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विश्व शरणार्थी दिवस: धर्म और देश के लिए सब कुछ छोड़ा, बंटवारे की टीस आज भी दिलों में जिंदा

Fri, 19 Jun 2026 11:36 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी Updated Fri, 19 Jun 2026 11:36 PM IST
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World Refugee Day: Left everything behind for faith and country; the pain of Partition remains alive in hearts even today.
सचिन मलिक
रेवाड़ी। देश के बंटवारे की त्रासदी झेलकर रेवाड़ी में बसे पंजाबी समाज के लोगों ने पूर्वजों के संघर्ष और त्याग को याद किया।
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सेक्टर-3 निवासी पंजाबी समाज के प्रधान सचिन मलिक ने बताया कि उनके पूर्वज संयुक्त पंजाब के मियांवाली, झंग और मुल्तान जिलों में रहते थे। देश के विभाजन के समय लोगों को अपने घर, जमीन-जायदाद, कारोबार और वर्षों की मेहनत से बनाई संपत्ति छोड़नी पड़ी। धर्म और देश के प्रति आस्था के कारण लोगों ने भारत को चुना और सब कुछ त्यागकर यहां आ गए। यह त्याग किसी भी बलिदान से कम नहीं था। उन्होंने बताया कि पहले समाज के कई परिवार आसपास के गांवों में रहते थे लेकिन समय के साथ अधिकांश लोग शहर में आकर बस गए। वर्तमान में जिले में पंजाबी समाज के 30 हजार से अधिक वोटर हैं।
कृष्णा नगर निवासी और पंचनंद के सदस्य वरुण गांधी ने बताया कि उनका परिवार पाकिस्तान के मियांवाली जिले की ईसाखेल तहसील के गांव कलूर का था। विभाजन के दौरान परिवार भारत आ गया लेकिन उस समय हमारे परिवार के ही दो भाई सरकारी नौकरी के कारण वहीं रह गए थे। वे ड्यूटी पर गए और फिर उनका कभी कोई पता नहीं चल पाया।
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आज भी तब पीड़ा होती है जब उन्हें शरणार्थी कहा जाता है। विभाजन के समय उनके पूर्वजों ने धर्म और देश की रक्षा के लिए अपनी जमीन-जायदाद, मकान और कारोबार छोड़ दिए थे। ऐसे लोगों को केवल शरणार्थी कहना उनके त्याग और बलिदान को कम आंकने जैसा है।
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रेवाड़ी में एक हजार से अधिक परिवार बसे थे। सरकार की ओर से इन परिवारों को पुनर्वास के तहत 45-45 गज के प्लॉट आवंटित किए गए थे। उस समय एक प्लॉट की कीमत 80 रुपये थी। जिन परिवारों में दो भाई थे, उन्हें 90 गज तक भूमि मिल गई। कृष्णा नगर में करीब 150 परिवारों को बसाया गया था। इसके अलावा मुक्तिवाड़ा कॉलोनी, मॉडल टाउन, शुक्रपुरा, खासापुरा, छिपटवाड़ा और कृष्णा नगर में आज भी बड़ी संख्या में पंजाबी समाज के लोग निवास करते हैं।
इंंसेट
12 वर्ष पहले पाकिस्तान गया था प्रतिनिधिमंडल
करीब 12 वर्ष पहले 10 से 15 लोगों का प्रतिनिधिमंडल पूर्वजों की जन्मभूमि देखने पाकिस्तान के पंजाब गया था। वहां उन्होंने पुराने गांवों और क्षेत्रों का दौरा किया। हालांकि कई स्थान पूरी तरह बदल चुके थे और गांवों में अब कोई पुराना परिचित नहीं बचा था। पूर्वजों की धरती को देखकर लोगों की भावनाएं जुड़ गईं और विभाजन की यादें फिर ताजा हो गईं।


उस दौर का दर्द आज भी ताजा:
80 वर्ष से अधिक आयु के दौलत राम चुग ने बताया कि विभाजन के समय वे बच्चे थे लेकिन उस दौर का दर्द आज भी ताजा है। उन्होंने कहा कि परिवार को अपना घर, जमीन-जायदाद और पुश्तैनी गांव छोड़कर भारत आना पड़ा। बिछड़ने और संघर्ष की वे घटनाएं आज भी नहीं भूले हैं।

सचिन मलिक

सचिन मलिक

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