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Rewari News: जांच सरकारी में, प्रसव निजी अस्पताल में करा रहीं गर्भवती
Thu, 15 Jun 2023 12:14 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Thu, 15 Jun 2023 12:14 AM IST
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शहर का नागरिक अस्पताल। संवाद
रेवाड़ी। सरकारी अस्पतालों में मरीजों के लिए निजी अस्पतालों से बेहतर वातावरण बनाया जा रहा है। इसके बावजूद सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने की बजाय मरीज अन्य निजी अस्पतालों को तवज्जो दे रहे हैं। अधिकतर मरीज प्राथमिक जांच सरकारी अस्पताल में ही करवाते हैं, लेकिन जब प्रसव की बारी आती है तो बिना किसी को बताए या बिना डॉक्टर के रेफरेंस के निजी अस्पतालों में चले जाते हैं। आरोप है कि ऐसे मामलों में प्रमुख भूमिका निजी अस्पतालों के दलाल और एंबुलेंस चालक आदि निभाते हैं। यही कारण है कि जिले में सरकारी अस्पताल में करीब 40 और निजी अस्पतालों में 60 फीसदी प्रसव हो रहा है। हालांकि स्वास्थ्य अधिकारी इस तरह के आरोपों को सिरे से नकार रहे हैं।
निजी अस्पतालों से मिलने वाले मोटे कमीशन के चक्कर में गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल में गुमराह किया जा रहा है। प्रसव को पहुंचने वाले हर गर्भवती को लापरवाही और केस बिगड़ने का हौवा दिखाकर दलाल निजी अस्पताल में ले जाने की सलाह देते हैं। इतना ही नहीं निजी अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव कराने की सलाह देकर वे कमीशन के चक्कर में खेल करते हैं। पिछले दिनों विश्रामगृह में आयोजित पीआईबी के सेमिनार कार्यक्रम में भी यह मामला काफी उछला था। सेमिनार में संबंधित चिकित्सक ने भी माना था कि जिले में इस तरह का खेल चल रहा हैै, जिस पर अंकुश लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
सरकारी अस्पतालों में गर्भवती के एंट्री करते ही नेटवर्क से जुडे़ लोग सक्रिय हो जाते हैं। आरोप है कि दलाल हमदर्दी दिखाने के बाद सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाओं की कमियों का पिटारा खोल देते हैं। सरकारी अस्पताल में मरीजों को गुमराह करने और गर्भवतियों को निजी अस्पताल ले जाने वाले नेटवर्क का मामला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। कमीशन के चक्कर में कई बार जच्चा-बच्चा की मौत तक हो जाती है। अब तक कई मामले हो चुके हैं, लेकिन अफसर इससे अंजान बने हुए हैं।
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दो से दस हजार तक मिलता है कमीशन
निजी अस्पताल गर्भवती को ले जाने पर कमीशन दो से दस हजार रुपये तक मिलता है। सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए रोज दर्जनों महिलाओं आती हैं। सरकारी अस्पताल में लापरवाही की बात बताकर अनहोनी होने की आशंका से डरा दिया जाता है। तीमारदार अपने मरीज की बेहतरी के लिए वहां से निजी अस्पताल के लिए मरीज को लेकर निकलना ही बेहतर समझते हैं। इस दौरान अस्पताल में घूम रहे दलाल उनसे मिलते हैं और निजी अस्पताल ले जाते हैं।
कोडवर्ड में बताते हैं अस्पताल
सरकारी अस्पताल में दलाल और अन्य लोगों का सक्रिय गैंग प्रसव के लिए पहुंचने वाली महिलाओं को कोडवर्ड में अस्पताल बताते हैं। इस नेटवर्क में शामिल लोगों ने मरीजों के कोडवर्ड तय कर रखे हैं। मरीजों को लाने और ले जाने तक के कोडवर्ड से आम आदमी को काले धंधे का पता नहीं चलता है। जितना गंभीर मरीज, उतना बड़ा पैकेज मिलता है। इसके हिसाब से मरीज की जेब को देखते हुए निजी अस्पताल में भेजा जाता है। उसके बाद बंदरबाट होता है।
वर्जन
सरकारी अस्पतालों में भी प्रसव का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। कमीशन का कोई चक्कर नहीं है। बेवजह लोग परेशान करते हैं। इस तरह की शिकायतों की जांच की जा चुकी है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता व अन्य बेहतर कार्य कर रहे हैं। गर्भवती महिलाएं गांव की होती हैं, इसलिए उन्हें परिजन जबरन अपने साथ ले जाते हैं। इसका गलत अर्थ निकाल लिया जाता है।
-डाॅ. सुरेंद्र यादव, सीएमओ
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निजी अस्पतालों से मिलने वाले मोटे कमीशन के चक्कर में गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल में गुमराह किया जा रहा है। प्रसव को पहुंचने वाले हर गर्भवती को लापरवाही और केस बिगड़ने का हौवा दिखाकर दलाल निजी अस्पताल में ले जाने की सलाह देते हैं। इतना ही नहीं निजी अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव कराने की सलाह देकर वे कमीशन के चक्कर में खेल करते हैं। पिछले दिनों विश्रामगृह में आयोजित पीआईबी के सेमिनार कार्यक्रम में भी यह मामला काफी उछला था। सेमिनार में संबंधित चिकित्सक ने भी माना था कि जिले में इस तरह का खेल चल रहा हैै, जिस पर अंकुश लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
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सरकारी अस्पतालों में गर्भवती के एंट्री करते ही नेटवर्क से जुडे़ लोग सक्रिय हो जाते हैं। आरोप है कि दलाल हमदर्दी दिखाने के बाद सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाओं की कमियों का पिटारा खोल देते हैं। सरकारी अस्पताल में मरीजों को गुमराह करने और गर्भवतियों को निजी अस्पताल ले जाने वाले नेटवर्क का मामला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। कमीशन के चक्कर में कई बार जच्चा-बच्चा की मौत तक हो जाती है। अब तक कई मामले हो चुके हैं, लेकिन अफसर इससे अंजान बने हुए हैं।
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दो से दस हजार तक मिलता है कमीशन
निजी अस्पताल गर्भवती को ले जाने पर कमीशन दो से दस हजार रुपये तक मिलता है। सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए रोज दर्जनों महिलाओं आती हैं। सरकारी अस्पताल में लापरवाही की बात बताकर अनहोनी होने की आशंका से डरा दिया जाता है। तीमारदार अपने मरीज की बेहतरी के लिए वहां से निजी अस्पताल के लिए मरीज को लेकर निकलना ही बेहतर समझते हैं। इस दौरान अस्पताल में घूम रहे दलाल उनसे मिलते हैं और निजी अस्पताल ले जाते हैं।
कोडवर्ड में बताते हैं अस्पताल
सरकारी अस्पताल में दलाल और अन्य लोगों का सक्रिय गैंग प्रसव के लिए पहुंचने वाली महिलाओं को कोडवर्ड में अस्पताल बताते हैं। इस नेटवर्क में शामिल लोगों ने मरीजों के कोडवर्ड तय कर रखे हैं। मरीजों को लाने और ले जाने तक के कोडवर्ड से आम आदमी को काले धंधे का पता नहीं चलता है। जितना गंभीर मरीज, उतना बड़ा पैकेज मिलता है। इसके हिसाब से मरीज की जेब को देखते हुए निजी अस्पताल में भेजा जाता है। उसके बाद बंदरबाट होता है।
वर्जन
सरकारी अस्पतालों में भी प्रसव का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। कमीशन का कोई चक्कर नहीं है। बेवजह लोग परेशान करते हैं। इस तरह की शिकायतों की जांच की जा चुकी है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता व अन्य बेहतर कार्य कर रहे हैं। गर्भवती महिलाएं गांव की होती हैं, इसलिए उन्हें परिजन जबरन अपने साथ ले जाते हैं। इसका गलत अर्थ निकाल लिया जाता है।
-डाॅ. सुरेंद्र यादव, सीएमओ