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होलाष्टक शुरू, अब नहीं हो सकेंगे मांगलिक कार्य
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पानीपत। हिंदू धर्म में होली के त्योहार का खास महत्व है। 17 फरवरी से फाल्गुन मास की शुरूआत हो चुकी है जबकि होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। होलिका दहन पर्व 17 मार्च और रंगोत्सव फाग 18 मार्च को हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। परंतु होली से आठ दिन पहले होलाष्टक लग जाता है। फाल्गुन मास के शुल्क पक्ष की अष्टमी अर्थात वीरवार से होलाष्टक शुरू हो चुका है। सनातन धर्म के अनुसार, होलाष्टक के दौरान कोई भी मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। हालांकि देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए ये दिन बहुत श्रेष्ठ माने गए हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित राधे-राधे के अनुसार होलाष्टक शब्द होली और अष्टक से मिलकर बना है। इसका मतलब है होली के आठ दिन। होलाष्टक के दिनों में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, मकान-वाहन की खरीदारी की मनाही होती है। होलाष्टक 10 मार्च गुरुवार से शुरू हो चुका है जो 17 मार्च गुरुवार तक रहेगा। मान्यता है कि इस दौरान किसी भी शुभ कार्य को करना अपशकुन होता है। होलाष्टक से होली और होलिका दहन की तैयारी शुरू हो जाती है। उन्होंने बताया कि पन्ना. उत्साह और उमंग का पांच दिवसीय होली पर्व समारोह के साथ मनाए जाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस साल 17 मार्च की रात को होलिका दहन होगा और इसके दूसरे दिन 18 मार्च की सुबह से रंगोत्सव मनाया जाएगा। ये रंगोत्सव पंचमी तक चलेगा।
होलाष्टक पर न करें ये काम
हिंदुओं में सोलह संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक किए जाते हैं। इनमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, केशांत, विवाह, अन्त्येष्टि आदि शामिल हैं। होलाष्टक में सोलह संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। अगर इस दौरान किसी का निधन हो जाए, तो उनके अंतिम संस्कार के लिए भी शांति करानी चाहिए। किसी भी नवविवाहिता को ससुराल में पहली होली देखने से भी बचना चाहिए।
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होलिका दहन पर रहेगी भद्रा की छाया
वहीं पंडित जयपाल शर्मा ने बताया कि होलिका दहन 17 मार्च गुरुवार के दिन होगा। इस बार होलिका दहन पर भद्रा की छाया रहेगी। दहन के लिए सिर्फ एक घंटा 10 मिनट का समय मिलेगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 17 मार्च को रात 9 बजकर 4 मिनट से रात 10 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इसको भद्रा का पुच्छकाल कहते हैं। चंद्रमा जब कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में गोचर करता हैं, तब भद्रा विष्टीकरण का योग का निर्माण होता हैं। फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 17 मार्च को दोपहर 1.29 से प्रारंभ होकर अगले दिन दोपहर 12.47 तक रहेगी। उदय तिथि में 18 मार्च को पूर्णिमा रहने पर इस दिन होली खेली जाएगी।
होलाष्टक में नहीं होते शुभ कार्य
होलाष्टक के आठ दिनों को शुभ कार्य नहीं करने के पीछे पौराणिक कथा है जिसके अनुसार कामदेव द्वारा भगवान शिव की तपस्या भंग करने के कारण फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि पर क्रोध में आकर कामदेव को भस्म कर दिया था। इसलिए होलाष्टक काल को विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन समारोह आदि जैसे शुभ कार्यों को करने के लिए अशुभ माना जाता है। होलाष्टक लगते ही हिंदू धर्म से जुड़े सोलह संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
होलाष्टक पर करें ईश आराधना
एक तरफ होलाष्टक में 16 संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है, वहीं यह समय भगवान की भक्ति के लिए भी उत्तम माना जाता है। होलाष्टक के दौरान दान-पुण्य करने का विशेष फल प्राप्त होता है। इस दौरान मनुष्य को अधिक से अधिक भगवत भजन और वैदिक अनुष्ठान करने चाहिए, ताकि समस्त कष्टों से मुक्ति मिल सके। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से हर तरह के रोग से छुटकारा मिलता है और सेहत अच्छी रहती है।
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ज्योतिषाचार्य पंडित राधे-राधे के अनुसार होलाष्टक शब्द होली और अष्टक से मिलकर बना है। इसका मतलब है होली के आठ दिन। होलाष्टक के दिनों में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, मकान-वाहन की खरीदारी की मनाही होती है। होलाष्टक 10 मार्च गुरुवार से शुरू हो चुका है जो 17 मार्च गुरुवार तक रहेगा। मान्यता है कि इस दौरान किसी भी शुभ कार्य को करना अपशकुन होता है। होलाष्टक से होली और होलिका दहन की तैयारी शुरू हो जाती है। उन्होंने बताया कि पन्ना. उत्साह और उमंग का पांच दिवसीय होली पर्व समारोह के साथ मनाए जाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस साल 17 मार्च की रात को होलिका दहन होगा और इसके दूसरे दिन 18 मार्च की सुबह से रंगोत्सव मनाया जाएगा। ये रंगोत्सव पंचमी तक चलेगा।
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होलाष्टक पर न करें ये काम
हिंदुओं में सोलह संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक किए जाते हैं। इनमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, केशांत, विवाह, अन्त्येष्टि आदि शामिल हैं। होलाष्टक में सोलह संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। अगर इस दौरान किसी का निधन हो जाए, तो उनके अंतिम संस्कार के लिए भी शांति करानी चाहिए। किसी भी नवविवाहिता को ससुराल में पहली होली देखने से भी बचना चाहिए।
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होलिका दहन पर रहेगी भद्रा की छाया
वहीं पंडित जयपाल शर्मा ने बताया कि होलिका दहन 17 मार्च गुरुवार के दिन होगा। इस बार होलिका दहन पर भद्रा की छाया रहेगी। दहन के लिए सिर्फ एक घंटा 10 मिनट का समय मिलेगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 17 मार्च को रात 9 बजकर 4 मिनट से रात 10 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इसको भद्रा का पुच्छकाल कहते हैं। चंद्रमा जब कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में गोचर करता हैं, तब भद्रा विष्टीकरण का योग का निर्माण होता हैं। फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 17 मार्च को दोपहर 1.29 से प्रारंभ होकर अगले दिन दोपहर 12.47 तक रहेगी। उदय तिथि में 18 मार्च को पूर्णिमा रहने पर इस दिन होली खेली जाएगी।
होलाष्टक में नहीं होते शुभ कार्य
होलाष्टक के आठ दिनों को शुभ कार्य नहीं करने के पीछे पौराणिक कथा है जिसके अनुसार कामदेव द्वारा भगवान शिव की तपस्या भंग करने के कारण फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि पर क्रोध में आकर कामदेव को भस्म कर दिया था। इसलिए होलाष्टक काल को विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन समारोह आदि जैसे शुभ कार्यों को करने के लिए अशुभ माना जाता है। होलाष्टक लगते ही हिंदू धर्म से जुड़े सोलह संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
होलाष्टक पर करें ईश आराधना
एक तरफ होलाष्टक में 16 संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है, वहीं यह समय भगवान की भक्ति के लिए भी उत्तम माना जाता है। होलाष्टक के दौरान दान-पुण्य करने का विशेष फल प्राप्त होता है। इस दौरान मनुष्य को अधिक से अधिक भगवत भजन और वैदिक अनुष्ठान करने चाहिए, ताकि समस्त कष्टों से मुक्ति मिल सके। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से हर तरह के रोग से छुटकारा मिलता है और सेहत अच्छी रहती है।