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इस बार बढ़ेगा गैर-बासमती धान का रकबा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 21 May 2021 12:37 AM IST
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This time the area of ??non-basmati paddy will increase
रविंद्र नैन
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पानीपत। प्रदेश सहित जिले के किसानों का रुझान गैर-बासमती धान की ओर बढ़ने लगा है। इसका प्रमुख कारण सरकार द्वारा गैर बासमती धान की एमएसपी पर खरीद करना है। वहीं, गैर-बासमती धान का उत्पादन भी बासमती की तुलना में बेहतर होता है। पिछले दो साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2019 में पानीपत जिले में करीब 1750 हेक्टेयर में गैर-बासमती धान की रोपाई की गई थी। वहीं, 2020 में गैर-बासमती धान का रकबा तीन गुणा से अधिक बढ़कर करीब 6000 हेक्टेयर हो गया। इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 11 हजार हेक्टेयर से अधिक होने की संभावना है।
कृषि विशेषज्ञों की मानें तो बासमती धान की पैदावार 16 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, वहीं गैर-बासमती धान की उपज 26 से 32 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। दूसरे शब्दों में, बासमती धान से किसानों की सकल आय 40-50 हजार रुपये प्रति एकड़ होती है, वहीं गैर-बासमती धान से किसानों की सकल आय 50-70 हजार रुपये प्रति एकड़ पहुंच जाती है। वहीं, किसानों का कहना है कि बासमती धान के भावों में सट्टा होता है। यह व्यापारियों की खरीद पर निर्भर करता है। यदि भाव अच्छे मिल जाएं तो फायदा हो जाता है। भाव कम रहने पर किसानों को नुकसान झेलना पड़ता है। जबकि गैर-बासमती धान का रेट सरकार द्वारा तय होता है और उसी के अनुरूप खरीद होती है। गत वर्ष अर्थात 2020 में बासमती किस्म के दाम औंधे मुंह गिरे थे, जिससे किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा था। संवाद
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जिले में 97 हजार हेक्टेयर में बोई जाती हैं फसलें
कृषि विभाग के अनुसार पानीपत जिले में करीब 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फसलें बोई जाती हैं। खरीफ के सीजन में करीब 75 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई की जाती है। वहीं, शेष 22 हजार हेक्टेयर में गन्ना, ज्वार तथा सब्जियां उगाई जाती हैं।
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सीधी बिजाई की तकनीक भी बेहतर
प्रदेश सहित पानीपत जिले में धान की रोपाई करने का चलन रहा है, लेकिन पिछले करीब दो सालों से किसानों ने सीधी बिजाई तकनीक से भी धान उगाना शुरू किया है। लगातार घटते भूजल स्तर की गंभीरता को देखते हुए कृषि विभाग ने भी किसानों को धान की सीधी बिजाई करने की सलाह दी है।
क्या कहते हैं किसान
बासमती धान के भावों पर सट्टा होता है। व्यापारी मनमर्जी के रेट लगाते हैं। गत वर्ष उसे अपनी 2 एकड़ फसल 1600 से 1900 रुपये प्रति क्विंटल बेचनी पड़ी थी, जिससे खेती की लागत भी पूरी नहीं हुई थी। तीन एकड़ में बोई गई गैर-बासमती धान से बमुश्किल खेती की लागत पूरी हो पाई थी।
-सुभाष चंद, किसान।
दो साल से गैर-बासमती धान उगा रहा हूं। एमएसपी पर खरीद होने से इसकी लागत पूरी होने के साथ-साथ कुछ बचत हो जाती है। बासमती धान लगाने वाले दूसरे किसानों की हालत देखते हुए इस बार भी उसने गैर-बासमती धान का रकबा बढ़ाने का फैसला लिया है।
-विनोद मलिक, किसान।
गत वर्ष दो एकड़ खेत में गैर-बासमती धान की सीधी बिजाई की थी। इससे पानी की खपत भी कम हुई और पैदावार भी बेहतर रही। अबकी बार पांच एकड़ भूमि में गैर-बासमती धान की सीधी बिजाई करने का निश्चय किया है।

-संदीप गाहल्याण, किसान।
दो वर्षों से गैर बासमती धान का रकबा बढ़ा है। 2019 के मुकाबले 2020 में ही गैर बासमती धान का रकबा 3 गुणा बढ़ा है। इस बार भी रकबा बढ़कर 11 हजार हेक्टेयर के पार जा सकता है। किसानों को चाहिए कि वे एक ही किस्म की रोपाई न करके अलग-अलग किस्मों की रोपाई करें, ताकि धान का रकबे का सही संतुलन बना रहे और धान के भावों के उतार-चढ़ाव का भी किसानों पर ज्यादा असर न पड़े और किसानों को फसल से सही लाभ भी हो।
-डॉ. वीरेंद्र देव आर्य, उपनिदेशक, कृषि विभाग, पानीपत।
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