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रुपये की मजबूती बढ़ाएगी निर्यात
अमर उजाला पानीपत
Updated Sat, 10 May 2014 05:48 PM IST
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पानीपत। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अरसे से लगातार ऊंची उड़ान भर रहा डॉलर आखिरकार 60 रुपये से नीचे आ ही गया। वीरवार को डॉलर का भाव 59.95 रुपये तक पहुंच गया। पानीपत के टेक्सटाइल निर्यातक रुपये की मजबूती को निर्यात की दृष्टि से शुभ संकेत मानकर चल रहे हैं। उनका कहना है कि इससे बाजार में स्थितरता आएगी। इसके बाद नए सौदों में तेजी आएगी। ऐसे में बाजार के हालात सुधरना तय है।
टेक्सटाइल नगरी पानीपत में पिछले कई साल से 4300 से लेकर 4500 करोड़ के बीच टेक्सटाइल उत्पादाें का निर्यात हो रहा है। पिछले साल निर्यात का आंकड़ा 4450 करोड़ था। यह निर्यात यूरोप महाद्वीपों के अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, हालैंड, नार्वे, स्विट्जरलैंड, खाड़ी देशाें को होता है। इन देशाें को कॉरपेट, ऊनी कॉरपेट, दरी, पर्दे, मैट, फुटमैट, टेबल कवर और घर की सजावट का सामान आदि निर्यात किया जाता है।
सालभर पहले उतार-चढ़ाव ने बिगाड़ दिया था गणित
मार्च-2013 तक लगभग सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। अप्रैल में डालर की कीमत 54.73 रुपये थी। मगर उसके बाद रुपया डालर की तुलना में कमजोर पड़ने लगा। इस क्रम में एक जून को डालर की कीमत 56.84, एक जुलाई को 59.74, एक अगस्त को 60.99, एक सितंबर को 66.40 रुपये तक पहुंच गया। इसी बीच रुपये में थोड़ा सुधार होता तो अगले ही दिन यह उससे अधिक गिर जाता है। अंत मेें रुपया अपने रिकार्ड निचले स्तर 68.80 तक चला गया। उसके बाद तो पूरा साल डालर व रुपये के बीच आंख मिचौली का खेल चलता रहा।
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नए सौदाें पर नहीं बन पा रही थी सहमति
पहले डॉलर अकसर कई माह तक लगभग एक ही रेट के आसपास घूमता था। ऐसे में उसको ही आधार मानकर नए सौदे किए जाते थे मगर अरसे तक चले भारी उतार-चढ़ाव के कारण डालर व रुपये की कीमत को लेकर निर्यातक व बॉयराें (विदेशी खरीदाराें) में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। उथल-पुथल के दौर में बॉयर व निर्यातक अपने आपको सुरक्षित रखकर सौदे करना चाहते थे। बॉयर अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए तर्क दे रहे हैं कि रुपया अस्थायी तौर पर कमजोर हुआ है। यह कभी भी मजबूत हो सकता है। ऐसे में रुपये को मजबूत मानकर नए सौदे किए जाएं, जबकि निर्यातकाें का मनाना है कि मार्केट का कोई भरोसा नहीं, रुपया मजबूत होगा या कमजोर। टेक्सटाइल उत्पादाें का लागत मूल्य बढ़ चुका है। निर्यातकाें का तर्क है कि अकसर एक आर्डर कई माह में तैयार होता है। ऐसे में रुपया और कमजोर हो गया तो उनकी लागत बढ़ जाएगी। ऐसे में उन्हें नुकसान तय है। अस्थिरता के चलते नए सौदे नहीं हो पा रहे।
निर्यातकाें से लेकर कारीगराें तक थे प्रभावित
नए सौदे नहीं होने के कारण इसका असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर निर्यात से जुडे़ हजाराें निर्यातकाें, उन्हें कच्चा माल सप्लाई करने वाले दुकानदाराें, जॉब वर्क करने वालाें, ठेकेदाराें, कारीगराें व माल ढुलाई करने वाले ट्रांसपोर्टराें पर पड़ रहा था। निर्यातकाें का चिंता सता रही थी कि अगर जल्द ही रुपये की दशा में सुधार नहीं हुआ तो निर्यात का पिछले 4550 करोड़ के आंकडे़ में कमी आ सकती है। मगर ऐसी स्थिति आने से पहले रुपये ने अंगड़ाई लेकर मजबूती पकड़ ली। इससे निर्यातकाें के चेहरे खिले हुए हैं।
वर्जन
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डालर व रुपये में उतार-चढ़ाव से टेक्सटाइल उत्पादाें के निर्यात पर असर पड़ रहा था। कई माह से अर्जेंट को छोड़कर रूटीन के नए सौदाें की संख्या में कमी आ गई थी। इसका सीधा असर निर्यात पर भी देखा गया। मगर अब जब रुपया मजबूत हो चला है तो इससे बाजार में स्थिरता आएगी और इसका सकारात्मक असर निर्यात पर पडे़ेगा। स्वाभाविक बात है कि अब नए सौदे गति पकडेे़ंगे, जो बाजार के लिए एक अच्छा संकेत है।
-जितेंद्र मलिक, निर्यातक एवं अध्यक्ष कॉरपेट निर्माता संघ, पानीपत
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टेक्सटाइल नगरी पानीपत में पिछले कई साल से 4300 से लेकर 4500 करोड़ के बीच टेक्सटाइल उत्पादाें का निर्यात हो रहा है। पिछले साल निर्यात का आंकड़ा 4450 करोड़ था। यह निर्यात यूरोप महाद्वीपों के अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, हालैंड, नार्वे, स्विट्जरलैंड, खाड़ी देशाें को होता है। इन देशाें को कॉरपेट, ऊनी कॉरपेट, दरी, पर्दे, मैट, फुटमैट, टेबल कवर और घर की सजावट का सामान आदि निर्यात किया जाता है।
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सालभर पहले उतार-चढ़ाव ने बिगाड़ दिया था गणित
मार्च-2013 तक लगभग सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। अप्रैल में डालर की कीमत 54.73 रुपये थी। मगर उसके बाद रुपया डालर की तुलना में कमजोर पड़ने लगा। इस क्रम में एक जून को डालर की कीमत 56.84, एक जुलाई को 59.74, एक अगस्त को 60.99, एक सितंबर को 66.40 रुपये तक पहुंच गया। इसी बीच रुपये में थोड़ा सुधार होता तो अगले ही दिन यह उससे अधिक गिर जाता है। अंत मेें रुपया अपने रिकार्ड निचले स्तर 68.80 तक चला गया। उसके बाद तो पूरा साल डालर व रुपये के बीच आंख मिचौली का खेल चलता रहा।
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नए सौदाें पर नहीं बन पा रही थी सहमति
पहले डॉलर अकसर कई माह तक लगभग एक ही रेट के आसपास घूमता था। ऐसे में उसको ही आधार मानकर नए सौदे किए जाते थे मगर अरसे तक चले भारी उतार-चढ़ाव के कारण डालर व रुपये की कीमत को लेकर निर्यातक व बॉयराें (विदेशी खरीदाराें) में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। उथल-पुथल के दौर में बॉयर व निर्यातक अपने आपको सुरक्षित रखकर सौदे करना चाहते थे। बॉयर अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए तर्क दे रहे हैं कि रुपया अस्थायी तौर पर कमजोर हुआ है। यह कभी भी मजबूत हो सकता है। ऐसे में रुपये को मजबूत मानकर नए सौदे किए जाएं, जबकि निर्यातकाें का मनाना है कि मार्केट का कोई भरोसा नहीं, रुपया मजबूत होगा या कमजोर। टेक्सटाइल उत्पादाें का लागत मूल्य बढ़ चुका है। निर्यातकाें का तर्क है कि अकसर एक आर्डर कई माह में तैयार होता है। ऐसे में रुपया और कमजोर हो गया तो उनकी लागत बढ़ जाएगी। ऐसे में उन्हें नुकसान तय है। अस्थिरता के चलते नए सौदे नहीं हो पा रहे।
निर्यातकाें से लेकर कारीगराें तक थे प्रभावित
नए सौदे नहीं होने के कारण इसका असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर निर्यात से जुडे़ हजाराें निर्यातकाें, उन्हें कच्चा माल सप्लाई करने वाले दुकानदाराें, जॉब वर्क करने वालाें, ठेकेदाराें, कारीगराें व माल ढुलाई करने वाले ट्रांसपोर्टराें पर पड़ रहा था। निर्यातकाें का चिंता सता रही थी कि अगर जल्द ही रुपये की दशा में सुधार नहीं हुआ तो निर्यात का पिछले 4550 करोड़ के आंकडे़ में कमी आ सकती है। मगर ऐसी स्थिति आने से पहले रुपये ने अंगड़ाई लेकर मजबूती पकड़ ली। इससे निर्यातकाें के चेहरे खिले हुए हैं।
वर्जन
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डालर व रुपये में उतार-चढ़ाव से टेक्सटाइल उत्पादाें के निर्यात पर असर पड़ रहा था। कई माह से अर्जेंट को छोड़कर रूटीन के नए सौदाें की संख्या में कमी आ गई थी। इसका सीधा असर निर्यात पर भी देखा गया। मगर अब जब रुपया मजबूत हो चला है तो इससे बाजार में स्थिरता आएगी और इसका सकारात्मक असर निर्यात पर पडे़ेगा। स्वाभाविक बात है कि अब नए सौदे गति पकडेे़ंगे, जो बाजार के लिए एक अच्छा संकेत है।
-जितेंद्र मलिक, निर्यातक एवं अध्यक्ष कॉरपेट निर्माता संघ, पानीपत