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झाड़ फूंक व देसी उपचार बना रहा पैरालाइज

Thu, 28 Oct 2021 01:09 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 28 Oct 2021 01:09 AM IST
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Paralyze making desi treatment and blowing
21वीं सदी में भी झाड़-फूंक व देसी उपचार पर लोगों का विश्वास कायम है। देसी इलाज के चक्कर में स्ट्रोक पीड़ितों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है। नतीजतन स्ट्रोक लोगों को पैरालाइज बना रहा है। ऐसे मरीजों के लिए शुरुआती तीन से चार घंटे अहम है। इसे विंडो पीरियड कहते हैं। इस दौरान मरीज को इलाज मुहैया कर उसे पैरालाइज होने से बचाया जा सकता है।
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हाई ब्लड प्रेशर स्ट्रोक की बड़ी वजह है। आमतौर पर हम इसके इलाज को लेकर लापरवाही बरतते हैं। इसके बढ़ने या लक्षण नजर आने पर भी परहेज या इलाज नहीं लेते हैं। नतीजतन कई बार दिमाग की नस रुक या फट जाती है। यह स्थिति मरीजों के लिए खतरनाक होती है। ऐसे मरीजों को शुरुआती चार घंटे में इलाज देना जरूरी है। इलाज के लिए मरीज को एक इंजेक्शन देकर पैरालाइज होने से बचाया जा सकता है।
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रक्तचाप पर नियंत्रण करना जरूरी
वर्तमान समय में भाग दौड़ व तनाव भरे जीवन में ज्यादातर लोगों का रक्तचाप (बीपी) अनियंत्रित हो जाता है। यह कम या ज्यादा हो सकता है। इसे नियंत्रण में रखना जरूरी है। इससे शरीर के दूसरे अंगों को भी सुरक्षित रखा जा सकता है। जबकि इस ओर लापरवाही बीमार बना सकती है।
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हर माह आते हैं ऐसे 100 मरीज
पीजीआई के मेडिसन विभाग में पैरालाइसिस के मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। हर माह इस विभाग की विभिन्न यूनिटों में करीब 100 मरीज आ रहे हैं। कुछ केस आपात विभाग में भी पहुंचते हैं। स्ट्रोक केसों की बढ़ती संख्या को देखते हुए इस बार डब्ल्यूएचओ ने स्ट्रोक से पहले स्ट्रोक के लक्षण को पहचाने की थीम तय की है। इसके तहत लोगों को स्ट्रोक के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
इन लक्षणों का रखें ध्यान
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, स्ट्रोक से बचाव के लिए इसके लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है। इसमें सबसे अहम एफएएसटी है। एफ का अर्थ फेस यानी चेहरे की कमजोरी, ए का अर्थ आर्म यानी बाजू की कमजोरी, एस का अर्थ स्पीच यानी आवाज में बदलाव आना, टी का अर्थ टाइम यानी समय बर्बाद न करें। इसका किसी भी तरह उल्लंघन न करें। ये स्ट्रोक या इससे पहले के लक्षण होते हैं। इनकी लापरवाही न करें। दिमाग की एमआरआई के जरिये इसकी पहचान कर इलाज किया जा सकता है।

संस्थान में स्ट्रोक के केस आते हैं। आपात विभाग में ऐसे मरीज गंभीर स्थिति में इलाज लेने पहुंचते हैं। स्ट्रोक आने पर लोग इलाज का शुरुआती समय झाड़ फूंक में बर्बाद कर देते हैं। इस परिस्थिति में मरीज को पूरी तरह ठीक कर पाना मुश्किल हो जाता है। शरीर के किसी अंग पर स्ट्रोक होते ही मरीज को अस्पताल ले जाना चाहिए। यहां उसे स्ट्रोक आने के चार घंटे में इंजेक्शन देकर पैरालाइज होने से बचाया जा सकता है।
- डॉ. सुरेखा डाबला, अध्यक्ष, न्यूरोलॉजी विभाग, पीजीआईएमएस
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