{"_id":"6276af76d77a487c7473acfd","slug":"husband-left-at-the-age-of-25-worked-hard-and-made-son-an-assistant-professor-sirsa-news-hsr63104507","type":"story","status":"publish","title_hn":"25 की उम्र में ही छूटा पति का साथ, परिश्रम कर बेटे को बना दिया सहायक प्रोफेसर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
25 की उम्र में ही छूटा पति का साथ, परिश्रम कर बेटे को बना दिया सहायक प्रोफेसर
विज्ञापन
संतोष देवी अपने बेटे सहायक प्रोफेसर विजेंद्र रजोरा के साथ। संवाद
- फोटो : Sirsa
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सिरसा। जो चुनौतियों से लड़कर बच्चों को काबिल बना दे, सही मायने में यही मातृशक्ति है। ऐसी ही एक मातृशक्ति 60 वर्षीय संतोष रानी ने पति की मौत के बाद संघर्ष करते हुए अपने बेटे को सहायक प्रोफेसर बनाया। इसी संघर्ष की बदौलत आज जब बेटे के नाम से मां की पहचान होती है, तो संतोष रानी खुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं।
नोहरिया बाजार निवासी संतोष रानी की शादी मात्र 16 वर्ष की उम्र में 1978 में हुई। करीब छह साल बाद 1984 में उनके बेटे का जन्म हुआ। अब बेटा तीन साल का ही हुआ था कि हृदय गति रुकने से संतोष के पति का निधन हो गया। मात्र 25 वर्ष की आयु में संतोष विधवा हो गई। बेटे की परवरिश में कोई समस्या न आए इसलिए संतोष दूसरी शादी नहीं की और सिंगल मदर होते हुए बेटे का पालन पोषण किया। उसने सिलाई कढ़ाई का काम शुरू कर दिया। समाज की चुनौतियों से पार पाते हुए संतोष रानी ने आज बेटे को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां वह समाज के अन्य बच्चों को कामयाबी के मार्ग पर जाने का रास्ता दिखा रहा है।
उच्चतर शिक्षा दिलाकर बेटे को बनाया सहायक इंजीनियर प्रोफेसर
मां के संघर्ष का ही परिणाम है कि संतोष रानी का बेटा विजेंद्र रजोरा पेशे से हिसार के विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर तैनात है। इसके साथ ही विजेंद्र का अध्ययन भी जारी है और वह इसी विषय में पीएचडी कर रहा है।
विज्ञापन
पार्टियों के झंडों की करती थी सिलाई
संतोष रानी ने बताया कि परिवार के अन्य सदस्यों के साथ-साथ परिचितों का सहयोग तो मिला, लेकिन उसका उद्देश्य खुद परिश्रम कर बच्चे को मेहनतकश बनाना था। इसी उद्देश्य के चलते सिलाई का कार्य शुरू किया और ब्लाउज बनाने के साथ ही विभिन्न पार्टियों के झंडे सिलने शुरू किया। वक्त के साथ बेटा शिक्षा ग्रहण करता गया और रोजगार के काबिल बना तो कहता..मां अब रहने दे, तुझे काम करने की जरूरत नहीं।
विज्ञापन
नोहरिया बाजार निवासी संतोष रानी की शादी मात्र 16 वर्ष की उम्र में 1978 में हुई। करीब छह साल बाद 1984 में उनके बेटे का जन्म हुआ। अब बेटा तीन साल का ही हुआ था कि हृदय गति रुकने से संतोष के पति का निधन हो गया। मात्र 25 वर्ष की आयु में संतोष विधवा हो गई। बेटे की परवरिश में कोई समस्या न आए इसलिए संतोष दूसरी शादी नहीं की और सिंगल मदर होते हुए बेटे का पालन पोषण किया। उसने सिलाई कढ़ाई का काम शुरू कर दिया। समाज की चुनौतियों से पार पाते हुए संतोष रानी ने आज बेटे को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां वह समाज के अन्य बच्चों को कामयाबी के मार्ग पर जाने का रास्ता दिखा रहा है।
विज्ञापन
उच्चतर शिक्षा दिलाकर बेटे को बनाया सहायक इंजीनियर प्रोफेसर
मां के संघर्ष का ही परिणाम है कि संतोष रानी का बेटा विजेंद्र रजोरा पेशे से हिसार के विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर तैनात है। इसके साथ ही विजेंद्र का अध्ययन भी जारी है और वह इसी विषय में पीएचडी कर रहा है।
विज्ञापन
पार्टियों के झंडों की करती थी सिलाई
संतोष रानी ने बताया कि परिवार के अन्य सदस्यों के साथ-साथ परिचितों का सहयोग तो मिला, लेकिन उसका उद्देश्य खुद परिश्रम कर बच्चे को मेहनतकश बनाना था। इसी उद्देश्य के चलते सिलाई का कार्य शुरू किया और ब्लाउज बनाने के साथ ही विभिन्न पार्टियों के झंडे सिलने शुरू किया। वक्त के साथ बेटा शिक्षा ग्रहण करता गया और रोजगार के काबिल बना तो कहता..मां अब रहने दे, तुझे काम करने की जरूरत नहीं।