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कंक्रीट बेल्ट में बदल रही ग्रीन बेल्ट, अधिकारियों को पता ही नहीं
Updated Thu, 31 Aug 2017 12:29 AM IST
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जगदीश यादव
कोसली।
आज जहां भी नजर दौड़ाए पौधरोपण के जरिए धरा को और हरा-भरा बनाने की बात कही रही है, लेकिन कोसली में अधिकारियों की सुस्ती के चलते ग्रीनरी खतरे में दिखाई दे रही है। हालात यह है कि आज ग्रीन बैल्ट कंक्रीट बैल्ट में तब्दील होती दिखाई दे रही है और तो और अधिकारी अभी तक इससे अनजान बने दिखाई दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर ग्रीन बैल्ट को बचाने के लिए किए जाने वाले प्रयास कोसली में धराशायी हो रहे हैं। यहां 1962 में घोषित ग्रीन बैल्ट में लोगों ने इमारतें एवं दुकानें बना ली हैं। झज्जर से महेंद्रगढ़ को जाने वाले स्डूल रोड के दोनों ओर सुंदर दिखाई देने वाले और पर्यावरण संरक्षण के लिए घोषित ग्रीन बैल्ट 55 साल बाद भी स्थापित नहीं हो सकी है। राज्य सरकार ने साल 1962 में झज्जर से महेंद्रगढ़ रोड का निर्माण कराया था। इस स्डूल रोड के दोनों ओर ग्रीन बेल्ट बनाने के लिए 100-100 गज जगह पर्यावरण को ध्यान में रखकर छोड़ी गई। लेकिन घटती जमीन और बढ़ते जमीन के भावों के चलते लोगों ने ग्रीन बेल्ट को ही बेच दिया। जिस ग्रीन बेल्ट पर हरियाली होनी थी आज वहां बड़ी-बड़ी इमारतें बना दी गई हैं। रोड पर कब्जा कर जहां पर्यावरण संरक्षण को ठेंगा दिखाया जा रहा है। वहीं आम लोगों को भी परेशानी में डाला हुआ है क्योंकि यहां आए दिन जाम लगना आम बात हो गई है।
आरोप है कि ग्रीन बेल्ट में अवैध निर्माण करने वाले लोग यहां के हरे पड़ों को ‘विशेष’ दवा से सुखा रहे हैं, ताकि इनके प्रतिष्ठान या मकान में पेड़ बाधक नहीं बने। कई पेड़ इस तरह से सुखा दिए गए हैं, लेकिन इन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
नोटिस तक सिमटा विभाग
बार-बार लोगों के शिकायत करने के बाद साल 2009 में जिला योजनाकार विभाग ने ग्रीन बेल्ट पर दुकान या मकान बनाने वालों को नोटिस देकर इतिश्री कर ली। इस ग्रीन बेल्ट का क्षेत्र करीब 60 किलोमीटर का है। पंजाब स्डूल रोड 1962 के तहत रोड के दोनों ओर जगह छोड़ने से यहां पेड़ लगाने थे। जिससे लोगों को स्वच्छ जलवायु मिल सके। किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर पाबंदी थी।
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लोग बोले - प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा काम
प्रशासन को पता है कि रोड के दोनों ओर 100-100 गज में ग्रीन बेल्ट है। इसके बावजूद पक्के मकान बन रहे हैं। यह सब प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा है। -विश्वेंद्र यादव, नई बस्ती
झज्जर-महेंद्रगढ़ स्डूल रोड के दोनों ओर जहां ग्रीन बेल्ट होनी चाहिए। वहां बड़ी-बड़ी इमारतें बनवा दी गई हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण की धज्जियां उड़ रही हैं। -संजय यादव, सुरेहली
सरकार ने भले ही 55 साल पहले पर्यावरण के बारे में सोचते हुए जमीन अधिग्रहित कर इसे हरा-भरा बनाने की योजना बनाई। लेकिन न तो ग्रीन बेल्ट बन सकी और न ही इसके लिए जमीन बची है। -सुखविंद्र, खेड़ी
क्या कहते हैं अधिकारी
कोसली में रोड के दोनों ओर छोड़ी ग्रीन बेल्ट पर लोगों को पक्के मकान बनाने की कानून इजाजत नहीं देता। मेरा कुछ दिन पहले ही तबादला हुआ है। लेकिन ग्रीन बेल्ट पर पक्के निर्माण पर जरूर कार्रवाई होगी। इसे लोग स्वत: ही हटा लें तो ठीक हैं। -प्रेरणा सिहाग, जिला योजनाकार
अभी कुछ समय पहले ही मेरा तबादला हुआ है। मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। ग्रीन बेल्ट पर पक्का निर्माण करना गलत है। -बोधराज, तहसीलदार, कोसली
मामला मेरी जानकारी में नहीं है। अगर ऐसा है तो बिल्कुल गलत है। यह गैरकानूनी है। इसके बारे में पता कराया जाएगा।
-राजेश चुघ, डीएफओ, रेवाड़ी
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कोसली।
आज जहां भी नजर दौड़ाए पौधरोपण के जरिए धरा को और हरा-भरा बनाने की बात कही रही है, लेकिन कोसली में अधिकारियों की सुस्ती के चलते ग्रीनरी खतरे में दिखाई दे रही है। हालात यह है कि आज ग्रीन बैल्ट कंक्रीट बैल्ट में तब्दील होती दिखाई दे रही है और तो और अधिकारी अभी तक इससे अनजान बने दिखाई दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर ग्रीन बैल्ट को बचाने के लिए किए जाने वाले प्रयास कोसली में धराशायी हो रहे हैं। यहां 1962 में घोषित ग्रीन बैल्ट में लोगों ने इमारतें एवं दुकानें बना ली हैं। झज्जर से महेंद्रगढ़ को जाने वाले स्डूल रोड के दोनों ओर सुंदर दिखाई देने वाले और पर्यावरण संरक्षण के लिए घोषित ग्रीन बैल्ट 55 साल बाद भी स्थापित नहीं हो सकी है। राज्य सरकार ने साल 1962 में झज्जर से महेंद्रगढ़ रोड का निर्माण कराया था। इस स्डूल रोड के दोनों ओर ग्रीन बेल्ट बनाने के लिए 100-100 गज जगह पर्यावरण को ध्यान में रखकर छोड़ी गई। लेकिन घटती जमीन और बढ़ते जमीन के भावों के चलते लोगों ने ग्रीन बेल्ट को ही बेच दिया। जिस ग्रीन बेल्ट पर हरियाली होनी थी आज वहां बड़ी-बड़ी इमारतें बना दी गई हैं। रोड पर कब्जा कर जहां पर्यावरण संरक्षण को ठेंगा दिखाया जा रहा है। वहीं आम लोगों को भी परेशानी में डाला हुआ है क्योंकि यहां आए दिन जाम लगना आम बात हो गई है।
आरोप है कि ग्रीन बेल्ट में अवैध निर्माण करने वाले लोग यहां के हरे पड़ों को ‘विशेष’ दवा से सुखा रहे हैं, ताकि इनके प्रतिष्ठान या मकान में पेड़ बाधक नहीं बने। कई पेड़ इस तरह से सुखा दिए गए हैं, लेकिन इन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
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नोटिस तक सिमटा विभाग
बार-बार लोगों के शिकायत करने के बाद साल 2009 में जिला योजनाकार विभाग ने ग्रीन बेल्ट पर दुकान या मकान बनाने वालों को नोटिस देकर इतिश्री कर ली। इस ग्रीन बेल्ट का क्षेत्र करीब 60 किलोमीटर का है। पंजाब स्डूल रोड 1962 के तहत रोड के दोनों ओर जगह छोड़ने से यहां पेड़ लगाने थे। जिससे लोगों को स्वच्छ जलवायु मिल सके। किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर पाबंदी थी।
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लोग बोले - प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा काम
प्रशासन को पता है कि रोड के दोनों ओर 100-100 गज में ग्रीन बेल्ट है। इसके बावजूद पक्के मकान बन रहे हैं। यह सब प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा है। -विश्वेंद्र यादव, नई बस्ती
झज्जर-महेंद्रगढ़ स्डूल रोड के दोनों ओर जहां ग्रीन बेल्ट होनी चाहिए। वहां बड़ी-बड़ी इमारतें बनवा दी गई हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण की धज्जियां उड़ रही हैं। -संजय यादव, सुरेहली
सरकार ने भले ही 55 साल पहले पर्यावरण के बारे में सोचते हुए जमीन अधिग्रहित कर इसे हरा-भरा बनाने की योजना बनाई। लेकिन न तो ग्रीन बेल्ट बन सकी और न ही इसके लिए जमीन बची है। -सुखविंद्र, खेड़ी
क्या कहते हैं अधिकारी
कोसली में रोड के दोनों ओर छोड़ी ग्रीन बेल्ट पर लोगों को पक्के मकान बनाने की कानून इजाजत नहीं देता। मेरा कुछ दिन पहले ही तबादला हुआ है। लेकिन ग्रीन बेल्ट पर पक्के निर्माण पर जरूर कार्रवाई होगी। इसे लोग स्वत: ही हटा लें तो ठीक हैं। -प्रेरणा सिहाग, जिला योजनाकार
अभी कुछ समय पहले ही मेरा तबादला हुआ है। मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। ग्रीन बेल्ट पर पक्का निर्माण करना गलत है। -बोधराज, तहसीलदार, कोसली
मामला मेरी जानकारी में नहीं है। अगर ऐसा है तो बिल्कुल गलत है। यह गैरकानूनी है। इसके बारे में पता कराया जाएगा।
-राजेश चुघ, डीएफओ, रेवाड़ी