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सकारात्मक सोच रखकर सीडीएलयू के प्रोफेसर ने हराया कोरोना को
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कोरोना संक्रमण से अबकी बार चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भी अछूते नहीं रहे। कोरोना से सीडीएलयू के प्रोफेसर रविंद्र कुमार और प्रोफेसर अशोक मक्कड़ भी संक्रमित हो गए परंतु इन प्रोफेसर ने कोरोना को अपनी सकारात्मक सोच से हराया। प्रोफेसरों ने अपने शेड्यूल को व्यस्त रखा, कभी टीवी देखा और कभी पुस्तकें पढ़ी। हालांकि इन प्रोफेसर ने अबकी बार स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए है।
कोरोना को हरा कर ठीक हुए लॉ विभाग के प्रोफेसर अशोक मक्कड़ ने अनुभव साझा करते हुए बताया कि खांसी और जुकाम के कारण वे होम क्वारंटीन हो गए। आठ अप्रैल को उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद वे घर पर ही रहकर ट्रीटमेंट शुरू किया। स्वास्थ्य विभाग की ओर से अबकी बार कोई दवाइयां नहीं भेजी गई। एक दिन आयुष विभाग से फोन आया कि वे काढ़ा लेने के लिए आ जाए परंतु उन्होंने कहा कि वे काढ़ा लेने कैसे आ सकते हैं। अशोक मक्कड़ ने कहा कि करीब 14 दिन के समय के दौरान उन्होंने अपने मन में कोई नकारात्मक विचार नहीं रखा। हालांकि खांसी के कारण उन्हें काफी तकलीफ हुई परंतु पुस्तकें पढ़ने और अपने खुद को व्यस्त रखने के चलते उन्होंने नकारात्मक सोच को हावी नहीं होने दिया।
पति-पत्नी पॉजिटिव हुए तो सिख परिवारों ने की सहायता
सीडीएलयू के प्रोफेसर रविंद्र कुमार और उनकी पत्नी भी कोरोना पॉजिटिव आ गए। उनके सामने तीन बच्चों को खाने की चिंता सताने लगी। प्रोफेसर रविंद्र कुमार ने बताया कि वे पत्नी के साथ मकान के ऊपरी फ्लोर पर रहने लग गए। दोनों के पॉजिटिव आने के बाद तीनों बच्चों को खाना कौन देगा, इसकी चिंता सताने लगी। कुछ दिन बाहर की टिफिन मंगवाया, परंतु खाना अच्छा नहीं लगा। जैसे ही पड़ोसी में रहने वाले एक सिख परिवार के युवक जसप्रीत सिंह धालीवाल और हुडा सेक्टर में रहने वाले पुराने परिचित कंवलजीत सिंह ढिल्लों को उनके पॉजिटिव होने की सूचना मिली तो इन सिख परिवारों ने उनके लिए खाना भेजना शुरू कर दिया। इन परिवारों ने उनके परिवार की बड़ी सहायता की। हर चीज वे पहुंचाते थे। स्वास्थ्य विभाग को फोन करके बच्चों के सैंपल ले जाने के लिए कहा परंतु सैंपल ही नहीं लिए। प्रोफेसर रविंद्र ने बताया कि उन्होंने अपने मन में कभी नकारात्मक विचार नहीं लाए। वे पुस्तकें पढ़ते और कभी कभी टीवी देखते।
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कोरोना को हरा कर ठीक हुए लॉ विभाग के प्रोफेसर अशोक मक्कड़ ने अनुभव साझा करते हुए बताया कि खांसी और जुकाम के कारण वे होम क्वारंटीन हो गए। आठ अप्रैल को उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद वे घर पर ही रहकर ट्रीटमेंट शुरू किया। स्वास्थ्य विभाग की ओर से अबकी बार कोई दवाइयां नहीं भेजी गई। एक दिन आयुष विभाग से फोन आया कि वे काढ़ा लेने के लिए आ जाए परंतु उन्होंने कहा कि वे काढ़ा लेने कैसे आ सकते हैं। अशोक मक्कड़ ने कहा कि करीब 14 दिन के समय के दौरान उन्होंने अपने मन में कोई नकारात्मक विचार नहीं रखा। हालांकि खांसी के कारण उन्हें काफी तकलीफ हुई परंतु पुस्तकें पढ़ने और अपने खुद को व्यस्त रखने के चलते उन्होंने नकारात्मक सोच को हावी नहीं होने दिया।
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पति-पत्नी पॉजिटिव हुए तो सिख परिवारों ने की सहायता
सीडीएलयू के प्रोफेसर रविंद्र कुमार और उनकी पत्नी भी कोरोना पॉजिटिव आ गए। उनके सामने तीन बच्चों को खाने की चिंता सताने लगी। प्रोफेसर रविंद्र कुमार ने बताया कि वे पत्नी के साथ मकान के ऊपरी फ्लोर पर रहने लग गए। दोनों के पॉजिटिव आने के बाद तीनों बच्चों को खाना कौन देगा, इसकी चिंता सताने लगी। कुछ दिन बाहर की टिफिन मंगवाया, परंतु खाना अच्छा नहीं लगा। जैसे ही पड़ोसी में रहने वाले एक सिख परिवार के युवक जसप्रीत सिंह धालीवाल और हुडा सेक्टर में रहने वाले पुराने परिचित कंवलजीत सिंह ढिल्लों को उनके पॉजिटिव होने की सूचना मिली तो इन सिख परिवारों ने उनके लिए खाना भेजना शुरू कर दिया। इन परिवारों ने उनके परिवार की बड़ी सहायता की। हर चीज वे पहुंचाते थे। स्वास्थ्य विभाग को फोन करके बच्चों के सैंपल ले जाने के लिए कहा परंतु सैंपल ही नहीं लिए। प्रोफेसर रविंद्र ने बताया कि उन्होंने अपने मन में कभी नकारात्मक विचार नहीं लाए। वे पुस्तकें पढ़ते और कभी कभी टीवी देखते।
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