फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Rewari News ›   अव्यवस्था, विभागीय उदासीनता के कारण वर्चस्व खो रही प्रदेश की पहली लाइब्रेरी

अव्यवस्था, विभागीय उदासीनता के कारण वर्चस्व खो रही प्रदेश की पहली लाइब्रेरी

Mon, 21 Aug 2017 12:59 AM IST
Updated Mon, 21 Aug 2017 12:59 AM IST
विज्ञापन
अव्यवस्था, विभागीय उदासीनता के कारण वर्चस्व खो रही प्रदेश की पहली लाइब्रेरी
अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन

रेवाड़ी।
प्रदेश का पहला वाचनालय रेवाड़ी में..., बेशक यह वाक्य सुनकर रेवाड़ी वासियों को थोड़ा गर्व जरूर महसूस होता होगा। क्योंकि इस डिजिटल युग से कुछ समय पहले इन वाचनालय की बड़ी महत्ता होती थी और आज भी कई लोग उतनी महत्ता भी मानते हैं और इस वाचनालय में रोजाना यहां आते भी हैं। लेकिन अगर आप प्रदेश के इस पहले वाचनालय की हालात देखेंगे तो आपके मन में टीस जरूर उठेगी कि हमारे ‘गौरव’ की विभागीय उदासीनता और अव्यवस्था से क्या हाल हो गया है। बिना देखरेख प्रदेश का पहला वाचनालय आज कबाड़ बन गया है। आलम यह है कि यहां न पीने केे लिए पानी है और न ही पर्याप्त हवा। पढ़ने के नाम पर नाममात्र के अखबार आते हैं जिन्हें पढ़कर शहर के बुजुर्ग समय व्यतीत करते हैं। शहर के बीचोंबीच होने के बाद भी इस वाचनालय की सुध नहीं लेना अब लोगों को अखरने लगा है। शहर के बिल्कुल मध्य में बड़ा तालाब, हनुमान मंदिर के पास स्थित बाल मुुकुंद गुप्त स्मारक वाचनालय का उद्घाटन 26 जनवरी 1991 को तत्कालीन जिला उपायुक्त सरबत सिंह ने किया था। वहीं इसमें स्थित सूचना केंद्र का उद्घाटन एक सितंबर 1991 को तत्कालीन मुख्य सचिव बीएस ओझा ने किया। शुरुआत में सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन बाद में स्थितियां बिगड़ गई। आज यहां कबाड़ के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

कुर्सियां टूटी, केवल एक ट्यूब लाइट, कूलर बने शोपीस
आज इस वाचनालय का सारा सामान बिना देखरेख अस्त-व्यस्त है। लोगों का ज्ञान बढ़ाने के लिए खोला गया वाचनालय स्वयं ही ज्ञान की तलाश कर रहा है। कभी बड़े आकार में फैला यह वाचनालय अब छोटे रूप में आ चुका है। एक कोने में सरकारी माइक और स्पीकर पड़े हैं। वहीं उसी में पुराने टीवी सहित अन्य उपकरण भरे पड़े हैं। वहीं एक कोने मेें टूटी-फूटी कुर्सियां पड़ी हैं। वाचनालय में आने वाले पाठकों के लिए यहां छह पंखे लगा रखे हैं, इनमें से केवल तीन पंखे ही चलते हैं। बिजली फिटिंग भी उखड़ी पड़ी है। पाठकों के लिए दो कूलर हैं, लेकिन उन्हें एक के ऊपर एक रखा है। कूलर मेें घास है और न पानी। यह बिल्कुल शोपीस बन गए हैं। वहीं रोशनी के नाम पर केवल एक ट्यूब लाइट जलती है, बाकी सब खिड़कियों से आने वाली रोशनी के हवाले है।
विज्ञापन


छत से गिरता चूना, हादसे का बना खतरा
इस भवन के बनने के बाद कभी इस पर ध्यान नहीं दिया गया। इससे इसकी रिपेयरिंग ही नहीं को सकी। कई बार छत से चूना गिर जाता है। जिसे हादसा होने का भय रहता है। यहां लगी खिड़कियों के शीशे टूट गए हैं। दरवाजे भी अब बोलने लगे हैं। लेकिन इन सबकी किसी को फिक्र नहीं। यहीं पर एक नोटिस बोर्ड भी रखा है। जिसका कभी उपयोग नहीं होता। ऐसे में वह यहीं पड़ा खराब हो रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सालों से नहीं हुई पानी की टंकी साफ
पाठकों के लिए यहां वाटर कूलर है, लेकिन उसका आरओ कई महीने से खराब है। और तो और वाचनालय की छत पर रखी टंकी की तो कई सालों से सफाई तक नहीं की गई। ऐसे में यहां आने वाले पाठक आखिर कैसे प्यास बुझाएं। मजबूरन पाठक अपने घरों से पानी लाते हैं। वहीं किसी अन्य पाठक को भी इस वाटर कूलर से पानी नहीं पीने की सलाह देते हैं।

छह महीने से बंद पड़ा है बाथरूम
इसी वाचनालय परिसर में बना बाथरूम पिछले छह महीने से बंद है। अब वाचनालय के कर्मचारी और पाठक इसी परिसर में खाली जगह में निवृत्त होते हैं। ऐसे में बाहरी परिसर में मारे बदबू के दम घुटता है। लेकिन इस तरह कोई ध्यान नहीं देता।

बक्सों में बंद है ज्ञान का भंडार
इसका नाम तो वाचनालय है लेकिन पढ़ने के लिए यहां केवल कुछ ही अखबार ही आते हैं। शुरुआत में कभी यहां कुछ पुस्तकें आई थी। लेकिन वह बाद में आना बंद हो गई। बताया जाता है कि कुछ पुस्तकें बक्सों में बंद की हुई हैं, जिसे खोलने की जहमत कोई नहीं उठाता।

विजिटर रजिस्टर तक नहीं
किसी भी वाचनालय में विजिटर रजिस्टर महत्वपूर्ण होता है जिसमें आने-जाने वाले पाठकों का रिकॉर्ड एवं उनकी टिप्पणी लिखी जाती है। लेकिन इस वाचनालय में कोई विजिटर रजिस्टर तक नहीं है। वहीं कर्मचारियों के नाम पर केवल एक चौकीदार और एक ब्लॉक पब्लिसिटी वर्कर है। वह भी अपना समय काटकर निकल जाते हैं।

यह कहते हैं पाठक
मैं यहां पिछले दो साल से आ रहा हूं। यहां केवल उल्लू का राज है। कोई देखभाल करने वाला नहीं है। बार-बार विभाग को सूचित किया गया, लेकिन कोई हल नहीं निकला। -महेंद्र सिंह, रिटायर्ड प्रिंसिपल

मैं पिछले 15 साल से इस वाचनालय में आ रहा हूं। इससे इतना मोह हो गया है कि आए बिना समय नहीं कटता। लेकिन इसकी बदहाल स्थिति देखकर मन बहुत दुखी होता है। -सुल्तान सिंह, रिटायर्ड सुप्रिटेंडेंट

इस वाचनालय की बिल्डिंग पूरी तरह अनसेफ है। पिछले दिनों ही चूना गिर गया था, जिससे एक पाठक थोड़ा सा बचे थे। न तो इसके खुलने का कोई समय है और न ही बंद होने का। -जगत सिंह, रिटायर्ड प्रिंसिपल

मैं पिछले काफी समय से यहां आता हूं। वाचनालय का कायाकल्प तो होना चाहिए। वरना इसका लाभ क्या है। इतनी महत्वपूर्ण जगह होने के बाद भी इसकी देखरेख न होना बहुत खलता है। -दीपक, प्राइवेट जॉब


वाचनालय में पूरे अखबार तक नहीं आते। पिछले दिनों कुछ अखबार इसलिए बंद कर दिए कि उनकी रेट अधिक थी। वैसे भी यहां पढ़ने के लिए अखबार के अतिरिक्त कुछ नहीं। अगर वो भी न मिलेंगे तो फिर लाभ ही क्या है। -प्रमोद सैनी, टेक्सटाइल इंजीनियर


यह मामला मेेरे संज्ञान में अभी आया है। निश्चित रूप से इस पर काम होगा। जिससे लोगों को लाभ मिल सके। -डॉ. यश गर्ग, डीसी, रेवाड़ी।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed