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गांवों में जाकर कैशलेस जीवन जीने के बारे में समझा रहे है

Sat, 03 Dec 2016 12:02 AM IST
amar ujala beuro panipat
amar ujala beuro panipat Updated Sat, 03 Dec 2016 12:02 AM IST
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 पहले स्वैप मशीन लगवाना आम आदमी के बस से भी बाहर था लेकिन आज के समय में स्वैप मशीन लगवाना आम लोगों के बजट में आ गया है। पहले स्वैप मशीन सिर्फ मॉल, बड़े कंपनियों, होटलों में ही मिलती थी। लेकिन आज हर बड़े शोरुम पर स्वैप मशीन लगने लगी हैं।
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कैशलेस में ही हमारा आने वाला भविष्य है इस थीम को लेकर लोगों में कैशलेस भुगतान के लिए जागरुकता फैलाई जा रही है। जागरुकता अभियान में लोगों को बताया जा रहा है कि कैशलेस ट्राजेक्शन करने से आप लोगों के ही फायदे है। जिले के प्रत्येक गांवों में कैप लगाना शुरु कर दिया है। अब हर रोज कैशलेस ट्राजेक्शन के बारे में लोगों जागरूक किया जाएगा। इसमें लोगों को कैश देने के घाटे और कैशलेस से होने वाले फायदों को समझाया जाएगा। मार्केट में आ रहे नए-नए प्लानों के बारे में दुकानदारों को बताया जा रहा है। उनके बारे में फायदे बताए जा रहे है।
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हर रोज बैंकों में आ रहे है दस उपभोक्ता
हर रोज बैंकों में स्वैप मशीन को लगवाने व रखने के लिए खर्च के बारे में पूछने के लिए करीब दस लोग आ रहे है। बैंक मैनेजरों का कहना है कि हर रोज दस लोग आते है कई लोगों को स्कीम समझ में आ जाती है तो वह मशीन को लेने के लिए पैसे जमा करवा जाता है। लेकिन अधिकतर लोग सिर्फ पूछ कर ही जा रहे है।
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गांवों में जाकर लोगों को कर रहे हैं जागरूक
कैशलेस की जागरूकता के लिए जिले के लीड बैंक के मैनेजर गांवों में जा रहे हैं और गांव के लोगों को सरपंच की सहायता से कैशलेस के प्रति जागरूकता अभियान चला कर लोगों को कैश से कैशलेस कीअपनाने को समझा रहे हैं। कैशलेस जागरूकता अभियान के जरिए जिले के सभी गांवों को लिया जाएगा। यह कार्य सरपंच के सहायता से किया जा रहा है और गांव के सरपंच को कैशलेस से गांव में जागरूकता फैलाने की अपील की है।

दुकानदार बैंक से ऐसे ले सकते है स्वैप मशीन
स्वैप मशीन दो प्रकार आती है। पहली एक स्थान पर लगने वाली और दूसरी पोर्टेबल आती है। इन दोनों मशीनों में काफी अंतर है। पहली में एक स्थान पर लगने वाली मशीन का रेंट कम होता है लेकिन पोर्टेबल मशीन का प्रति महीने का रेट अधिक देना होता है। कई बैंक अधिकारी 31 दिसंबर 2016 तक स्वैप मशीन लगवाने का खर्च नहीं ले रहे है। स्वैप मशीन लगवाने के लिए बैंक में खाता होना अनिवार्य है। बैंक अधिकारी सबसे पहले उसके खाते सारी डिटेल लेंगे। उसको देखते हुए ही स्वैप मशीन लगवाने का प्रथम चरण पूरा होता है। दूसरे चरण में बैंक का खाता अगर उसी बैंक का है तो मशीन लगवाने का खर्च कम आएगा नहीं तो अधिक।


मशीन लगवाने का खर्च व इसे रखने का खर्च
मशीन लगवाने का खर्च एक हजार से ढाई हजार तक दुकानदार को प्रति महीने के हिसाब से उसको मशीन का रेंट देना होगा। जो हर बैंक का अलग-अलग है। जिसमें न्यूनतम 200 रुपये से लेकर अधिकतम करीब 1000 रुपये तक है। इसके अलावा स्वैप मशीन पर प्रति कार्ड स्वैप होने पर करीब 1.35 प्रतिशत से 2 प्रतिशत टैक्स कटेगा। कई बैंक अपने उपभोक्ताओं को अगर उनकी प्रति महीने की ट्रांजेक्शन पचास हजार या इससे अधिक है मशीन का रेंट नहीं लिया जाएगा।
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