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12 अगस्त पर बनी सहमति, भक्त घरों में ही मनाएंगे पर्व
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Consent made on August 12, devotees will celebrate the festival in their own homes
- फोटो : RohtakCity
जन्माष्टमी की तिथि को लेकर चल रहा विरोधाभास सोमवार को बाबा लक्ष्मणपुरी डेरा में आयोजित धर्म संसद में समाप्त हो गया। यहां सभी की सहमति बनी की 12 अगस्त को ही पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। कोरोना संक्रमण को देखते हुए इस बार मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर झांकियां नहीं निकाली जाएगी। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण का झूला लगाया जाएगा और शांतिपूर्वक जन्माष्टमी मनाई जाएगी।
सोमवार को डेरे में आयोजित धर्म संसद में शहर के विभिन्न मंदिरों के पुजारी, ब्राह्मण, ज्योतिषाचार्य शामिल हुए। धर्म संसद की अध्यक्षता महामंडलेश्वर कपिलपुरी महाराज व महंत कमलपुरी ने की। इसमें एक्सपर्ट की राय के लिए वृंदावन से एक ज्योतिषाचार्य को भी लाइव जोड़ा गया। सभी पक्षों को सुनने के बाद महामंडलेश्वर कपिलपुरी ने कहा कि जन्माष्टमी पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा। मठाधीश ने बताया कि अनादि काल से अष्टमी युक्ता नवमी में ही जन्माष्टमी पर्व मान्य होता है। इसी मत पर दुर्गा भवन मंदिर के पुजारी आचार्य मनोज मिश्रा अडिग हैँ। भविष्य में इस तरह का विवाद उत्पन्न न हो, इसके लिए पहले ही विद्वानों से डेरे की ओर से साल भर के पर्वों के कैलेंडर तैयार करवाए जाएंगे। पुजारी मनोज ने बताया की सूर्योदय कालीन अष्टमी नवमी युक्ता में ही श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर्व मनाया जाता है। 2019, 2018 को भी सूर्योदय कालीन अष्टमी नवमी युक्त में ही जन्माष्टमी पर्व मनाया गया। इस पर कुछ विद्वानों का अलग मत आ रहा था, जबकि सनातन धर्म में एकादशी और जन्माष्टमी पर ये दो सिद्धांत लागू होते हैं। एक इसमार्त और दूसरा वैष्णव व सन्यासी, जोकि अनादि काल से चला आ रहा है। श्रीमद्भागवत कथा व्यास कृष्ण ने बताया भगवान कृष्ण के उपासक सभी वैष्णव की श्रेणी में ही आते हैं और कृष्ण जन्माष्टमी में भगवान कृष्ण की ही सभी पूजा करते हैं। इसीलिए देश ही नहीं संपूर्ण विश्व में 12 अगस्त को ही जन्माष्टमी पर्व मनाया जा रहा है। माता मंदिर के पुजारी कमल ने तर्क दिया कि तिथि को लेकर कोई भ्रम की स्थिति नहीं है। कुछ विद्वानों को आपत्ति थी तो वह धर्म संसद में दूर हो गई है। वहीं दुर्गा भवन के पुजारी विष्णु प्रसाद शर्मा ने पक्ष रखा कि जब हर साल सूर्योदय कालीन अष्टमी नवमी युक्ता में मनाई जाती रही है तो अब नई प्रथा क्यों शुरू की जा रही है। वैष्णो देवी मंदिर के महंत ज्योतिषाचार्य खुशी राम ने बताया कि मैंने अपने जीवन में कभी ऐसा नहीं सुना कि लोग व्रत एक दिन पहले रखें और मंदिरों में जन्माष्टमी अगले दिन मनाई गई हो और इस बार भी ऐसा नहीं होगा। इस अवसर पर पंडित हेमंत शर्मा, अनुराग शास्त्री, अरुण मिश्रा, दीपक शर्मा, कमल नयन मिश्रा, ऋषि, राम शर्मा, रवि मिश्रा, दीपक शास्त्री, घनश्याम शास्त्री, काकू शर्मा, सन्नी शर्मा, परशुराम पांडेय, पंडित संदीप पाठक, आचार्य जय प्रकाश, वरदान वशिष्ठ आदि मौजूद रहे। गौरतलब है इस मामले में रविवार को बाबा बालकपुरी डेरा में शास्त्रार्थ हुआ था, जब सभी एकमत नहीं हुए तो सोमवार को फिर धर्म संसद बाबा लक्ष्मणपुरी डेरा में आयोजित हुई। बैठक में पंडित संदीप पाठक ने कहा कि वह 11 अगस्त को व्रत रखेंगे और 12 को पर्व मनाएंगे। इस पर महामंडलेश्वर ने कहा कि भगवान के निमित कोई कभी भी व्रत रख सकता है, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है।
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सोमवार को डेरे में आयोजित धर्म संसद में शहर के विभिन्न मंदिरों के पुजारी, ब्राह्मण, ज्योतिषाचार्य शामिल हुए। धर्म संसद की अध्यक्षता महामंडलेश्वर कपिलपुरी महाराज व महंत कमलपुरी ने की। इसमें एक्सपर्ट की राय के लिए वृंदावन से एक ज्योतिषाचार्य को भी लाइव जोड़ा गया। सभी पक्षों को सुनने के बाद महामंडलेश्वर कपिलपुरी ने कहा कि जन्माष्टमी पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा। मठाधीश ने बताया कि अनादि काल से अष्टमी युक्ता नवमी में ही जन्माष्टमी पर्व मान्य होता है। इसी मत पर दुर्गा भवन मंदिर के पुजारी आचार्य मनोज मिश्रा अडिग हैँ। भविष्य में इस तरह का विवाद उत्पन्न न हो, इसके लिए पहले ही विद्वानों से डेरे की ओर से साल भर के पर्वों के कैलेंडर तैयार करवाए जाएंगे। पुजारी मनोज ने बताया की सूर्योदय कालीन अष्टमी नवमी युक्ता में ही श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर्व मनाया जाता है। 2019, 2018 को भी सूर्योदय कालीन अष्टमी नवमी युक्त में ही जन्माष्टमी पर्व मनाया गया। इस पर कुछ विद्वानों का अलग मत आ रहा था, जबकि सनातन धर्म में एकादशी और जन्माष्टमी पर ये दो सिद्धांत लागू होते हैं। एक इसमार्त और दूसरा वैष्णव व सन्यासी, जोकि अनादि काल से चला आ रहा है। श्रीमद्भागवत कथा व्यास कृष्ण ने बताया भगवान कृष्ण के उपासक सभी वैष्णव की श्रेणी में ही आते हैं और कृष्ण जन्माष्टमी में भगवान कृष्ण की ही सभी पूजा करते हैं। इसीलिए देश ही नहीं संपूर्ण विश्व में 12 अगस्त को ही जन्माष्टमी पर्व मनाया जा रहा है। माता मंदिर के पुजारी कमल ने तर्क दिया कि तिथि को लेकर कोई भ्रम की स्थिति नहीं है। कुछ विद्वानों को आपत्ति थी तो वह धर्म संसद में दूर हो गई है। वहीं दुर्गा भवन के पुजारी विष्णु प्रसाद शर्मा ने पक्ष रखा कि जब हर साल सूर्योदय कालीन अष्टमी नवमी युक्ता में मनाई जाती रही है तो अब नई प्रथा क्यों शुरू की जा रही है। वैष्णो देवी मंदिर के महंत ज्योतिषाचार्य खुशी राम ने बताया कि मैंने अपने जीवन में कभी ऐसा नहीं सुना कि लोग व्रत एक दिन पहले रखें और मंदिरों में जन्माष्टमी अगले दिन मनाई गई हो और इस बार भी ऐसा नहीं होगा। इस अवसर पर पंडित हेमंत शर्मा, अनुराग शास्त्री, अरुण मिश्रा, दीपक शर्मा, कमल नयन मिश्रा, ऋषि, राम शर्मा, रवि मिश्रा, दीपक शास्त्री, घनश्याम शास्त्री, काकू शर्मा, सन्नी शर्मा, परशुराम पांडेय, पंडित संदीप पाठक, आचार्य जय प्रकाश, वरदान वशिष्ठ आदि मौजूद रहे। गौरतलब है इस मामले में रविवार को बाबा बालकपुरी डेरा में शास्त्रार्थ हुआ था, जब सभी एकमत नहीं हुए तो सोमवार को फिर धर्म संसद बाबा लक्ष्मणपुरी डेरा में आयोजित हुई। बैठक में पंडित संदीप पाठक ने कहा कि वह 11 अगस्त को व्रत रखेंगे और 12 को पर्व मनाएंगे। इस पर महामंडलेश्वर ने कहा कि भगवान के निमित कोई कभी भी व्रत रख सकता है, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है।
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