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Panipat News: हथकरघा पर टिकी पानीपत के टेक्सटाइल उद्योग की नींव
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सनौली रोड स्थित एक फैक्टरी में पावरलूम पर कपड़ा बनाते हुए। संवाद
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस विशेष-
- हर साल 80 हजार करोड़ रुपये घेरलू बाजार और 20 हजार करोड़ का होता है निर्यात
- 35 हजार फैक्टरियां हैं पानीपत में आज
- 03 लाख लोगों को रोजगार मिला है
जगमहेंद्र सरोहा
पानीपत। अमेरिका जैसी अंतरराष्ट्रीय मंडी में टेक्सटाइल उत्पादों में धाक जमाने वाली टेक्सटाइल नगरी पानीपत की मजबूत नींव हथकरघा पर टिकी है। आधुनिकता की दौड़ में उद्यमी आज पावरलूम और शटल लैस मशीन को अपनाकर उत्पादन में भी चीन व बांग्लादेश समेत कई देशों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इनमें भी कपड़ा बनाने का आधार हथकरघा का ही है। पहले जहां लोग खड्डी में हाथ से ताना-बाना बुनते थे। आज वहां मशीन जरूर आ गई हैं। इन सबके बीच कपड़ा बनाने का आधार आज भी वहीं है।
टेक्सटाइल नगरी में आजादी से पहले छोटी-छोटी खड्डी लगाकर काम करते थे। खड्डी में महिलाएं जहां चरखा चलाती थी। वे कताई कर रुई का रोल आगे खड्डी में देती थी। इस पर कपड़ा बनता था। इनमें ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग ही काम पर थे। उस पर खेस और दरी मुख्य रूप से बनाए जाते थे। देश के बंटवारे के समय यहां से अधिकतर लोग पाकिस्तान चले गए। ऐसे में पानीपत का हथकरघा उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंच गया। उस समय महात्मा गांधी दो बार पानीपत आए। उन्होंने उस्ताद नंदलाल इसका विकल्प जाना। हरियाणा चैंबर ऑफ काॅमर्स पानीपत चैप्टर के प्रधान विनोद धमीजा ने बताया कि पानीपत में आज 35 हजार फैक्टरियां हैं और करीब तीन लाख लोगों को रोजगार दिया जा रहा है। हर साल 80 हजार करोड़ रुपये घेरलू बाजार और करीब 20 हजार करोड़ का निर्यात है। अकेले अमेरिका में 10 हजार करोड़ रुपये का निर्यात पानीपत से होता है।
पाकिस्तान के हैदराबाद से आए लोगों को जोड़ा
उद्यमी अश्वनी शर्मा ने बताया कि उनके पिता बताते थे कि उस्ताद नंदलाल ने हरकरघा चलाने वाले पाकिस्तान से आने वाले लोगों की जानकारी जुटाई। पाकिस्तान के मियांवाली जिला के हैदराबाद गांव में लोग खड्डी पर कंबल बुना करते थे। वे विभाजन के समय भारत आए थे। उनको अलग-अलग जगह से पानीपत लाया गया। हैदराबाद से आए लोगों ने खड्डी के काम को संभाला। इसमें धीरे-धीरे गति पकड़नी शुरू हो गई और पानीपत का हथकरघा फिर से मजबूत हो गया।
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मशीनीकरण के साथ उत्पादन भी बढ़ा
हैंडलूम एक्सपोर्ट मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के प्रधान रमेश वर्मा ने बताया कि हथकरघा उद्योग शुरू होने के बाद पानीपत का नाम फिर से उठा। यहां के कंबल सेना में जाते थे। इसके अलावा लोगों ने अपने गुजर बसर के कंबल, खेस व दरी बनाकर आसपास के गांवों में बेचना शुरू कर दिया। इसकी मांग बढ़ने लगी तो इसका विस्तार धीरे-धीरे होता चला गया। घरेलू बाजार जिला व प्रदेश की सीमाओं से बाहर पहुंचा और फिर निर्यात भी होने लगा। हथकरघा की जगह पावरलूम ने लेना शुरू कर दिया। इसमें उत्पादन तेज हो गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता सुधार पर जोर देना शुरू किया तो फिर शटल लैस ने जगह ली। शटल लैस एक पावरलूम से करीब 10 गुना अधिक उत्पादन करने लगी। इसमें भी अब नई तकनीक आने लगी।
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- हर साल 80 हजार करोड़ रुपये घेरलू बाजार और 20 हजार करोड़ का होता है निर्यात
- 35 हजार फैक्टरियां हैं पानीपत में आज
- 03 लाख लोगों को रोजगार मिला है
जगमहेंद्र सरोहा
पानीपत। अमेरिका जैसी अंतरराष्ट्रीय मंडी में टेक्सटाइल उत्पादों में धाक जमाने वाली टेक्सटाइल नगरी पानीपत की मजबूत नींव हथकरघा पर टिकी है। आधुनिकता की दौड़ में उद्यमी आज पावरलूम और शटल लैस मशीन को अपनाकर उत्पादन में भी चीन व बांग्लादेश समेत कई देशों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इनमें भी कपड़ा बनाने का आधार हथकरघा का ही है। पहले जहां लोग खड्डी में हाथ से ताना-बाना बुनते थे। आज वहां मशीन जरूर आ गई हैं। इन सबके बीच कपड़ा बनाने का आधार आज भी वहीं है।
टेक्सटाइल नगरी में आजादी से पहले छोटी-छोटी खड्डी लगाकर काम करते थे। खड्डी में महिलाएं जहां चरखा चलाती थी। वे कताई कर रुई का रोल आगे खड्डी में देती थी। इस पर कपड़ा बनता था। इनमें ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग ही काम पर थे। उस पर खेस और दरी मुख्य रूप से बनाए जाते थे। देश के बंटवारे के समय यहां से अधिकतर लोग पाकिस्तान चले गए। ऐसे में पानीपत का हथकरघा उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंच गया। उस समय महात्मा गांधी दो बार पानीपत आए। उन्होंने उस्ताद नंदलाल इसका विकल्प जाना। हरियाणा चैंबर ऑफ काॅमर्स पानीपत चैप्टर के प्रधान विनोद धमीजा ने बताया कि पानीपत में आज 35 हजार फैक्टरियां हैं और करीब तीन लाख लोगों को रोजगार दिया जा रहा है। हर साल 80 हजार करोड़ रुपये घेरलू बाजार और करीब 20 हजार करोड़ का निर्यात है। अकेले अमेरिका में 10 हजार करोड़ रुपये का निर्यात पानीपत से होता है।
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पाकिस्तान के हैदराबाद से आए लोगों को जोड़ा
उद्यमी अश्वनी शर्मा ने बताया कि उनके पिता बताते थे कि उस्ताद नंदलाल ने हरकरघा चलाने वाले पाकिस्तान से आने वाले लोगों की जानकारी जुटाई। पाकिस्तान के मियांवाली जिला के हैदराबाद गांव में लोग खड्डी पर कंबल बुना करते थे। वे विभाजन के समय भारत आए थे। उनको अलग-अलग जगह से पानीपत लाया गया। हैदराबाद से आए लोगों ने खड्डी के काम को संभाला। इसमें धीरे-धीरे गति पकड़नी शुरू हो गई और पानीपत का हथकरघा फिर से मजबूत हो गया।
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मशीनीकरण के साथ उत्पादन भी बढ़ा
हैंडलूम एक्सपोर्ट मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के प्रधान रमेश वर्मा ने बताया कि हथकरघा उद्योग शुरू होने के बाद पानीपत का नाम फिर से उठा। यहां के कंबल सेना में जाते थे। इसके अलावा लोगों ने अपने गुजर बसर के कंबल, खेस व दरी बनाकर आसपास के गांवों में बेचना शुरू कर दिया। इसकी मांग बढ़ने लगी तो इसका विस्तार धीरे-धीरे होता चला गया। घरेलू बाजार जिला व प्रदेश की सीमाओं से बाहर पहुंचा और फिर निर्यात भी होने लगा। हथकरघा की जगह पावरलूम ने लेना शुरू कर दिया। इसमें उत्पादन तेज हो गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता सुधार पर जोर देना शुरू किया तो फिर शटल लैस ने जगह ली। शटल लैस एक पावरलूम से करीब 10 गुना अधिक उत्पादन करने लगी। इसमें भी अब नई तकनीक आने लगी।