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सजा नहीं, सुधार का रास्ता: हाईकोर्ट ने जेल की जगह प्रोबेशन और 50 पेड़ लगाने का दिया आदेश
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दंड व्यवस्था को सुधारवादी न्याय की दिशा में आगे बढ़ाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस विनोद एस भारद्वाज ने कहा कि आधुनिक सजा सिद्धांत में अपराधी और अपराध करने वाले व्यक्ति में फर्क करना जरूरी है। हर गलती करने वाले को सुधार से परे मानकर कठोर दंड देना न्याय की भावना के अनुरूप नहीं।
इसी सोच को आधार बनाते हुए अदालत ने एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में दोषी को दो वर्ष की कठोर कारावास की जगह दो वर्ष की प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही दोषी को 50 स्वदेशी पेड़ लगाने और उनकी पांच साल तक देखभाल करने का निर्देश दिया गया है। यदि वह पांच वर्ष की देखभाल का खर्च वहन नहीं कर सकता तो उसे वन विभाग में अनस्कील्ड वर्कर के श्रम-मानक के अनुसार काम करके इसकी भरपाई करनी होगी।
जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं बल्कि समाज की सुरक्षा और अपराधी का सुधार है। उन्होंने दंड के तीन स्तंभ प्रतिशोध, निवारण और सुधार के संतुलित उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि यह संतुलन न्यायिक विवेक, सामाजिक मूल्यों और नैतिक मानकों का सामंजस्य है। किसी व्यक्ति का अपराध में शामिल होना उसे स्वत: अपराधी नहीं बना देता। अपराध करने की परिस्थितियां उसका सामाजिक-आर्थिक और मानसिक व्यवहार, उसके जीवन की पृष्ठभूमि ये सभी कारक बताते हैं कि वह सुधार की संभावना रखता है या नहीं।
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मामले में याचिकाकर्ता की उम्र दुर्घटना के समय 21 वर्ष 11 महीने थी और उसके पहले या बाद में कोई आपराधिक इतिहास नहीं पाया गया। कोर्ट ने माना कि यह घटना मानवीय भूल का परिणाम थी, न कि किसी दुर्भावना या आपराधिक मानसिकता का। जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि न्यायालय यह अनुमान नहीं लगा सकता कि हर दोषी सुधार से परे है। जब अपराध केवल एक भूल का परिणाम हो, तब समाज में पुनर्वासित करने का प्रयास दंड से अधिक उपयुक्त होता है।
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इसी सोच को आधार बनाते हुए अदालत ने एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में दोषी को दो वर्ष की कठोर कारावास की जगह दो वर्ष की प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही दोषी को 50 स्वदेशी पेड़ लगाने और उनकी पांच साल तक देखभाल करने का निर्देश दिया गया है। यदि वह पांच वर्ष की देखभाल का खर्च वहन नहीं कर सकता तो उसे वन विभाग में अनस्कील्ड वर्कर के श्रम-मानक के अनुसार काम करके इसकी भरपाई करनी होगी।
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जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं बल्कि समाज की सुरक्षा और अपराधी का सुधार है। उन्होंने दंड के तीन स्तंभ प्रतिशोध, निवारण और सुधार के संतुलित उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि यह संतुलन न्यायिक विवेक, सामाजिक मूल्यों और नैतिक मानकों का सामंजस्य है। किसी व्यक्ति का अपराध में शामिल होना उसे स्वत: अपराधी नहीं बना देता। अपराध करने की परिस्थितियां उसका सामाजिक-आर्थिक और मानसिक व्यवहार, उसके जीवन की पृष्ठभूमि ये सभी कारक बताते हैं कि वह सुधार की संभावना रखता है या नहीं।
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मामले में याचिकाकर्ता की उम्र दुर्घटना के समय 21 वर्ष 11 महीने थी और उसके पहले या बाद में कोई आपराधिक इतिहास नहीं पाया गया। कोर्ट ने माना कि यह घटना मानवीय भूल का परिणाम थी, न कि किसी दुर्भावना या आपराधिक मानसिकता का। जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि न्यायालय यह अनुमान नहीं लगा सकता कि हर दोषी सुधार से परे है। जब अपराध केवल एक भूल का परिणाम हो, तब समाज में पुनर्वासित करने का प्रयास दंड से अधिक उपयुक्त होता है।