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23 साल की उम्र में प्रियंका यादव ने शरीर कर दिया दान
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रेवाड़ी। शहर के मोहल्ला न्यू आदर्श नगर निवासी प्रियंका यादव के सिर समाजसेवा का ऐसा जुनून चढ़ा कि 23 साल की उम्र में उन्होंने अपना शरीर दान कर दिया। उनकी सोच है कि जीते जी अच्छा सोचें, अच्छा करें और मरने से पहले देश और समाज के लिए कुछ अच्छा करें, जिससे कि समाज हमेशा याद रखे।
समाज के लोगों के प्रति कुछ अलग करने का भाव एक लड़की को कैसे जिम्मेदार और मां के प्रति समर्पित बनाता है, यह महसूस करना हो प्रियंका से मिलें। वह अपनी बहनों के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। समाज में कुछ अच्छा करने के लिए लोगों के साथ मिलकर काम कर रही है। प्रियंका बताती हैं कि उनके परिवार में पुरुष नहीं थे। करीब चार साल की उम्र में सिर से पिता का साया उठने के बाद मां ने कंपनी में नौकरी की। समय ने भी तीनों बहनों, मां और इनके नाना-नानी की परीक्षा ली। नानी के चारपाई पकड़ लेने के बाद नाना का भी हौसला जवाब देने लगा। परिवार का खर्च चलाने के लिए मां को औद्योगिक कंपनी में नौकरी करनी पड़ी। परिवार में तीन बहनें होने की वजह से समाज के लोग तरह-तरह की काफी बातें करते थे, मगर उसने इसकी परवाह नहीं की।
बीए, एमए, बीएड पास करने के बाद से एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई में जुटी हैं। 2013 में समाजसेवा की ओर झुकाव हुआ और उसके बाद कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा। बचपन से किसी महिलाओं या बच्चों पर अन्याय होने पर वह न्याय के लिए आगे आती हैं। प्रियंका उम्मीद की मशाल बनकर वह अन्य युवतियों को भी प्रेरणा दे रही हैं। 28 साल की उम्र में वह रेवाड़ी नगर परिषद की स्वच्छता शांति दूत बनीं। अब इस भूमिका को बेहतर तरीके से निभा रही हैं। करीब चार साल पहले उन्होंने किडनी फेल एक युवक और उसके दो बच्चों की देख असहज हो गईं। ऐसे तमाम युवाओं की जीवन रक्षा के लिए उन्होंने ठोस निर्णय लिया। उन्होंने अपना शरीर दान करने का निर्णय लिया। परिवार और मां की सहमति मिलने के बाद इस दिशा में कदम बढ़ाया। नगर परिषद से जुड़ाव के बाद उनके प्रशंसकों की संख्या तेजी से बढ़ी। वह कहती है कि आज समाज में बेटा और बेटी के प्रति सोच बदलने की जरूरत है। अभिभावकों की ऐसी सोच बदलने के साथ देश में बहुत कुछ बदल जाएगा। आज नई युवा पीढ़ी और खासकर युवतियां इनसे प्रेरित हो रही हैं।
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समाज के लोगों के प्रति कुछ अलग करने का भाव एक लड़की को कैसे जिम्मेदार और मां के प्रति समर्पित बनाता है, यह महसूस करना हो प्रियंका से मिलें। वह अपनी बहनों के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। समाज में कुछ अच्छा करने के लिए लोगों के साथ मिलकर काम कर रही है। प्रियंका बताती हैं कि उनके परिवार में पुरुष नहीं थे। करीब चार साल की उम्र में सिर से पिता का साया उठने के बाद मां ने कंपनी में नौकरी की। समय ने भी तीनों बहनों, मां और इनके नाना-नानी की परीक्षा ली। नानी के चारपाई पकड़ लेने के बाद नाना का भी हौसला जवाब देने लगा। परिवार का खर्च चलाने के लिए मां को औद्योगिक कंपनी में नौकरी करनी पड़ी। परिवार में तीन बहनें होने की वजह से समाज के लोग तरह-तरह की काफी बातें करते थे, मगर उसने इसकी परवाह नहीं की।
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बीए, एमए, बीएड पास करने के बाद से एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई में जुटी हैं। 2013 में समाजसेवा की ओर झुकाव हुआ और उसके बाद कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा। बचपन से किसी महिलाओं या बच्चों पर अन्याय होने पर वह न्याय के लिए आगे आती हैं। प्रियंका उम्मीद की मशाल बनकर वह अन्य युवतियों को भी प्रेरणा दे रही हैं। 28 साल की उम्र में वह रेवाड़ी नगर परिषद की स्वच्छता शांति दूत बनीं। अब इस भूमिका को बेहतर तरीके से निभा रही हैं। करीब चार साल पहले उन्होंने किडनी फेल एक युवक और उसके दो बच्चों की देख असहज हो गईं। ऐसे तमाम युवाओं की जीवन रक्षा के लिए उन्होंने ठोस निर्णय लिया। उन्होंने अपना शरीर दान करने का निर्णय लिया। परिवार और मां की सहमति मिलने के बाद इस दिशा में कदम बढ़ाया। नगर परिषद से जुड़ाव के बाद उनके प्रशंसकों की संख्या तेजी से बढ़ी। वह कहती है कि आज समाज में बेटा और बेटी के प्रति सोच बदलने की जरूरत है। अभिभावकों की ऐसी सोच बदलने के साथ देश में बहुत कुछ बदल जाएगा। आज नई युवा पीढ़ी और खासकर युवतियां इनसे प्रेरित हो रही हैं।
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