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कैशलेस की वाहवाही, दैनिक जरूरतों के लिए परेशानी
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 03 Dec 2016 01:43 AM IST
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सरकारी की कैशलेस स्कीम को बढ़ावा देने की पहल बुजुर्गों के लिए परेशानी बन सकती है। बैंक शाखाओं में कैश है नहीं। ऐसे में अधिकांश बुजुर्गों को इस प्रक्रिया को समझने में दिक्कत हो रही है। इन सबके बीच बुजुर्गों के परिवार के दैनिक खर्चे चलाना भी बड़ी चुनौती हो गया है। जिलेभर की विभिन्न शाखाओं में शुक्रवार को चेस्ट से 4.2 करोड़ रुपये की राशि वितरित हुई। जिले के बैंकों में डिमांड 20 करोड़ के लगभग थी। बैंकों और एटीएम में कैश को लेकर मारामारी बरकरार रही। बैंक शाखा में पेंशन लेने पहुंचे भूतपूर्व सैनिकों और महिलाओं को पेंशन से कहीं कम कैश वितरित किया गया। बुढ़ापा पेंशन वाले कैशलेस की सराहना कर यह भी कह जाते हैं कि पहले हार्ड कैश की व्यवस्था तो पटरी पर आ जाए फिर कैशलेस की दिशा में कदम उठाए जाए। लोगों की पेंशन और वेतन खातों में पड़े हैं लेकिन पैसा नहीं निकल पा रहा है। प्रशासन और बैंककर्मी कैशलेस के प्रोग्रामों में व्यस्त हैं। दूसरी तरफ बैंक की लाइन में खड़ा किसान, मजदूर, बुजुर्ग पैसा मिलने का इंतजार कर रहा है।
परेशान हो रहा गरीब तबका
कैशलेस की सोच को लोगों की खूब वाहवाही मिल रही है। लेकिन समाज में एक तबका रेहड़ी, सब्जी, रिक्शा चालक, मजदूर-बेलदार का भी है। इस तबके को कैशलेस की प्रणाली समझने और इससे जुड़ने में लंबा वक्त लगने वाला है। इस लंबे वक्त के बीच हार्ड कैश ही इनकी प्राथमिकता है। कैशलेस का ढोल पीटने वाला प्रशासन इस तबके की मजबूरी को देखकर भी नजरअंदाज करने में लगा है।
परेशान हो रहा गरीब तबका
कैशलेस की सोच को लोगों की खूब वाहवाही मिल रही है। लेकिन समाज में एक तबका रेहड़ी, सब्जी, रिक्शा चालक, मजदूर-बेलदार का भी है। इस तबके को कैशलेस की प्रणाली समझने और इससे जुड़ने में लंबा वक्त लगने वाला है। इस लंबे वक्त के बीच हार्ड कैश ही इनकी प्राथमिकता है। कैशलेस का ढोल पीटने वाला प्रशासन इस तबके की मजबूरी को देखकर भी नजरअंदाज करने में लगा है।
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