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Highcourt: न्याय व्यवस्था का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं पुनर्वास होना चाहिए, दोहरे हत्याकांड में की टिप्पणी
Sat, 04 Apr 2026 01:48 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 04 Apr 2026 01:48 AM IST
सार
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली का लक्ष्य सुधार और पुनर्वास है और अपराध को व्यक्ति से अलग करके देखने की जरूरत है। यदि दोषी सुधार कर सकता है तो उसे समाज में लौटने का अवसर मिलना चाहिए।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि न्याय व्यवस्था का मकसद क्रूर प्रतिशोध नहीं बल्कि सुधार और पुनर्वास होना चाहिए। हाईकोर्ट ने एक दोहरे हत्याकांड के दोषी की समयपूर्व रिहाई याचिका खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया और मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है।
यह मामला एक ऐसे दोषी से जुड़ा है जिसे वर्ष 1998 में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। दोषी 20 वर्ष से अधिक की सजा काट चुका है और रियायत भी पूरी कर चुका था। इसके बावजूद राज्य स्तर की समिति ने सितंबर 2025 में उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग ठुकरा दी थी और मामले को आगे के लिए टाल दिया था।
हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणियां करते हुए कहा कि क्रूर प्रतिशोध को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता और भावनाओं के आधार पर कठोर दंड को बढ़ावा देना उचित नहीं है। न्याय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि सुधार करना भी है।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली का लक्ष्य सुधार और पुनर्वास है और अपराध को व्यक्ति से अलग करके देखने की जरूरत है। यदि दोषी सुधार कर सकता है तो उसे समाज में लौटने का अवसर मिलना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि कुछ कैदियों को रिहाई देना और समान स्थिति वाले अन्य को नहीं देना गलत है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पुनर्विचार करते समय कैदी के जेल में आचरण, अपराध की गंभीरता, सामाजिक पृष्ठभूमि और पैरोल के दौरान व्यवहार को देखा जाए। कोर्ट ने कहा कि यह मान लेना गलत है कि रिहा होने पर हर दोषी बदला लेगा। एक सभ्य समाज में दोषी को अपनी गलती समझने और सुधारने का अवसर मिलना चाहिए।
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यह मामला एक ऐसे दोषी से जुड़ा है जिसे वर्ष 1998 में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। दोषी 20 वर्ष से अधिक की सजा काट चुका है और रियायत भी पूरी कर चुका था। इसके बावजूद राज्य स्तर की समिति ने सितंबर 2025 में उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग ठुकरा दी थी और मामले को आगे के लिए टाल दिया था।
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हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणियां करते हुए कहा कि क्रूर प्रतिशोध को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता और भावनाओं के आधार पर कठोर दंड को बढ़ावा देना उचित नहीं है। न्याय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि सुधार करना भी है।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली का लक्ष्य सुधार और पुनर्वास है और अपराध को व्यक्ति से अलग करके देखने की जरूरत है। यदि दोषी सुधार कर सकता है तो उसे समाज में लौटने का अवसर मिलना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि कुछ कैदियों को रिहाई देना और समान स्थिति वाले अन्य को नहीं देना गलत है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पुनर्विचार करते समय कैदी के जेल में आचरण, अपराध की गंभीरता, सामाजिक पृष्ठभूमि और पैरोल के दौरान व्यवहार को देखा जाए। कोर्ट ने कहा कि यह मान लेना गलत है कि रिहा होने पर हर दोषी बदला लेगा। एक सभ्य समाज में दोषी को अपनी गलती समझने और सुधारने का अवसर मिलना चाहिए।