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सुप्रीम कोर्ट: मुल्कराज की किडनी खराब करने वाले डॉक्टरों व निजी अस्पताल को ब्याज समेत देने होंगे 15 लाख, नेशनल कंज्यूमर फोरम का फैसला बरकरार

Thu, 28 Apr 2022 02:03 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Thu, 28 Apr 2022 02:03 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सीय लापरवाही के मामले में नेशनल कंज्यूमर फोरम का फैसला बरकरार रखते हुए अस्पताल की याचिका खारिज की है। मुल्कराज धमीजा की शिकायत पर दिल्ली मेडिकल काउंसिल व मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी एक महा के लिए चिकित्सकों के लाइसेंस रद्द कर दिए थे।

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Supreme Court upholds National Consumer Forum decision on medical negligence in kidney failure case of MulkRaj
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली रोहिणी के निजी अस्पताल में 16 साल पहले किडनी का ऑपरेशन कराने वाले मुल्कराज धमीजा के हक में फैसला दिया है। बगैर किडनी ट्रांसप्लांट लाइसेंस के मरीज की किडनी बदलने व उसे खराब करने वाले डॉक्टरों व अस्पताल को उन्हें 15 लाख रुपये ब्याज समेत देने होंगे। अदालत ने वर्ष 2018 में दिए गए नेशनल कंज्यूमर फोरम के फैसले को बरकरार रखते हुए अस्पताल की ओर से लगाई गई याचिका को खारिज कर दिया है। 

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एडवोकेट तुषार पानवाब ने बताया कि केस के दौरान डायरेक्टर हेल्थ सर्विसेज से आरटीआई के तहत कुछ जानकारी मांगी। इसमें सामने आया कि अस्पताल के पास ऑपरेशन करने के दौरान ऑर्गन ट्रांसप्लांट का लाइसेंस नहीं था। इसके बाद हमने अपने एविडेंस व रिजॉइंडर में यह बातें राष्ट्रीय उपभोक्ता न्यायालय के सामने प्रस्तुत की।
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इन्हें मध्य नजर रखते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता न्यायालय ने फैसला मरीज के पक्ष में सुनाया। इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने वाले अस्पताल व डॉक्टरों की अपील खारिज कर दी गई है। इससे पहले भी मुल्कराज धमीजा की शिकायत पर दिल्ली मेडिकल काउंसिल व मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इन दोनों चिकित्सकों के लाइसेंस एक महीने के लिए रद्द कर दिए थे। 
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यह है मामला 
हरियाणा के रोहतक निवासी मुल्कराज धमीजा ने वर्ष 2006 में किडनी ट्रांसप्लांट का कराई थी। यह ऑपरेशन दिल्ली रोहिणी के निजी अस्पताल में हुआ था। उन्हें किडनी पत्नी पिंकी देवी ने दी थी। उनकी दोनों किडनियां खराब होने के चलते ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ी। ऑपरेशन से पहले डॉक्टर ने अस्पताल के पास किडनी ट्रांसप्लांट का लाइसेंस सरकार से प्राप्त होने का दावा किया था। अस्पताल को अधिकृत किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर बताया गया।

ऑपरेशन में डॉक्टरों ने अनेक अनियमितताएं बरती। इस कारण ट्रांसप्लांट के बाद आपरेशन कामयाब नहीं हुआ और पत्नी की दी किडनी भी खराब हो गई। मरीज को यह भी नहीं बताया गया कि अस्पताल का लाइसेंस वर्ष 2006 में ऑपरेशन की तारीख से पहले समाप्त हो चुका है। अस्पताल ने इसे रिन्यू नहीं कराया है। अस्पताल की लापरवाही के चलते मरीज को चेन्नई में जाकर डैड  किडनी निकलवानी पड़ी। डॉक्टर की लापरवाही का पता चला तो उन्होंने वर्ष 2007 में नेशनल कंजूमर फोरम में याचिका दायर की। फोरम ने वर्ष 2018 में मरीज के पक्ष में फैसला सुनाया। 


फोरम ने यह की थी टिप्पणी 
नेशनल उपभोक्ता न्यायालय ने यह कहते हुए कि यदि किसी हवाई जहाज का पायलट हवाई जहाज चलाना जानता हो परंतु उसके पास लाइसेंस न हो तो क्या एयरलाइंस हवाई जहाज और उसमें बैठे सैकड़ों यात्रियों की जिंदगी उसके हाथ में दे सकती है, कभी नहीं। इसी तरह किसी भी इंस्टीट्यूशन के पास यदि लाइसेंस नहीं है तो वह चाहे डॉक्टर एक्सपर्ट रखते हों वे ऑपरेशन करना जानते हों परंतु लाइसेंस के बगैर ऑपरेशन करना अवैध है। इसलिए माननीय राष्ट्रीय उपभोक्ता न्यायालय ने 10 लाख रुपये अस्पताल को वादी मुल्कराज धमीजा को देने व दो डॉक्टरों को 5 लाख रुपये वादी को देने का आदेश दिया। न्यायालय ने यह पैसा देने में देरी होने पर नौ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज देना भी तय किया। अस्पताल व डॉक्टरों ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।

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