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Panipat News: बर्फ में 11 माह तक दबा रहा शव, इंतजार में परिजनों के सूख गए थे आंसू
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बर्फ में 11 माह तक दबा रहा शव, इंतजार में परिजनों के सूख गए थे आंसू
- फोटो : बर्फ में 11 माह तक दबा रहा शव, इंतजार में परिजनों के सूख गए थे आंसू
कारगिल के हीरो-
- राजपूत-3 बटालियन में तैनात थे अत्तौलापुर गांव के सुशील कुमार, बेटे के गम में एक साल बाद मां की भी हो गई थी मौत
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अत्तौलापुर गांव के सुशील कुमार ने महज 24 साल की उम्र में कारगिल युद्ध में अपना बलिदान दे दिया था। राजपूत-3 बटालियन में तैनात सुशील कुमार युद्ध के दौरान बर्फ में दब गए थे। बर्फ हटने पर 11 महीने बाद उनका पार्थिव शरीर परिवार को मिला था। बेटे को खोने का गम बुजुर्ग मां सहन नहीं कर पाईं और एक साल बाद उनकी मौत हो गई।
अत्तौलापुर के जगदीश ने बताया कि उनके भाई सुशील को कबड्डी खेलने का शौक था। उनकी मां शिमला देवी ने सुशील को खेलों में भेजने के लिए चांदी के जेवर तक बेचे थे। सुशील भी मैदान पर पूरी मेहनत करते थे। वे राज्य स्तर पर पुरस्कार जीत चुके थे और खेलों में अच्छे प्रदर्शन की बदौलत 1996 में सेना में भर्ती हुए।
वह राजपूत-3 बटालियन में सिपाही के पद पर तैनात थे। वे पहले फतेहगढ़ फिर जोशी मठ, बेंगलुरु व पठानकोट में तैनात रहे। उनको फिर कारगिल युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर भेजा गया। वह 30 अगस्त 1999 को कारगिल युद्ध में बर्फ में दबने से बलिदान हो गए। परिवार ने इसके लिए कई बार प्रशासन और पुलिस से संपर्क किया। बर्फ हटने के बाद 11 महीने में सात अगस्त 2000 को गांव में पार्थिव शरीर लाया गया। यहां उनको सैनिक सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
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अब भूल गए अधिकारी
जगदीश ने बताया कि सरकार ने गांव में सुशील की प्रतिमा स्थापना के लिए जमीन दी थी लेकिन यह स्थापित नहीं की। उन्होंने स्वयं प्रतिमा स्थापित की। अधिकारी शहीदी दिवस पर दो साल माल्यार्पण करने आए थे। इसके बाद अधिकारी भूल गए। वे अब नाम तक नहीं लेते हैं। सरकार ने सुशील की पत्नी के नाम पेट्रोल पंप दिया। उन्होंने बाद में दूसरी शादी कर ली। बेटे के बाद बहू के छोड़ जाने का दर्द उनकी मां शिमला देवी सहन नहीं कर पाईं। इसके एक साल बाद ही उनका निधन हो गया। इसके कुछ वर्ष बाद उनके बड़े भाई का निधन हो गया। बड़े भाई के बच्चों की जिम्मेदारी भी उन पर आ गई। वे स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। इसी के सहारे अपने परिवार को संभाल रहे हैं। मुझे अपने भाई सुशील के बलिदान पर गर्व है।
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- राजपूत-3 बटालियन में तैनात थे अत्तौलापुर गांव के सुशील कुमार, बेटे के गम में एक साल बाद मां की भी हो गई थी मौत
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अत्तौलापुर गांव के सुशील कुमार ने महज 24 साल की उम्र में कारगिल युद्ध में अपना बलिदान दे दिया था। राजपूत-3 बटालियन में तैनात सुशील कुमार युद्ध के दौरान बर्फ में दब गए थे। बर्फ हटने पर 11 महीने बाद उनका पार्थिव शरीर परिवार को मिला था। बेटे को खोने का गम बुजुर्ग मां सहन नहीं कर पाईं और एक साल बाद उनकी मौत हो गई।
अत्तौलापुर के जगदीश ने बताया कि उनके भाई सुशील को कबड्डी खेलने का शौक था। उनकी मां शिमला देवी ने सुशील को खेलों में भेजने के लिए चांदी के जेवर तक बेचे थे। सुशील भी मैदान पर पूरी मेहनत करते थे। वे राज्य स्तर पर पुरस्कार जीत चुके थे और खेलों में अच्छे प्रदर्शन की बदौलत 1996 में सेना में भर्ती हुए।
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वह राजपूत-3 बटालियन में सिपाही के पद पर तैनात थे। वे पहले फतेहगढ़ फिर जोशी मठ, बेंगलुरु व पठानकोट में तैनात रहे। उनको फिर कारगिल युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर भेजा गया। वह 30 अगस्त 1999 को कारगिल युद्ध में बर्फ में दबने से बलिदान हो गए। परिवार ने इसके लिए कई बार प्रशासन और पुलिस से संपर्क किया। बर्फ हटने के बाद 11 महीने में सात अगस्त 2000 को गांव में पार्थिव शरीर लाया गया। यहां उनको सैनिक सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
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अब भूल गए अधिकारी
जगदीश ने बताया कि सरकार ने गांव में सुशील की प्रतिमा स्थापना के लिए जमीन दी थी लेकिन यह स्थापित नहीं की। उन्होंने स्वयं प्रतिमा स्थापित की। अधिकारी शहीदी दिवस पर दो साल माल्यार्पण करने आए थे। इसके बाद अधिकारी भूल गए। वे अब नाम तक नहीं लेते हैं। सरकार ने सुशील की पत्नी के नाम पेट्रोल पंप दिया। उन्होंने बाद में दूसरी शादी कर ली। बेटे के बाद बहू के छोड़ जाने का दर्द उनकी मां शिमला देवी सहन नहीं कर पाईं। इसके एक साल बाद ही उनका निधन हो गया। इसके कुछ वर्ष बाद उनके बड़े भाई का निधन हो गया। बड़े भाई के बच्चों की जिम्मेदारी भी उन पर आ गई। वे स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। इसी के सहारे अपने परिवार को संभाल रहे हैं। मुझे अपने भाई सुशील के बलिदान पर गर्व है।