलबर का साहित्यिक जज्बा देख बड़े-बडे़ दंग हैं। अब तक वे 2500 से ज्यादा रचनाएं लिख चुके हैं।


चौके-छक्के लिखने पर हरी सिंह कहते हैं कि यह उनके उस्ताद प्रसिद्ध साहित्यकार चिराग दीन दामन की देन है। उन्होंने ही उन्हें इस तरह की रचनाएं लिखने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने अपनी चार पंक्तियों की रचना को चौका और छह पंक्तियों की रचना को छक्के का नाम दिया है। उनकी अधिकतर रचनाएं कटाक्ष व हास्य से भरी हुई होती है।

1948 में गुरु दामन के साथ पहली बार लाल किले से बोलने का मौका मिला था। तब से ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि अब तक 114 बार लाल किले से प्रस्तुति दे चुके हैं। यही कारण है कि देश के बड़े-बड़े नेता भी उनकी रचनाओं के दीवाने हैं। पुरानी याद को ताजा करते हुए वह कहते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह अकसर अपना पसंदीदा चौका सुना करते थे - जीथे अख नू तलवार दा ही कम है, जीथे हुसन नू शिंगार दा ही कम है, उस दिल्ली च रह के दिल नू संभाली रखना, ऐ मेरे जहे सरदार दा ही कम है।

उनकी रचना हर उस ज्वलंत मुद्दे पर होती है जो सुर्खियों में रहता है। अन्ना के अनशन पर उनका लिखा छक्का-मन तां लोकां सांभ लए सन, तन नू तन दे लीड़े पे गए, ऐनी भीड़ किथो आ गई, चौड़े बाजार वी भीड़े पे गए, भ्रष्टाचार दी दवाई, अन्ना जी तो आंदी, दिलबर हुन की करिए कीड़ेमार दवाई वीच वी कीड़े पे गए।
 

महज 12 वर्ष की आयु से ही लिखना शुरू करने वाले हरी सिंह की पहली दो पुस्तकें 30 से 40 वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी, जिनका नाम करमां दे रगड़े और मैं ते रब था। अभी कुछ वर्ष पहले छपी उनकी पुस्तक दिलबर दे चौके-छक्के बेहद प्रसिद्ध हुई। जिसे विदेशों में भी पसंद किया गया।

अभी उनके पास बहुत सी ऐसी मौलिक रचनाएं हैं, जिन्हें वह जल्द पुस्तकों का रूप देने वाले हैं। दो पुस्तकें रू-ब-रू दिलबर और जूंगा रूंगा जल्द पाठकों के हाथों में पहुंचने वाली है। साहित्यिक सम्मान पर दिलबर का कहना है कि उन्होंने कभी किसी सम्मान के लिए पंजीकरण ही नहीं करवाया।

उनकी रचनाओं से खुश होकर कई संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी है। उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान उन्हें आस्ट्रेलिया से ऑनलाइन चलने वाले हरमन रेडियो से मिला है। उनकी कई ऐसी रचनाएं है जिन्हेें पंजाबी के  प्रसिद्ध गायक मनमोहन वारिस और कमल हीर अपने विशेष कार्यक्रम विरसे में शामिल कर चुके हैं।
 
सरकार ने नहीं दिया कोई सम्मान
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी रचनाओं से लोहा मनवा चुके दिलबर को सरकार से बहुत अधिक शिकवा है। उनका कहना है कि सरकार ने अभी तक उन्हें किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई। यहां तक कि सांसद अशोक तंवर ने पंजाबी साहित्य सभा के एक कार्यक्रम में 5000 रुपये पेंशन लागू करने का ऐलान किया था, जिसे अभी तक पूरा नहीं किया गया। उनका जीवन आर्थिक तंगी से गुजर रहा है। लोगों की मदद से ही कैंसर का इलाज हो रहा है।

हरी सिंह कहते हैं कि उपायुक्त डॉ. जे गणेशन, भूपेंद्र सिंह पन्नीवालिया, मीटू बराड़ और भीम झूंथरा की मदद से वे घर बना सके, अन्यथा उन्हें सिर पर छत के भी लाले पड़ जाते।


1984 के सिख विरोधी दंगों में वह अपने 11 वर्षीय बेटे जीते को अपनी आंखों के सामने कत्ल होता देख चुके हैं। उन्होंने अपनी जान बड़ी मुश्किल से बचाई थी। इस मामले में इंसाफ के लिए उन्होंने कई बार सरकार का दरवाजा खटखटाया मगर उन्हें अभी तक इंसाफ नहीं मिल पाया है।


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