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हालात : तीन साल से कागजों में दौड़ रही योजना, महिलाएं कुएं के दूषित पानी को उबालकर कर रही इस्तेमाल
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पंचकूला। मोरनी खंड के कई गांवों में गर्मी शुरू होते ही पानी के लिए मारामारी शुरू हो गई है। 1.07 करोड़ की योजना तीन सालों से कागजों में दौड़ रही है, जबकि गांव के लोग रोजाना कुएं तक की दौड़ लगा रहे हैं। जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर बसे करीब छह गांवों के हालात इस कदर खराब होने लगे हैं कि अप्रैल में ही ग्रामीण दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। सबसे बुरा हाल तूरों सुखावास का है, जहां पहाड़ी के नीचे एक पुराना कुआं है।
उस कुएं से कीचड़युक्त पानी पीने के लिए गांव के सैकड़ों लोग विवश हैं। इस गंदे पानी के लिए भी महिलाएं सुबह से दोपहर तक दौड़ लगाती रहती हैं। उपरली और नीचली तूरों, तूरों खोड़, डाकवाला सहित कई गांवों में अप्रैैल, मई और जून तक इन गांवों के करीब ढाई से तीन हजार लोग टैंकर के पानी पर निर्भर रहते हैं। इन गांव तक पहुंचने वाला सरकारी पेयजल योजना धरातल पर पहुंचने के दो साल बाद भी कागजों में दौड़ लगा रहा है।
कागजों में डेढ़ करोड़ की योजना
मोरनी खंड के गांवों में साल 2019 में पानी पहुंचाने के लिए उपरली तूरों में एक ट्यूबवेल लगवाया गया। ट्यूबवेल से उपरली और निचली तूरों, तूरों सुखावास, तूरों खोड़, डाकवाला तक पानी पहुंचाने के लिए पाइप लाइन बिछाया जाना था, लेकिन तीन सालों में प्रोजेक्ट ने रफ्तार नहीं पकड़ी और लोगों के घरों तक पेयजल नहीं पहुंच पाया। इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब एक करोड़ सात लाख रुपये खर्च किया जाना था, जिसमें ट्यूबवेल सहित करीब 12 किलोमीटर तक बिछाया जाने वाला पानी का पाइप लाइन शामिल है।
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गर्मियों में इन गांवों में भी है पेयजल संकट
तूरों सुखावास में पेयजल की गंभीर समस्या है। शेरज्वायन, बाड़ीवाला, थापलपुर, चुहड़पुर में लोग अप्रैल से ही पेयजल की समस्या से परेशान होने लगे हैं। यहां ग्रेविटी के पानी के सहारे लोगों की जिंदगी कट रही है। मई और जून में तो पानी का टैंकर मंगवाना पड़ता है। खेतों में लोग कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जो पानी में मिल जाता है। यह सेहत के लिए खतरनाक है। इन गांवों के लिए भी स्थायी पेयजल का बंदोबस्त होना चाहिए। - जय सिंह, पूर्व सरपंच
हमारे गांव में भी जल नल योजना की दरकार है। यहां की महिलाएं सुबह से शाम तक पानी के लिए कुआें पर दौड़ लगाती रहती हैं। गांव के लोगों के बीच पानी के लिए रोजाना हाहाकार मचता है। कुएं का पानी भी गंदा है। इसे उबालकर पीना पड़ता है। - जगीरो देवी, तूरों सुखावास।
साफ पानी के लिए घर से एक से दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अप्रैल, मई और जून में तो यहां सबका बुरा हाल होता है। हमारे गांव में तो रास्ता भी नहीं है, कि जिला प्रशासन का टैंकर यहां तक पहुंच सके। हमारी तो कुएं के गंदे पानी के सहारे जिंदगी कट रही है। - अमरो देवी, तूरों निवासी।
हमारे गांव में समस्याओं की भरमार है, लेकिन गर्मी के दिनों में सबसे ज्यादा परेशानी पेयजल की होती है। सरकारी जल नल योजना गांव से करीब तीन से चार किलोमीटर दूर है। - मुख्तार, तूरों निवासी
तूरों गांव में पेयजल पहुंचाने के लिए पाइप लाइन बिछाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, अभी पानी स्टोर करने के लिए टैंक बनाया जा रहा है। टैंक का निर्माण होते ही पाइप लाइन बिछाने का काम शुरू होगा। - विकास लाठर, एक्सईएन पब्लिक हेल्थ।
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उस कुएं से कीचड़युक्त पानी पीने के लिए गांव के सैकड़ों लोग विवश हैं। इस गंदे पानी के लिए भी महिलाएं सुबह से दोपहर तक दौड़ लगाती रहती हैं। उपरली और नीचली तूरों, तूरों खोड़, डाकवाला सहित कई गांवों में अप्रैैल, मई और जून तक इन गांवों के करीब ढाई से तीन हजार लोग टैंकर के पानी पर निर्भर रहते हैं। इन गांव तक पहुंचने वाला सरकारी पेयजल योजना धरातल पर पहुंचने के दो साल बाद भी कागजों में दौड़ लगा रहा है।
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कागजों में डेढ़ करोड़ की योजना
मोरनी खंड के गांवों में साल 2019 में पानी पहुंचाने के लिए उपरली तूरों में एक ट्यूबवेल लगवाया गया। ट्यूबवेल से उपरली और निचली तूरों, तूरों सुखावास, तूरों खोड़, डाकवाला तक पानी पहुंचाने के लिए पाइप लाइन बिछाया जाना था, लेकिन तीन सालों में प्रोजेक्ट ने रफ्तार नहीं पकड़ी और लोगों के घरों तक पेयजल नहीं पहुंच पाया। इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब एक करोड़ सात लाख रुपये खर्च किया जाना था, जिसमें ट्यूबवेल सहित करीब 12 किलोमीटर तक बिछाया जाने वाला पानी का पाइप लाइन शामिल है।
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गर्मियों में इन गांवों में भी है पेयजल संकट
तूरों सुखावास में पेयजल की गंभीर समस्या है। शेरज्वायन, बाड़ीवाला, थापलपुर, चुहड़पुर में लोग अप्रैल से ही पेयजल की समस्या से परेशान होने लगे हैं। यहां ग्रेविटी के पानी के सहारे लोगों की जिंदगी कट रही है। मई और जून में तो पानी का टैंकर मंगवाना पड़ता है। खेतों में लोग कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जो पानी में मिल जाता है। यह सेहत के लिए खतरनाक है। इन गांवों के लिए भी स्थायी पेयजल का बंदोबस्त होना चाहिए। - जय सिंह, पूर्व सरपंच
हमारे गांव में भी जल नल योजना की दरकार है। यहां की महिलाएं सुबह से शाम तक पानी के लिए कुआें पर दौड़ लगाती रहती हैं। गांव के लोगों के बीच पानी के लिए रोजाना हाहाकार मचता है। कुएं का पानी भी गंदा है। इसे उबालकर पीना पड़ता है। - जगीरो देवी, तूरों सुखावास।
साफ पानी के लिए घर से एक से दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अप्रैल, मई और जून में तो यहां सबका बुरा हाल होता है। हमारे गांव में तो रास्ता भी नहीं है, कि जिला प्रशासन का टैंकर यहां तक पहुंच सके। हमारी तो कुएं के गंदे पानी के सहारे जिंदगी कट रही है। - अमरो देवी, तूरों निवासी।
हमारे गांव में समस्याओं की भरमार है, लेकिन गर्मी के दिनों में सबसे ज्यादा परेशानी पेयजल की होती है। सरकारी जल नल योजना गांव से करीब तीन से चार किलोमीटर दूर है। - मुख्तार, तूरों निवासी
तूरों गांव में पेयजल पहुंचाने के लिए पाइप लाइन बिछाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, अभी पानी स्टोर करने के लिए टैंक बनाया जा रहा है। टैंक का निर्माण होते ही पाइप लाइन बिछाने का काम शुरू होगा। - विकास लाठर, एक्सईएन पब्लिक हेल्थ।