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इम् प्लांट मामला
Updated Mon, 10 Sep 2018 02:32 AM IST
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पीजीआई में मरीजों को सस्ते इम्प्लांट मिलना आसान नहीं
- निजी सप्लायरों ने कोर्ट में डाला केस, अमृत प्रोजेक्ट लटका
- संस्थान की राजनीति ने एसीएस हेल्थ के दावों को किया फेल
- पुलिस के अलावा जीएसटी ने भी साधी है पूरे मामले में चुप्पी
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक। पीजीआईएमएस में जब्त दो करोड़ के इम्प्लांट और निजी इम्प्लांट सप्लायरों के संस्थान में प्रवेश पर प्रतिबंध लगने से मरीजों के साथ-साथ डॉक्टर और सप्लायर भी परेशान हैं। निजी इम्प्लांट सप्लायरों ने तो संस्थान में खुलने वाले अमृत स्टोर के खिलाफ ही कोर्ट में केस डाल दिया, ऐसे में लेटलतीफी का शिकार प्रोजेक्ट और लेट होना तय है। ऐसे में मरीजों को सरकार की घोषणा के बावजूद सस्ते इम्प्लांट की उपलब्धता महज सपना ही होगी।
ऑर्थो विभाग के डॉक्टर व निजी इम्प्लांट सप्लायर की सांठगांठ एक बार फिर जाहिर हो रही है। क्योंकि डॉक्टरों की इच्छानुसार इम्प्लांट नहीं आ रहे तो मरीजों को ठोकरें खानी पड़ रही हैं। समस्या का समाधान करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के एडिशन चीफ सेक्रेटरी अमित झा ने कदम उठाया और घोषण करते हुए कहा कि एक माह के अंदर सरकार की ओर से तय कीमत पर इम्प्लांट उपलब्ध कराने के लिए अमृत स्टोर खुलवा दिया जाएगा। अमृत स्टोर खुलना तो दूर इसके स्टोर के लिए डेढ़ माह बाद भी रिनोवेशन का कार्य पूरा नहीं हुआ है। निजी इम्प्लांट सप्लायरों ने कोर्ट में केस डाल दिया है कि संस्थान ने बगैर टेंडर निकाले अमृत प्रोजेक्ट को जगह व कार्य अलाट कर दी। संस्थान के अधिकारी हैरान हैं कि सरकारी संस्थान में सरकार की ही पॉलिसी को लागू होने से रोका जा रहा है। निदेशक डॉ. नित्यानंद शर्मा ने इस मामले पर बताया कि जब लंबे समय से चली आ रही अव्यवस्था पर लगाम लगाई जाएगी तो समस्या तो होगी ही। आमजन की जरूरत को देखते हुए संस्थान की ओर से कोर्ट में अर्जी लगवाई जाएगी कि वह इस मामले पर विचार करें, क्योंकि यह जनता और सरकार की पॉलिसी से जुड़ा मामला है। इसके अलावा जब्त इम्प्लांट के लिए पुलिस और जीएसटी विभाग को पत्र लिखा जाएगा कि वह अपनी विभागीय कार्रवाई करें।
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करोड़ों का इम्प्लांट नहीं खोल रहा पुलिस और जीएसटी विभाग की नींद
संस्थान में जब्त किया गया दो करोड़ का इम्प्लांट न तो पुलिस प्रशासन की नींद खोल रहा है और न ही जीएसटी विभाग की। हैरानी तो इस बात की है तो दोनों विभागों को संस्थान की ओर से लिखित शिकायत मिलने का इंतजार है। अपने स्तर पर कोई अधिकारी कुछ करने को तैयार नहीं है।
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- निजी सप्लायरों ने कोर्ट में डाला केस, अमृत प्रोजेक्ट लटका
- संस्थान की राजनीति ने एसीएस हेल्थ के दावों को किया फेल
- पुलिस के अलावा जीएसटी ने भी साधी है पूरे मामले में चुप्पी
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक। पीजीआईएमएस में जब्त दो करोड़ के इम्प्लांट और निजी इम्प्लांट सप्लायरों के संस्थान में प्रवेश पर प्रतिबंध लगने से मरीजों के साथ-साथ डॉक्टर और सप्लायर भी परेशान हैं। निजी इम्प्लांट सप्लायरों ने तो संस्थान में खुलने वाले अमृत स्टोर के खिलाफ ही कोर्ट में केस डाल दिया, ऐसे में लेटलतीफी का शिकार प्रोजेक्ट और लेट होना तय है। ऐसे में मरीजों को सरकार की घोषणा के बावजूद सस्ते इम्प्लांट की उपलब्धता महज सपना ही होगी।
ऑर्थो विभाग के डॉक्टर व निजी इम्प्लांट सप्लायर की सांठगांठ एक बार फिर जाहिर हो रही है। क्योंकि डॉक्टरों की इच्छानुसार इम्प्लांट नहीं आ रहे तो मरीजों को ठोकरें खानी पड़ रही हैं। समस्या का समाधान करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के एडिशन चीफ सेक्रेटरी अमित झा ने कदम उठाया और घोषण करते हुए कहा कि एक माह के अंदर सरकार की ओर से तय कीमत पर इम्प्लांट उपलब्ध कराने के लिए अमृत स्टोर खुलवा दिया जाएगा। अमृत स्टोर खुलना तो दूर इसके स्टोर के लिए डेढ़ माह बाद भी रिनोवेशन का कार्य पूरा नहीं हुआ है। निजी इम्प्लांट सप्लायरों ने कोर्ट में केस डाल दिया है कि संस्थान ने बगैर टेंडर निकाले अमृत प्रोजेक्ट को जगह व कार्य अलाट कर दी। संस्थान के अधिकारी हैरान हैं कि सरकारी संस्थान में सरकार की ही पॉलिसी को लागू होने से रोका जा रहा है। निदेशक डॉ. नित्यानंद शर्मा ने इस मामले पर बताया कि जब लंबे समय से चली आ रही अव्यवस्था पर लगाम लगाई जाएगी तो समस्या तो होगी ही। आमजन की जरूरत को देखते हुए संस्थान की ओर से कोर्ट में अर्जी लगवाई जाएगी कि वह इस मामले पर विचार करें, क्योंकि यह जनता और सरकार की पॉलिसी से जुड़ा मामला है। इसके अलावा जब्त इम्प्लांट के लिए पुलिस और जीएसटी विभाग को पत्र लिखा जाएगा कि वह अपनी विभागीय कार्रवाई करें।
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करोड़ों का इम्प्लांट नहीं खोल रहा पुलिस और जीएसटी विभाग की नींद
संस्थान में जब्त किया गया दो करोड़ का इम्प्लांट न तो पुलिस प्रशासन की नींद खोल रहा है और न ही जीएसटी विभाग की। हैरानी तो इस बात की है तो दोनों विभागों को संस्थान की ओर से लिखित शिकायत मिलने का इंतजार है। अपने स्तर पर कोई अधिकारी कुछ करने को तैयार नहीं है।
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