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आध्यात्मिक जीवन जीकर रूहानियत और इंसानियत को करें सार्थक: माता सुदीक्षा जी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 20 Nov 2022 09:00 AM IST
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Make spirituality and humanity meaningful by living a spiritual life: Mata Sudiksha
माता सुदीक्षा जी महाराज व साथ में उनके जीवनसाथी रमित जी। - फोटो : Panipat
समालखा। परमात्मा का प्रतिपल स्मरण करते हुए मानवीय गुणों से युक्त जीवन जीना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन जीकर रूहानियत और इंसानियत को सार्थक करें। समालखा स्थित आध्यात्मिक स्थल पर आयोजित 75वें वार्षिक निरंकारी संत समागम में सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने संदेश दिया।
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सत्गुरु माता ने कहा कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के उपरांत जब संत विवेकपूर्ण जीवन जीते हैं, तभी वास्तविक रूप में वह वंदनीय कहलाते हैं। वह पूरे संसार के लिए उपयोगी सिद्ध हो जाते हैं। ऐसे संत महात्मा ब्रह्मज्ञान की दिव्य ज्योति का स्वरूप बन जाते हैं और अपने प्रकाशमय जीवन से समाज में व्याप्त भ्रम-भ्रांतियों के अंधकार से मुक्ति प्रदान करते हैं। ज्ञान के दिव्य चक्षु से संत महात्माओं को संसार का हर एक प्राणी उत्तम एवं श्रेष्ठ दिखाई देता है और समदृष्टि के भाव को अपनाते हुए हृदय में किसी के प्रति नकारात्मक भाव उत्पन्न नहीं होता है।
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जीवन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए सद्गुरू माता ने कहा कि जीवन का हर एक क्षण अमूल्य है। जिसे व्यर्थ में न गंवाकर उसका सदुपयोग करते हुए सकारात्मक भावों से युक्त जीवन जीएं। अपने परिवार एवं समाज के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए एक कदम आगे बढ़कर स्वयं का आत्मविश्लेषण करें और अपने आपको और बेहतर बनाएं। वास्तव में हम एक आध्यात्मिकता से युक्त जीवन जीने के लिए मनुष्य तन में आए हैं, इस बात को प्रमाणित करते हुए रूहानियत और इंसानियत को संग-संग वाला सार्थक जीवन जीएं। सच्चाई का यह दिव्य संदेश युगों युगों से संतों की ओर से दिया जा रहा है। जिसका वर्तमान स्वरूप यह मिशन है। संत निरंकारी मिशन केवल रातोंरात का सफर नहीं अपितु गुरुओं और संत महात्माओं के वर्षों के तप एवं त्याग का परिणाम है। जिस प्रकार सूर्यमुखी का पुष्प सूर्य की ओर ही उन्मुख रहता है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी संत ज्ञान की दिव्य ज्योति में स्वयं को प्रकाशित रखते हैं और दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनते हैं।
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