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Panipat News: कभी हॉकी मांग कर मैदान में उतरी, आज शीर्ष पर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 09 Apr 2024 04:24 AM IST
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Once upon a time, she entered the field in search of hockey, today she is on top.
आठ मरला निवासी प्रियंका डोगरा का हुआ इंडिया जूनियर महिला हॉकी कैंप में चयन
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कोर ग्रुप के 32 खिलाड़ियों में सबसे ऊपर बनाई जगह, सात साल पहले शुरू किया था खेलना
माई सिटी रिपोर्टर
पानीपत। ‘रात नहीं ख्वाब बदलता है, मंजिल नहीं कारवां बदलता है। जज्बा रखो जीतने का क्यूंकि, किस्मत बदले न बदले, पर वक्त जरूर बदलता है’। एक कविता की इन लाइनाें को आठ मरला निवासी 20 वर्षीय प्रियंका डोगरा ने साबित किया है। मेहनत के दम पर उनका चयन इंडिया की जूनियर महिला हॉकी टीम के लिए हुआ है। हॉकी के मैदान पर सेंटर हाफ मिड फील्ड में खेलने वाली प्रियंका यहां तक पहुंचने वाली पानीपत की पहली बेटी भी हैं। यही नहीं सात साल से हॉकी खेल रही प्रियंका ने इंडिया कैंप के लिए चार बार ट्रायल दिया। उसने हिम्मत नहीं हारी और आज मेहनत के दम पर अपनाा मुकाम हासिल कर लिया है।
प्रियंका डोगरा ने बताया कि उसके पिता चरणदास एक ट्रांसपोर्ट पर मेहनत मजदूरी करते हैं और मां चंचल गृहिणी हैं। वह बचपन से ही महिला हॉकी के मैच देखती थी। इसके बाद उसने हॉकी में अपना भविष्य बनाने का निर्णय लिया लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति उसके सामने बड़ी चुनौती बन गई। अपने सपने को पूरा करने के लिए वह हॉकी के मैदान में उतर आई।अपने खेल में लगातार सुधार किया और इसी की बदौलत आज उसका चयन इंडिया की जूनियर महिला हॉकी टीम के कैंप में हुआ। वह अब यहां लगातार मेहनत कर रही है। कैंप में 32 खिलाड़ियों में वह शीर्ष पर हैं। उसे उम्मीद है कि वह इंडिया की टीम में शामिल होकर अपने सपने को पूरा कर सकेगी। प्रियंका ने बताया कि वह प्रथम वर्ष में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ती है। वह टीम में सेंटर हाफ मिड फील्ड में खेलती है। वह खेलो इंडिया में स्वर्ण और कांस्य पदक जीत चुकी है। उसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की झोली में स्वर्ण पदक लाना है।
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शुरुआत में दूसरे खिलाड़ियों की लेती थी हॉकी
प्रियंका ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने से उसे खेलने में काफी दिक्कत आई। उसके पास अपनी हॉकी और खेल का दूसरा सामान भी नहीं था। कोच धर्मेंद्र ने उसको हाॅकी और अन्य सामान उपलब्ध कराया। वह इसके बाद अपने खेल में लगातार सुधार करती चली गई। उसने दिन में आठ घंटे तक भी हॉकी खेली। वह स्कूल से आने के बाद अभ्यास करने मैदान में पहुंच जाती थी। उसे और उसके परिवार को कई बार लोगों ताने भी सुनने पड़े, लेकिन उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया।
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