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काले मन ने उजले धन को काला कर दिया, एक चोट सरकारी ने, पल में उजाला कर दिया
अमर उजाला ब्यूरो, पानीपत।
Updated Sun, 04 Dec 2016 11:45 PM IST
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पानीपत। महक साहित्यिक सभा द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी में काले धन व समाज की बदलती धारणाओं पर अपने विचार रखे और समाज को जागृत रहने की सीख दी। बाबा गंगापुरी रोड पर आयोजित काव्य गोष्ठी में मुख्यातिथि डॉ. दर्शन लाल आजाद व विशिष्ट अतिथि सलीम अख्तर अंसारी रहे। अध्यक्षता रमेश पुहाल पानीपती व संचालन ओमबीर जांगड़ा ने किया।
सुभाष भाटिया ने कहा कि काले मन ने उजले धन को काला कर दिया, एक चोट सरकारी ने, पल में उजाला कर दिया, मान्यता तक मान है, हर युग में हर संसारी चीज का, मान्यता गई, मिट्टी हुई, कोई मान मोल नहीं उस चीज का।।
रमेश चंद्र पुहाल पानीपती ने कहा कि तमन्नाओं का खूं जो पी रहे हैं, बताऊं कि दुनिया में क्यूं जी रहे हैं, ये खानाबदोशी है तेरी इनायत, तेरे साथ दिन रात हम भी जी रहे हैं, वो रातों के मंजर, मुहब्बत की बातें, तेरे हम पे अक्सर करम भी रहे हैं।।
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डॉ. दर्शनलाल आजाद ने कहा कि प्रजातंत्र का कैसा अनूठा विधान है, जहां चोर व जज का वोट एक ही समान है, यह जज का अपमान चोर का सम्मान है, यह मृद्धा भी तो एक सवालिया निशान है, सोच इसमें क्या नफा क्या नुकसान है, आजाद इस भूल का कोई समाधान है।।
सलीम अंसारी ने कहा कि नफरत को आज दिल से मिटाना है दोस्तों, पैगाम जिंदगी का सुनाना है दोस्तों, अपने अमा के फूल खिलाकर सलीम अब, जन्नत नुमां वतन को बनाना है दोस्तों।।
मकर सिंह मित्रोलिया ने कहा कि अंग्रेजों से हमें मिली आजादी, अपनों से हम आजाद नहीं, पैसा हो गया सब कुछ, फिर और इसके बाद नहीं, उठो जागो सोने वालों, कब तक अत्याचार सहोगे, क्यों सहे हम जुल्मों सितम, जुल्मों सितम के हम दामाद नहीं।।
मास्टर शिवचंद ने कहा कि मन चंचल को समझाते चलो, प्यार की गंगा बहाते चलो, फिर भी अगर मन ना माने, इसे बार-बार समझाते चलो।।
ओमबीर जांगड़ा ने कहा कि मुद्दतों साथ चलते रहे, वक्त के सांचे में ढलते रहे, हम अपने उसूल न बदल सकें, वो अक्सर चेहरे बदलते रहे।।
अश्वनी कुमार सांवरिया ने कहा कि बिन बहार खिल उठे गुच्छाए गुल, मुस्कुराने का हुनर कोई उनसे सीखे, वो सिकन आने नहीं देता है यारों, गम छुपाने का हुनर कोई उनसे सीखे।।
चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि लाठी व पत्थरों से हड्डियां टूट जाती हैं, शब्दों से संबंध टूट जाते हैं।।
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सुभाष भाटिया ने कहा कि काले मन ने उजले धन को काला कर दिया, एक चोट सरकारी ने, पल में उजाला कर दिया, मान्यता तक मान है, हर युग में हर संसारी चीज का, मान्यता गई, मिट्टी हुई, कोई मान मोल नहीं उस चीज का।।
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रमेश चंद्र पुहाल पानीपती ने कहा कि तमन्नाओं का खूं जो पी रहे हैं, बताऊं कि दुनिया में क्यूं जी रहे हैं, ये खानाबदोशी है तेरी इनायत, तेरे साथ दिन रात हम भी जी रहे हैं, वो रातों के मंजर, मुहब्बत की बातें, तेरे हम पे अक्सर करम भी रहे हैं।।
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डॉ. दर्शनलाल आजाद ने कहा कि प्रजातंत्र का कैसा अनूठा विधान है, जहां चोर व जज का वोट एक ही समान है, यह जज का अपमान चोर का सम्मान है, यह मृद्धा भी तो एक सवालिया निशान है, सोच इसमें क्या नफा क्या नुकसान है, आजाद इस भूल का कोई समाधान है।।
सलीम अंसारी ने कहा कि नफरत को आज दिल से मिटाना है दोस्तों, पैगाम जिंदगी का सुनाना है दोस्तों, अपने अमा के फूल खिलाकर सलीम अब, जन्नत नुमां वतन को बनाना है दोस्तों।।
मकर सिंह मित्रोलिया ने कहा कि अंग्रेजों से हमें मिली आजादी, अपनों से हम आजाद नहीं, पैसा हो गया सब कुछ, फिर और इसके बाद नहीं, उठो जागो सोने वालों, कब तक अत्याचार सहोगे, क्यों सहे हम जुल्मों सितम, जुल्मों सितम के हम दामाद नहीं।।
मास्टर शिवचंद ने कहा कि मन चंचल को समझाते चलो, प्यार की गंगा बहाते चलो, फिर भी अगर मन ना माने, इसे बार-बार समझाते चलो।।
ओमबीर जांगड़ा ने कहा कि मुद्दतों साथ चलते रहे, वक्त के सांचे में ढलते रहे, हम अपने उसूल न बदल सकें, वो अक्सर चेहरे बदलते रहे।।
अश्वनी कुमार सांवरिया ने कहा कि बिन बहार खिल उठे गुच्छाए गुल, मुस्कुराने का हुनर कोई उनसे सीखे, वो सिकन आने नहीं देता है यारों, गम छुपाने का हुनर कोई उनसे सीखे।।
चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि लाठी व पत्थरों से हड्डियां टूट जाती हैं, शब्दों से संबंध टूट जाते हैं।।