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Panipat News: एक हफ्ते बाद घर आने का था वादा, पहले दिन हो गए बलिदान
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संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। कारगिल का युद्ध शुरू हुआ तो हर किसी की धड़कन बढ़ गई थी। मेरे पति ऋषिपाल त्यागी की कारगिल में तैनाती थी।
उनसे युद्ध शुरू होने से पहले फोन पर बात की तो उन्होंने एक सप्ताह बाद छुट्टी आने की बात कही थी। उन्होंने युद्ध के पहले दिन अपना बलिदान दे दिया। यह बात सनौली खुर्द निवासी गीता देवी ने बताई।
ऋषिपाल त्यागी का जन्म 1966 को हुआ। वे 1985 में 23 राजपूत बटालियन में भर्ती हुए थे और कारगिल युद्ध के दौरान 28 मई 1999 को बलिदान हुए थे। उन्होंने गोला बारूद के साथ दुश्मनों को कड़ा जवाब दिया था। वे और उनके साथी लगातार जवाब से दुश्मनों पर हावी होते जा रहे थे। दुश्मनों ने उन पर निशाना साधा। एक गोला उन पर आकर गिरा। उन्होंने घायल होने पर भी अपनी पोस्ट को नहीं छोड़ा और लगातार हमलावर रहे। कुछ समय बाद उनको अचानक कई गोली लगीं जिससे वह बलिदान हो गए।
गीता देवी ने बताया कि उनके पति ऋषिपाल त्यागी छुट्टी के दिनों में सेना के बारे में बताते थे। वे कहते थे कि वे देश की सेवा, सुरक्षा के लिए सेना में भर्ती हुए हैं। उन पर देश का सबसे बड़ा कर्ज है। वे सेना में देश सेवा कर यह कर्ज निभाएंगे। उन पर घर परिवार से पहले देश सेवा की जिम्मेदारी है। अगर देश की सेवा करते उनके प्राण भी चले जाएं तो कभी दुखी न होना बल्कि गर्व महसूस करना। उनकी ये बात आज भी याद आती हैं और गर्व महसूस होता है।
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पानीपत। कारगिल का युद्ध शुरू हुआ तो हर किसी की धड़कन बढ़ गई थी। मेरे पति ऋषिपाल त्यागी की कारगिल में तैनाती थी।
उनसे युद्ध शुरू होने से पहले फोन पर बात की तो उन्होंने एक सप्ताह बाद छुट्टी आने की बात कही थी। उन्होंने युद्ध के पहले दिन अपना बलिदान दे दिया। यह बात सनौली खुर्द निवासी गीता देवी ने बताई।
ऋषिपाल त्यागी का जन्म 1966 को हुआ। वे 1985 में 23 राजपूत बटालियन में भर्ती हुए थे और कारगिल युद्ध के दौरान 28 मई 1999 को बलिदान हुए थे। उन्होंने गोला बारूद के साथ दुश्मनों को कड़ा जवाब दिया था। वे और उनके साथी लगातार जवाब से दुश्मनों पर हावी होते जा रहे थे। दुश्मनों ने उन पर निशाना साधा। एक गोला उन पर आकर गिरा। उन्होंने घायल होने पर भी अपनी पोस्ट को नहीं छोड़ा और लगातार हमलावर रहे। कुछ समय बाद उनको अचानक कई गोली लगीं जिससे वह बलिदान हो गए।
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गीता देवी ने बताया कि उनके पति ऋषिपाल त्यागी छुट्टी के दिनों में सेना के बारे में बताते थे। वे कहते थे कि वे देश की सेवा, सुरक्षा के लिए सेना में भर्ती हुए हैं। उन पर देश का सबसे बड़ा कर्ज है। वे सेना में देश सेवा कर यह कर्ज निभाएंगे। उन पर घर परिवार से पहले देश सेवा की जिम्मेदारी है। अगर देश की सेवा करते उनके प्राण भी चले जाएं तो कभी दुखी न होना बल्कि गर्व महसूस करना। उनकी ये बात आज भी याद आती हैं और गर्व महसूस होता है।
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