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Sirsa News: गांव चक्कां की बहू प्रियंका ने रेतीली भूमि में उगाई जैविक सब्जियां

Mon, 10 Jun 2024 12:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा Updated Mon, 10 Jun 2024 12:32 AM IST
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Priyanka, daughter-in-law of village Chakkan, grew organic vegetables in sandy land
खेत में उगाई गई सब्जी तोड़ती प्रियंका व परिजन।
चोपटा। लंबे समय से परंपरागत खेती में लगातार घाटे से परेशान होकर कम बारिश और भूमिगत खारे पानी के कारण नरमा, कपास और ग्वार की खेती से केवल जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ही बड़ी मुश्किल से हो पा रही थी, परिवार पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा था। इससे परेशान होकर गांव चक्का निवासी प्रियंका ने पति इंद्रसेन की सहमति से परंपरागत खेती छोड़कर सब्जी उगाने की ठानी। अब प्रियंका मात्र एक एकड़ में जैविक सब्जी उगाकर नरमा और कपास से ज्यादा मुनाफा कमा रहीं हैं।
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प्रियंका ने बताया कि गांव के नजदीक उनके पास मात्र एक एकड़ जमीन है, जो पूर्णत: रेतीला टीला है, जहां पर भूमिगत पानी भी खारा है। इसलिए उन्होंने जैविक सब्जी उगानी शुरू की। पहले साल केवल भिंडी और ककड़ी की खेती की, जिससे तीन महीनों में 50,000 रुपयों की बचत हुई। अच्छा मुनाफा देखकर उसका हौसला बढ़ गया। इस बार उन्होंने मिर्च, भिंडी, टिंडी, ककड़ी, लौकी, तोरी और बंगा आदि सब्जी लगाई है, जिनकी पैदावार शुरू हो चुकी है।
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प्रियंका का मानना है कि अगर इस बार मौसम ने साथ दिया तो उन्हें मात्र छह महीनों में ही करीब सवा से डेढ़ लाख रुपये तक की पैदावार होने की उम्मीद है। हालांकि नई खेती का अनुभव न होने के कारण उन्हें थोड़ी दिक्कत आ रही है। उन्होंने बताया कि सब्जियों में लगने वाली बीमारियों, पौधों की बढ़वार, पैदावार और देखरेख के तरीकों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। अगर समय रहते सही उपाय न होने पर बड़े नुकसान का सामना भी करना पड़ता है। संवाद
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जैविक और जहरमुक्त सब्जियों का स्वाद ही अलग

प्रियंका के पति इंद्रसेन ने बताया कि वे कृषि विभाग रानियां से समय-समय पर जैविक खेती की बढ़वार, पैदावार, देखरेख, बोने, काटने के नए तरीकों, समय परिवर्तन के साथ पड़ने वाली मौसमी बीमारियों और उनकी रोकथाम की जानकारी लेते रहते हैं। इसके लिए गोबर, गोमूत्र, नीम की पतियां, छाछ, हल्दी, गुड़ इत्यादि का मिश्रण बनाकर समय-समय पर छिड़काव करना होता है। इससे सभी सब्जियां शुद्ध जैविक और विषमुक्त होती हैं।



ग्राहक खेत से ही खरीदते हैं सब्जी

प्रिंयका ने बताया कि जैविक होने के कारण सब्जी थोड़ी महंगी जरूर है, लेकिन ज्यादातर ग्राहक सब्जियां खेत से ही लेकर जाते हैं। इसके लिए ढुलान और मेहनत भी कम करनी पड़ती है। कई बार सब्जी की लागत कम और पैदावार अच्छी होने पर उन्हें रानियां, जीवननगर, ऐलनाबाद या सिरसा सब्जी मंडी में बेचनी पड़ती है। इससे समय, मेहनत और किराया-भाड़ा बढ़ जाता है।
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