{"_id":"628feb0b468aa235894bc02e","slug":"where-is-the-supply-coming-from-milk-production-3-50-lakh-liters-demand-more-than-doubled-rohtakcity-news-rtk647835270","type":"story","status":"publish","title_hn":"कहां से हो रही आपूर्ति ः दूध का उत्पादन 3.50 लाख लीट, मांग दोगुनी से भी ज्यादा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कहां से हो रही आपूर्ति ः दूध का उत्पादन 3.50 लाख लीट, मांग दोगुनी से भी ज्यादा
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सेक्टर एक के बाजार में दूधिया केन के दूध में पैकेट का दूध मिलाता हुआ । अमर उजाला
- फोटो : RohtakCity
दूध के धंधे में हाथ काला करने से इनकार नहीं किया जा सकता है। जिले में दूध के उत्पादन से ज्यादा खपत दूध की आपूर्ति और गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, जिले में कुल 3.50 लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है। लेकिन जरूरत करीब तीन गुना है। चौंकिए मत, यही सच है। अमर उजाला दूध की मांग व आपूर्ति को लेकर पड़ताल की तो कुछ यही सच सामने आया।
सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले की कुल आबादी 10 लाख 61 हजार 204 है। इनमें से करीब पांच लाख की आबादी रोहतक शहर यानी नगर निगम क्षेत्र की है। शेष आबादी जिले के 147 गांवों के अलावा एक नगर पालिका व दो नगर परिषदों में बसती है। आबादी का यह आंकड़ा भी वर्ष 2011 की जनगणना है, जबकि पिछल एक दशक में जिले की आबादी में भी वृद्धि हुई है। इस आबादी को रोजाना सुबह उठकर चाय पीने से लेकर रात सोने से पहले तक दूध की जरूरत पड़ती है। जिले की दस लाख की आबादी के लिए एक लीटर प्रति व्यक्ति के हिसाब से ही जिले को रोजाना करीब दस लाख लीटर दूध की जरूरत है। जबकि उत्पादन इसके विपरीत करीब 3.50 लाख लीटर होता है। इसमें से भी रोजाना बड़ी मात्रा में दूध रसगुल्ले, पनीर, दही, घी व मिठाई बनाने में इस्तेमाल होता है। यह कुल उत्पादन का यदि ढाई लाख लीटर मान लिया जाए तो जिले की आबादी के लिए एक लाख लीटर दूध ही बचता है। या यूं कहें कि प्रति व्यक्ति महज 10 ग्राम दूध मिलता है। जबकि चाय बनाने, दूध पीने व अन्य में इस्तेमाल के लिए इससे अधिक मात्रा में दूध की जरूरत पड़ती है। दूध की मांग व इसकी आपूर्ति में बड़ा अंतर साफ बताता है कि कहीं न कहीं दूध के धंधे में काला खेल हो रहा है। दूध की मांग व पूर्ति अपने आपमें सवाल खड़े कर रहे हैं।
रोजाना चाय में ही इस्तेमाल होते हैं हजारों लीटर दूध
जिले में एक अनुमान के मुताबिक, एक हजार से अधिक चाय विक्रेता हैं। इनमें से कुछ छोटे स्टाल लगाने वाले तो कुछ बड़े रेस्टोरेंट व स्टाइलिश चाय विक्रेता शामिल हैं। प्रति दुकान पर रोजाना औसतन 500 से एक हजार कप चाय बेची जा रही हैं। यदि एक दुकान पर रोजाना कम से कम पांच लीटर दूध की जरूरत पड़ती है तो करीब पांच हजार लीटर दूध केवल चाय बनाने में इस्तेमाल हो जाता है। इसके अलावा शादी, जन्मदिन व अन्य पार्टियां अलग हैं।
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खिलाड़ियों को पड़ती है दूध की जरूरत
जिले में करीब 15000 से अधिक खिलाड़ी हैं। इसके अलावा 15 से अधिक अखाड़ों के पहलवान रोजाना दमखम आजमाते हैं। इन्हें कड़ी कसरत के बाद बेहतर डाइट के लिए दूध की जरूरत पड़ती है। औसतन एक खिलाड़ी को एक लीटर दूध दिया जो भी करीब 20 हजार लीटर से अधिक दूध की जरूरत पड़ती है। पीजीआई में भी मरीजों के लिए दूध की बड़ी खपत होती है। इस तरह से दूध की पूर्ति होना अपने आप में सवाल पैदा करते हैं।
आंखों के सामने निकलवाते हैं दूध
खाने-पीने के शौकीन खासकर दूध पीने वाले अपने आहार में किसी तरह की मिलावट पसंद नहीं करते हैं। यह शहर के लोगों का अपना अंदाज है। यही वजह है कि रोज अलसुबह व शाम को दूध निकालते समय वे डोली लेकर डेयरी संचालक के घर पहुंच जाते हैं। अपनी आंखों के सामने शुद्ध दूध दोहन कराते हैं व उसे घर लाकर उपयोग करते हैं। इसमें कहीं कोई कोताही नहीं बरती जाती है। इस कारण डेयरियों पर दूध का भाव करीब 70 रुपये प्रति लीटर तक है, जबकि बाहर दूध विक्रेता 60 से 62 रुपये लीटर के हिसाब से दूध बेचते हैं। शुद्ध दूध की मांग के चलते शहर में डेयरी उद्योग फल फूल रहा है।
दूध में पानी और पाउडर वाले दूध से की जा रही पूर्ति
जिले में उत्पादन से अधिक बनी मांग व इसकी पूर्ति दूध की गुणवत्ता पर सवाल उठा रही है। दूध के कारोबार से जुड़े कुछ लोगों से बातचीत करने पर सामने आया कि दूध में पानी का इस्तेमाल भरपूर होता है। यही नहीं, सूखा दूध यानी पाउडर को पानी में घोलकर भी दूध तैयार किया जा रहा है। यही दूध अतिरिक्त मांग की पूर्ति का जरिया बना हुआ है। इसके अलावा मिल्क प्लांट भी लोगों को घर-द्वार पर दूध मुहैया करा कर राहत पहुंचा रहे हैं। इसमें वीटा, मदर डेयरी, अमूल सरीखे बड़े प्लांट शामिल हैं। इनके उत्पाद की बड़ी मांग है। यहां से आपूर्ति नहीं होने पर दूध किल्लत बढ़ जाती है।
शहर में हैं 500 से ज्यादा डेयरियां
शहर में 500 से ज्यादा दूध की डेयरियां हैं। इनमें 5, 15 से लेकर इससे ज्यादा तक अच्छी नस्ल की भैंस रखी जाती हैं। इनका दुग्ध उत्पादन 20 लीटर से कम नहीं होता है। यही नहीं, 60 डेयरियां भैंस की खरीद फरोख्त का काम करती हैं। यहां भी औसतन दस भैंस एक डेयरी पर होती हैं। यह संख्या कम-ज्यादा होती रहती है। डेयरियों से दूध की मांग घरों के अलावा हलवाई मिठाई व पनीर बनाने के लिए करता है। इसलिए यहीं दूध की खपत हो जाती है। बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। शुद्ध दूध की मांग रहती है। लोग सामने दूध निकलवाते हैं और ले जाते हैं। ऐसे में मिलावट की गुंजाइश ही नहीं रहती। जहां तक सिंथेटिक दूध का सवाल है, यहां ऐसा नहीं है। हां, कुछ लोग पानी या मिल्क प्लांट का दूध जरूर मिला लेते हैं। नंद किशोर कपूर, सरपरस्त, डेयरी एसोसिएशन रोहतक।
दो साल में लिए दूध के 19 सैंपल, 8 सब स्टैंडर्ड और एक असुरक्षित मिला
जिले में दूध की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए एफडीए यानी खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग है। विभाग के पिछले दो साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां दूध के 19 सैंपल लिए गए। इनमें से 8 सब स्टैंडर्ड यानी कम फैट वाले व एक सैंपल मिलावटी पाया गया। इन मामलों में एडीसी को कार्रवाई का अधिकार है। दूध की गुणवत्ता को लेकर सैंपलिंग की जाती है। यह काम लगातार जारी रहेगा। -डॉ. जोगेंद्र सिंह, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, एफडीए।
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सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले की कुल आबादी 10 लाख 61 हजार 204 है। इनमें से करीब पांच लाख की आबादी रोहतक शहर यानी नगर निगम क्षेत्र की है। शेष आबादी जिले के 147 गांवों के अलावा एक नगर पालिका व दो नगर परिषदों में बसती है। आबादी का यह आंकड़ा भी वर्ष 2011 की जनगणना है, जबकि पिछल एक दशक में जिले की आबादी में भी वृद्धि हुई है। इस आबादी को रोजाना सुबह उठकर चाय पीने से लेकर रात सोने से पहले तक दूध की जरूरत पड़ती है। जिले की दस लाख की आबादी के लिए एक लीटर प्रति व्यक्ति के हिसाब से ही जिले को रोजाना करीब दस लाख लीटर दूध की जरूरत है। जबकि उत्पादन इसके विपरीत करीब 3.50 लाख लीटर होता है। इसमें से भी रोजाना बड़ी मात्रा में दूध रसगुल्ले, पनीर, दही, घी व मिठाई बनाने में इस्तेमाल होता है। यह कुल उत्पादन का यदि ढाई लाख लीटर मान लिया जाए तो जिले की आबादी के लिए एक लाख लीटर दूध ही बचता है। या यूं कहें कि प्रति व्यक्ति महज 10 ग्राम दूध मिलता है। जबकि चाय बनाने, दूध पीने व अन्य में इस्तेमाल के लिए इससे अधिक मात्रा में दूध की जरूरत पड़ती है। दूध की मांग व इसकी आपूर्ति में बड़ा अंतर साफ बताता है कि कहीं न कहीं दूध के धंधे में काला खेल हो रहा है। दूध की मांग व पूर्ति अपने आपमें सवाल खड़े कर रहे हैं।
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रोजाना चाय में ही इस्तेमाल होते हैं हजारों लीटर दूध
जिले में एक अनुमान के मुताबिक, एक हजार से अधिक चाय विक्रेता हैं। इनमें से कुछ छोटे स्टाल लगाने वाले तो कुछ बड़े रेस्टोरेंट व स्टाइलिश चाय विक्रेता शामिल हैं। प्रति दुकान पर रोजाना औसतन 500 से एक हजार कप चाय बेची जा रही हैं। यदि एक दुकान पर रोजाना कम से कम पांच लीटर दूध की जरूरत पड़ती है तो करीब पांच हजार लीटर दूध केवल चाय बनाने में इस्तेमाल हो जाता है। इसके अलावा शादी, जन्मदिन व अन्य पार्टियां अलग हैं।
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खिलाड़ियों को पड़ती है दूध की जरूरत
जिले में करीब 15000 से अधिक खिलाड़ी हैं। इसके अलावा 15 से अधिक अखाड़ों के पहलवान रोजाना दमखम आजमाते हैं। इन्हें कड़ी कसरत के बाद बेहतर डाइट के लिए दूध की जरूरत पड़ती है। औसतन एक खिलाड़ी को एक लीटर दूध दिया जो भी करीब 20 हजार लीटर से अधिक दूध की जरूरत पड़ती है। पीजीआई में भी मरीजों के लिए दूध की बड़ी खपत होती है। इस तरह से दूध की पूर्ति होना अपने आप में सवाल पैदा करते हैं।
आंखों के सामने निकलवाते हैं दूध
खाने-पीने के शौकीन खासकर दूध पीने वाले अपने आहार में किसी तरह की मिलावट पसंद नहीं करते हैं। यह शहर के लोगों का अपना अंदाज है। यही वजह है कि रोज अलसुबह व शाम को दूध निकालते समय वे डोली लेकर डेयरी संचालक के घर पहुंच जाते हैं। अपनी आंखों के सामने शुद्ध दूध दोहन कराते हैं व उसे घर लाकर उपयोग करते हैं। इसमें कहीं कोई कोताही नहीं बरती जाती है। इस कारण डेयरियों पर दूध का भाव करीब 70 रुपये प्रति लीटर तक है, जबकि बाहर दूध विक्रेता 60 से 62 रुपये लीटर के हिसाब से दूध बेचते हैं। शुद्ध दूध की मांग के चलते शहर में डेयरी उद्योग फल फूल रहा है।
दूध में पानी और पाउडर वाले दूध से की जा रही पूर्ति
जिले में उत्पादन से अधिक बनी मांग व इसकी पूर्ति दूध की गुणवत्ता पर सवाल उठा रही है। दूध के कारोबार से जुड़े कुछ लोगों से बातचीत करने पर सामने आया कि दूध में पानी का इस्तेमाल भरपूर होता है। यही नहीं, सूखा दूध यानी पाउडर को पानी में घोलकर भी दूध तैयार किया जा रहा है। यही दूध अतिरिक्त मांग की पूर्ति का जरिया बना हुआ है। इसके अलावा मिल्क प्लांट भी लोगों को घर-द्वार पर दूध मुहैया करा कर राहत पहुंचा रहे हैं। इसमें वीटा, मदर डेयरी, अमूल सरीखे बड़े प्लांट शामिल हैं। इनके उत्पाद की बड़ी मांग है। यहां से आपूर्ति नहीं होने पर दूध किल्लत बढ़ जाती है।
शहर में हैं 500 से ज्यादा डेयरियां
शहर में 500 से ज्यादा दूध की डेयरियां हैं। इनमें 5, 15 से लेकर इससे ज्यादा तक अच्छी नस्ल की भैंस रखी जाती हैं। इनका दुग्ध उत्पादन 20 लीटर से कम नहीं होता है। यही नहीं, 60 डेयरियां भैंस की खरीद फरोख्त का काम करती हैं। यहां भी औसतन दस भैंस एक डेयरी पर होती हैं। यह संख्या कम-ज्यादा होती रहती है। डेयरियों से दूध की मांग घरों के अलावा हलवाई मिठाई व पनीर बनाने के लिए करता है। इसलिए यहीं दूध की खपत हो जाती है। बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। शुद्ध दूध की मांग रहती है। लोग सामने दूध निकलवाते हैं और ले जाते हैं। ऐसे में मिलावट की गुंजाइश ही नहीं रहती। जहां तक सिंथेटिक दूध का सवाल है, यहां ऐसा नहीं है। हां, कुछ लोग पानी या मिल्क प्लांट का दूध जरूर मिला लेते हैं। नंद किशोर कपूर, सरपरस्त, डेयरी एसोसिएशन रोहतक।
दो साल में लिए दूध के 19 सैंपल, 8 सब स्टैंडर्ड और एक असुरक्षित मिला
जिले में दूध की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए एफडीए यानी खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग है। विभाग के पिछले दो साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां दूध के 19 सैंपल लिए गए। इनमें से 8 सब स्टैंडर्ड यानी कम फैट वाले व एक सैंपल मिलावटी पाया गया। इन मामलों में एडीसी को कार्रवाई का अधिकार है। दूध की गुणवत्ता को लेकर सैंपलिंग की जाती है। यह काम लगातार जारी रहेगा। -डॉ. जोगेंद्र सिंह, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, एफडीए।