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हिंदी भाषा भावनाओं को व्यक्त करने का एक ऐसा साधन जिसकी ताकत से बदल सकती है दुनिया

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 20 Aug 2021 12:08 AM IST
सार

सभी शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि हिंद की पहचान हिंदी को प्रत्येक जनमानस के हृदय तक पहुंचाएं, ताकि मातृभाषा के वात्सल्य से कोई वंचित ना रहे। हमें अपने देश की धरोहर यानी अपनी हिंदी भाषा का सम्मान करना चाहिए।

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Hindi language is such a means of expressing feelings whose power can change the world
हिंदी को बढ़ावा - फोटो : demo

विस्तार

निज भाषा उन्नति है सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल... जीवन में भाषा ही एकमात्र वह साधन है जो हमें सभ्य व सुसंस्कृत बनाती है। हम हिंदी को गर्व से अपनी मातृभाषा का दर्जा देते हैं, जो अनेकता में एकता का स्वर पूरे विश्व में गुंजायमान करती है। आज संपूर्ण विश्व में हिंदी का वर्चस्व अपने उत्कर्ष पर है, जिसके प्रेम, अपनत्व व सौहार्द से देश की एकता व अखंडता का प्रसार कायम है। वर्तमान समय की प्रतिकूल परिस्थितियों को देखते हुए हिंदी भाषा भावनाओं को व्यक्त करने का एक ऐसा साधन है जिसकी ताकत के आधार पर दुनिया को भी बदला जा सकता है। सभी शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि हिंद की पहचान हिंदी को प्रत्येक जनमानस के हृदय तक पहुंचाएं, ताकि मातृभाषा के वात्सल्य से कोई वंचित ना रहे। हमें अपने देश की धरोहर यानी अपनी हिंदी भाषा का सम्मान करना चाहिए और उसके उत्थान के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
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जब चीनियों को चीनी भाषा बोलने में शर्म नहीं आती, जापानी अपनी मातृभाषा बोलते हैं तो हम क्यों नहीं। भारतीयों को हिंदी बोलने में शर्म क्यों महसूस होती है। आजकल किसी बड़े कार्यक्रम में हो और हिंदी बोलो तो ऐसा लगता है जैसे कोई अपराध कर दिया हो। मैं हिंदी बोलने में गर्व महसूस करती हूं। पर यह क्या बात हुई कि अपनी मां को छोड़कर दूसरे की मां की सेवा करना।
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-सरोज गुर, सेवानिवृत्त शिक्षा अधिकारी।

आज के समय में अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक हो गया है। अंग्रेजी की अज्ञानता से हमारा करियर प्रभावित होता है। इसका ये अर्थ नहीं कि हम अपनी मातृभाषा को भूल जाएं। जो लोग मानते हैं कि अंग्रेजी बोलने से स्टेटस बढ़ता है, मैं उनसे कहना चाहूंगी कि अगर गुलामी करने से स्टेटस बढ़ता है तो जरूर बढ़ाएं। पर ऐसा करना अपने देश के साथ गद्दारी होगी।
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-संजू अबरोल, प्राचार्या, राजकीय महाविद्यालय, पानीपत।

हमारी राष्ट्रभाषा का हमारी सीखने की क्षमता के साथ-साथ आंतरिक गुणवत्ता व सामर्थ्य को बढ़ावा देने में अहम योगदान रहा है। हमें अपने देश व हमारी मातृभाषा पर गर्व है और सदैव रहेगा। छोटे बच्चों को मातृभाषा का ज्ञान देना हमारा कर्तव्य ही नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। नई शिक्षा नीति ने नि:संदेह इस दिशा में कारगर कदम उठाते हुए बहुभाषावाद पर जोर दिया है।
-हीरामल भार्गव, प्राचार्य, रावमावि, उझा, पानीपत।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा तो है ही, साथ ही हरियाणा जैसे हिंदी भाषी राज्य में मातृभाषा भी मानी जाती है। फिर भी अंग्रेजी भाषा पूरे संसार मे संप्रेषण करने का माध्यम मानी जाती है। इसलिए वह हिंदी भाषा पर भारी पड़ती नजर आती है। परंतु अभी समय बदल रहा है, शिक्षाविद अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी का महत्व समझने लगे हैं। हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी में हो ताकि बच्चे का आधार सुदृढ़ हो सके।

-आजाद आर्य, चेयरमैन, आर्य आदर्श कन्या महाविद्यालय, मडलौडा।

हिंदी हमारी मातृभाषा है। किसी विषय को जो अपनी भाषा में समझा जा सकता है, उसे दूसरी भाषा में समझना थोड़ा मुश्किल होता है। अंग्रेजी एक जुबान है, एक भाषा है, जैसे और भाषाओं का ज्ञान होता है, इसका भी ज्ञान जरूरी है, पर अंग्रेजी ज्ञान का सबूत नहीं, वह मात्र एक भाषा है। जरूरी नहीं जिसको ये भाषा आती हो वह ज्ञानी हो। इसलिए हिंदी को भी महत्व दिया जाना जरूरी है।
-प्रोमिला भारद्वाज, प्राचार्या, डाइट पानीपत।
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