{"_id":"f3d1dc7057e0f00fc199a6a0798e71ef","slug":"second-investigation-of-the-hospitals-heart-fail","type":"story","status":"publish","title_hn":"दूसरी जांच में भी अस्पतालों का ‘हार्टफेल’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दूसरी जांच में भी अस्पतालों का ‘हार्टफेल’
अमर उजाला, पानीपत
Updated Tue, 15 Oct 2013 10:56 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पानीपत में
विज्ञापन
एनआरएचएम की 25 टीमों ने जांच में जिले के लगभग सभी अस्पतालों का ‘हार्ट
फेल’ हो गया। मौका था मंगलवार को एनआरएचएम के तहत रैपिड असेसमेंट ऑफ हेल्थ
फैसिलिटी के दूसरे राउंड की जांच रिपोर्ट सौंपने का, जो हरियाणा पर्यटन
विभाग के स्काईलार्क टूरिस्ट सेंटर पर सौंपी।
सुबह नौ बजे शुरू रिव्यू रिपोर्ट की दौड़ शाम तक चलती रही। इसकी अध्यक्षता एनआरएचएम के मिशन डायरेक्टर डॉ. राकेश गुप्ता ने की। डीसी समीर पाल सरो ने बैठक में शिरकत की और जिले में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का विश्वास दिलाया। रिपोर्ट के अनुसार स्टाफ नर्स को एचबी टेस्ट करना नहीं आता।
डॉक्टर को ओपन वायल पॉलिशी की जानकारी नहीं। पीएचसी में माइक्रो प्लान अपडेट नहीं और अधिकारियों का सुपरविजन तक नहीं, ये सब खामियां एनआरएचएम की टीम की जांच में सामने आईं। यही नहीं जांच टीम के अनुसार सब सेंटरों पर लाइट की व्यवस्था नहीं थी और पीएचसी पर तो सूरज ढलते ही ताला लग जाता है।
पच्चीस टीमों ने जांची व्यवस्था
दूसरी रैपिड असेसमेंट ऑफ हेल्थ फैसिलिटी में 25 टीमें पानीपत में आईं और इन टीमों ने पानीपत के जिला अस्पताल, तीन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और 13 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा चयनित उप स्वास्थ्य केंद्रों का दौरा किया। यहां पर मरीजों को दी जाने वाली सुविधाओं और व्यवस्थाओं का बारीकी से जायजा लिया।
इसमें पीजीआई चंडीगढ़ और रोहतक के स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ स्वास्थ्य सलाहकार और पर्यवेक्षकों को शामिल किया। इस कार्यक्रम में डीसी समीरपाल सरो, निदेशक वित्त और लेखा संजीव गोयल, परिवार कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. सतीश अग्रवाल, सीएमओ डॉ. इंद्रजीत धनखड़ के अलावा करनाल जोन के सीनियर ड्रग कंट्रोल अधिकारी पदम सिंह राठी, जिला ड्रग कंट्रोल अधिकारी गुरचरण सिंह, एमएस डॉ. भूपेश चौधरी, डिप्टी सीएमओ डॉ. नवीन सुनेजा, डॉ. मनीष पासी, डॉ. एसके गुप्ता, डॉ. एसके नागपाल और डॉ. सुधीर बतरा मौजूद रहे।
ऐसे खुली सेवाओं की पोल
स्काईलार्क में एक तरफ जिले के चिकित्सा अधिकारी तो दूसरी तरफ जांच टीम के अधिकारी बैठे थे। उनके ठीक बीच में थे एनआरएचएम के मिशन निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता और सीएमओ डा. इंद्रजीत सिंह धनखड़। जांच टीम ने रिव्यू मीटिंग के शुरू होते ही खामियों से पर्दा उठाना शुरू किया। पीएचसी उझा में डिलीवरी मामलों की रेफर लिस्ट सबसे लंबी मिली। इस पर मिशन निदेशक ने असंतोष व्यक्त किया और संबंधित डॉक्टर को इसे कंट्रोल करने के निर्देश दिए। पीएचसी, काबड़ी में शाम होते ही ताला लगने की रिपोर्ट दिखाई।
इसे देखकर सभी डाक्टर सकपका गए। उन्होंने कहा कि इस पीएचसी पर पांच लाख आबादी निर्भर है। ऐसे में ताला लगना गंभीर विषय है। इस बात को लेकर काफी देर तक विचार चलता रहा। संबंधित डॉक्टर ने छोटा गेट हर समय खुला रखने की सफाई दी। यहीं पर रिपोर्ट में बताया कि स्टाफ नर्स को एचबी टेस्ट करना तक नहीं आता।
लेबर रूम में भी कोई सुधार नहीं मिला। पीएचसी, कवी में भी गर्भवती महिलाओं के रेफर मामले अधिक मिले। यहां पर भी स्टाफ नर्स को एचबी और यूरिन तक टेस्ट करना नहीं आया। नवजात बच्चों को जन्म के बाद लेटाने की भी उचित व्यवस्था नहीं मिली। पीएचसी सींक में भी कई तरह की खामियां मिली।
पहले भी हो चुका है हंगामादार रिव्यू
एनआरएचएम की यह कोई पहली मीटिंग नहीं है। इससे पहले 29 जनवरी-2013 को भी एक बार पहले खामियों को उजागर किया जा चुका है। उस समय इस टीम का नाम हल्ला बोल रखा था। इसमें खामियों को गिनवाया गया था और दोबारा निरीक्षण में खामियों को दूर करने का दावा किया था। परंतु कुछ क्षेत्रों में सुधार मिला। लेकिन कुछ में पहले मीटिंग के बाद भी रिपोर्ट कमजोर मिली। चाइल्ड हेल्थ की रिव्यू रिपोर्ट में यह सब सामने आया। इसमें दिखाया कि इस बार जांच में चाइल्ड हेल्थ की प्रतिशत गत मीटिंग की अपेक्षा कम प्रतिशत मिली।
ओपन वायल पॉलिशी पर डॉक्टर चुप
पीएचसी मांडी में ओपन वायल पॉलिशी अपडेट नहीं मिली। यहीं कमी अन्य पीएचसी में भी मिली। इसे जानकर डॉ. राकेश गुप्ता की भौंहें तन गईं। उन्होंने पीएचसी, मांडी के डाक्टर को खड़ा कर दिया और ओपन वायल पॉलिशी के बारे में बताने को कहा। इस सवाल पर डॉक्टर कुछ नहीं बोल सके और चुप हो गए। इसके बाद अन्य डॉक्टरों को इस विषय में बताने की कही। लेकिन कोई साहस नहीं जुटा सका।
डाक्टरों के चुप होने पर एक विशेषज्ञ ने बताया कि कई दवाओं को खोलने के बाद एक लिमिट समय तक यूज किया जा सकता है। संबंधित डॉक्टर या स्टाफ को दवा को ओपन करते ही उस पर तारीख लिखनी होती है और फिर उसको इस्तेमाल किया जाता है। यहीं नहीं कई जगह फ्रिज में जीवनरक्षक दवाओं के बजाय लंच बॉक्स मिला। यह रिव्यू रिपोर्ट देर शाम तक चलती रही।
यह है चिंता का विषय
डा. राकेश गुप्ता ने कहा कि प्रदेश में प्रतिवर्ष माता और शिशु की मृत्यु दर कम होने के बजाय बढ़ रही है। यह एक गंभीर विषय और चिंतनीय है। उन्होंने बताया कि हर साल 24 हजार शिशु मौत की नींद सो जाते हैं और आठ हजार महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। यहीं नहीं सात से आठ हजार बच्चों की मौत गर्भ में ही हो जाती है।
जननी सुरक्षा कार्यक्रम का सहारा
डॉ. राकेश गुप्ता ने बताया कि इस मृत्यु दर को कम करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत एक सहयोगात्मक पर्यवेक्षण कार्यक्रम किया जा रहा है। ये कार्यक्रम है जननी सुरक्षा। उन्होंने दावा किया कि इस कार्यक्रम के आने के बाद बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। उन्होंने कहा कि इसमें स्वास्थ्य विभाग अधिकारियों के सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने इसमें और अधिक सुधार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
ये करना होगा
उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाने के लिए विभाग द्वारा विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए महिलाओं का रक्तचाप निरंतर चेक होना चाहिए और गर्भवती महिलाओं में खून की कमी को पूरा करने के लिए आयरन की गोलियां या अन्य पौष्टिक दवाएं उपयोग में लानी चाहिए। उन्हाेंने स्वास्थ्य अधिकारियों को निचले तबके को जागरूक करने की सलाह दी।
इन खामियों से उतरे चेहरे
- पीएचसी उझा में डिलीवरी केसों की लंबी रेफर लिस्ट
- नर्सों को एचबी और यूरिन टेस्ट तक करना नहीं आता
- फ्रिज में जीवनरक्षक दवाओं की जगह मिले लंच बॉक्स
- ओपन वॉयल पालिसी पर डॉक्टरों ने साधी चुप्पी
- बच्चे के पैदा होने के बाद लेटाने की व्यवस्था नहीं
- पीएचसी में माइक्रो प्लान तक अपडेट नहीं होता
- स्वास्थ्य केंद्रों पर अधिकारियों का सुपरविजन नहीं
- पांच लाख की आबादी वाले पीएचसी पर शाम को ताला
- कई स्वास्थ्य केंद्रों पर लाइट की भी व्यवस्था नहीं
सुबह नौ बजे शुरू रिव्यू रिपोर्ट की दौड़ शाम तक चलती रही। इसकी अध्यक्षता एनआरएचएम के मिशन डायरेक्टर डॉ. राकेश गुप्ता ने की। डीसी समीर पाल सरो ने बैठक में शिरकत की और जिले में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का विश्वास दिलाया। रिपोर्ट के अनुसार स्टाफ नर्स को एचबी टेस्ट करना नहीं आता।
डॉक्टर को ओपन वायल पॉलिशी की जानकारी नहीं। पीएचसी में माइक्रो प्लान अपडेट नहीं और अधिकारियों का सुपरविजन तक नहीं, ये सब खामियां एनआरएचएम की टीम की जांच में सामने आईं। यही नहीं जांच टीम के अनुसार सब सेंटरों पर लाइट की व्यवस्था नहीं थी और पीएचसी पर तो सूरज ढलते ही ताला लग जाता है।
पच्चीस टीमों ने जांची व्यवस्था
दूसरी रैपिड असेसमेंट ऑफ हेल्थ फैसिलिटी में 25 टीमें पानीपत में आईं और इन टीमों ने पानीपत के जिला अस्पताल, तीन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और 13 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा चयनित उप स्वास्थ्य केंद्रों का दौरा किया। यहां पर मरीजों को दी जाने वाली सुविधाओं और व्यवस्थाओं का बारीकी से जायजा लिया।
इसमें पीजीआई चंडीगढ़ और रोहतक के स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ स्वास्थ्य सलाहकार और पर्यवेक्षकों को शामिल किया। इस कार्यक्रम में डीसी समीरपाल सरो, निदेशक वित्त और लेखा संजीव गोयल, परिवार कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. सतीश अग्रवाल, सीएमओ डॉ. इंद्रजीत धनखड़ के अलावा करनाल जोन के सीनियर ड्रग कंट्रोल अधिकारी पदम सिंह राठी, जिला ड्रग कंट्रोल अधिकारी गुरचरण सिंह, एमएस डॉ. भूपेश चौधरी, डिप्टी सीएमओ डॉ. नवीन सुनेजा, डॉ. मनीष पासी, डॉ. एसके गुप्ता, डॉ. एसके नागपाल और डॉ. सुधीर बतरा मौजूद रहे।
ऐसे खुली सेवाओं की पोल
स्काईलार्क में एक तरफ जिले के चिकित्सा अधिकारी तो दूसरी तरफ जांच टीम के अधिकारी बैठे थे। उनके ठीक बीच में थे एनआरएचएम के मिशन निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता और सीएमओ डा. इंद्रजीत सिंह धनखड़। जांच टीम ने रिव्यू मीटिंग के शुरू होते ही खामियों से पर्दा उठाना शुरू किया। पीएचसी उझा में डिलीवरी मामलों की रेफर लिस्ट सबसे लंबी मिली। इस पर मिशन निदेशक ने असंतोष व्यक्त किया और संबंधित डॉक्टर को इसे कंट्रोल करने के निर्देश दिए। पीएचसी, काबड़ी में शाम होते ही ताला लगने की रिपोर्ट दिखाई।
इसे देखकर सभी डाक्टर सकपका गए। उन्होंने कहा कि इस पीएचसी पर पांच लाख आबादी निर्भर है। ऐसे में ताला लगना गंभीर विषय है। इस बात को लेकर काफी देर तक विचार चलता रहा। संबंधित डॉक्टर ने छोटा गेट हर समय खुला रखने की सफाई दी। यहीं पर रिपोर्ट में बताया कि स्टाफ नर्स को एचबी टेस्ट करना तक नहीं आता।
लेबर रूम में भी कोई सुधार नहीं मिला। पीएचसी, कवी में भी गर्भवती महिलाओं के रेफर मामले अधिक मिले। यहां पर भी स्टाफ नर्स को एचबी और यूरिन तक टेस्ट करना नहीं आया। नवजात बच्चों को जन्म के बाद लेटाने की भी उचित व्यवस्था नहीं मिली। पीएचसी सींक में भी कई तरह की खामियां मिली।
पहले भी हो चुका है हंगामादार रिव्यू
एनआरएचएम की यह कोई पहली मीटिंग नहीं है। इससे पहले 29 जनवरी-2013 को भी एक बार पहले खामियों को उजागर किया जा चुका है। उस समय इस टीम का नाम हल्ला बोल रखा था। इसमें खामियों को गिनवाया गया था और दोबारा निरीक्षण में खामियों को दूर करने का दावा किया था। परंतु कुछ क्षेत्रों में सुधार मिला। लेकिन कुछ में पहले मीटिंग के बाद भी रिपोर्ट कमजोर मिली। चाइल्ड हेल्थ की रिव्यू रिपोर्ट में यह सब सामने आया। इसमें दिखाया कि इस बार जांच में चाइल्ड हेल्थ की प्रतिशत गत मीटिंग की अपेक्षा कम प्रतिशत मिली।
ओपन वायल पॉलिशी पर डॉक्टर चुप
पीएचसी मांडी में ओपन वायल पॉलिशी अपडेट नहीं मिली। यहीं कमी अन्य पीएचसी में भी मिली। इसे जानकर डॉ. राकेश गुप्ता की भौंहें तन गईं। उन्होंने पीएचसी, मांडी के डाक्टर को खड़ा कर दिया और ओपन वायल पॉलिशी के बारे में बताने को कहा। इस सवाल पर डॉक्टर कुछ नहीं बोल सके और चुप हो गए। इसके बाद अन्य डॉक्टरों को इस विषय में बताने की कही। लेकिन कोई साहस नहीं जुटा सका।
डाक्टरों के चुप होने पर एक विशेषज्ञ ने बताया कि कई दवाओं को खोलने के बाद एक लिमिट समय तक यूज किया जा सकता है। संबंधित डॉक्टर या स्टाफ को दवा को ओपन करते ही उस पर तारीख लिखनी होती है और फिर उसको इस्तेमाल किया जाता है। यहीं नहीं कई जगह फ्रिज में जीवनरक्षक दवाओं के बजाय लंच बॉक्स मिला। यह रिव्यू रिपोर्ट देर शाम तक चलती रही।
यह है चिंता का विषय
डा. राकेश गुप्ता ने कहा कि प्रदेश में प्रतिवर्ष माता और शिशु की मृत्यु दर कम होने के बजाय बढ़ रही है। यह एक गंभीर विषय और चिंतनीय है। उन्होंने बताया कि हर साल 24 हजार शिशु मौत की नींद सो जाते हैं और आठ हजार महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। यहीं नहीं सात से आठ हजार बच्चों की मौत गर्भ में ही हो जाती है।
जननी सुरक्षा कार्यक्रम का सहारा
डॉ. राकेश गुप्ता ने बताया कि इस मृत्यु दर को कम करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत एक सहयोगात्मक पर्यवेक्षण कार्यक्रम किया जा रहा है। ये कार्यक्रम है जननी सुरक्षा। उन्होंने दावा किया कि इस कार्यक्रम के आने के बाद बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। उन्होंने कहा कि इसमें स्वास्थ्य विभाग अधिकारियों के सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने इसमें और अधिक सुधार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
ये करना होगा
उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाने के लिए विभाग द्वारा विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए महिलाओं का रक्तचाप निरंतर चेक होना चाहिए और गर्भवती महिलाओं में खून की कमी को पूरा करने के लिए आयरन की गोलियां या अन्य पौष्टिक दवाएं उपयोग में लानी चाहिए। उन्हाेंने स्वास्थ्य अधिकारियों को निचले तबके को जागरूक करने की सलाह दी।
इन खामियों से उतरे चेहरे
- पीएचसी उझा में डिलीवरी केसों की लंबी रेफर लिस्ट
- नर्सों को एचबी और यूरिन टेस्ट तक करना नहीं आता
- फ्रिज में जीवनरक्षक दवाओं की जगह मिले लंच बॉक्स
- ओपन वॉयल पालिसी पर डॉक्टरों ने साधी चुप्पी
- बच्चे के पैदा होने के बाद लेटाने की व्यवस्था नहीं
- पीएचसी में माइक्रो प्लान तक अपडेट नहीं होता
- स्वास्थ्य केंद्रों पर अधिकारियों का सुपरविजन नहीं
- पांच लाख की आबादी वाले पीएचसी पर शाम को ताला
- कई स्वास्थ्य केंद्रों पर लाइट की भी व्यवस्था नहीं