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प्रदेश में तय होगी न्यूनतम मजदूरी, संशोधित होगा डीसी रेट
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चंडीगढ़। हरियाणा सरकार सभी श्रेणियों के श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय करने जा रही है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने प्रदेश के विभिन्न जिलों के डीसी रेट में संशोधन करने का निर्णय लिया है। मुख्य सचिव के नेतृत्व में सामान्य प्रशासन विभाग सभी श्रेणियों और जिलों के लिए डीसी रेट तय करेगा।
मुख्यमंत्री ने बताया कि इससे इन दरों को युक्तिसंगत बनाया जा सकेगा और कर्मचारियों को लाभ होगा। डीसी रेट अकुशल (अनस्किल्ड), अर्द्घकुशल (सेमिस्किल्ड) और कुशल श्रमिकों (स्किल्ड) की मजदूरी है। इसे डीसी की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति तय करती है। सरकार ने इस मामले की समीक्षा कर न्यूनतम मजदूरी व जिला विशेष उपभोक्ता मूल्य के सिद्धांतों पर डीसी रेट तय करने का निर्णय लिया है। डीसी रेट का प्रारंभिक उद्देश्य आसानी से उपलब्ध श्रम दर होना है। इसका उपयोग समय की कमी के कारण निविदाओं को आमंत्रित न कर पाने, आपातकालीन स्थिति में श्रमिकों को लगाने आदि के लिए किया जा सकता था।
डीसी रेट में किराये के आवास का मूल्य, सब्जी की कीमतें, स्कूल शुल्क दरें आदि शामिल हैं। प्रदेश में जिलों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। श्रेणी-ए में गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और सोनीपत, श्रेणी-बी में पानीपत, झज्जर, पलवल, करनाल, अंबाला, हिसार, रोहतक, रेवाड़ी, कुरुक्षेत्र, कैथल, यमुनानगर, भिवानी, जींद व श्रेणी-सी में महेंद्रगढ़, फतेहाबाद, सिरसा, नूंह और चरखी दादरी शामिल हैं।
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मजदूरी समूह के अनुसार डीसी रेट ग्रुप-बी (स्किल्ड), ग्रुप सी-1 (सेमिस्किल्ड नॉन टेक्निकल), ग्रुप सी-2 (सेमिस्किल्ड 2-टेक्निकल) और ग्रुप डी (अनस्किल्ड) पर लागू होगा। मुद्रास्फीति के साथ तालमेल बनाये रखने के लिए सालाना 5 प्रतिशत की वृद्धि इस रेट में की जा सकेगी। डीसी रेट को युक्तिसंगत बनाने का मामला कुछ समय से राज्य सरकार के विचाराधीन था। उन्होंने बताया कि डीसी रेट का निर्धारण जिला विशेष और मुख्य रूप से प्रचलित न्यूनतम मजदूरी व जिला विशेष श्रम दरों पर आधारित हैं। सभी जिलों में मजूदरी की दरों में काफी अंतर है। डीसी दरों में वृद्धि न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि के अनुपात में नहीं होने के कारण या तो बहुत अधिक या बहुत कम है। मुद्रास्फीति आदि जैसे मापदंडों के आधार पर डीसी रेट में संशोधन अभी संस्थागत नहीं है।
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मुख्यमंत्री ने बताया कि इससे इन दरों को युक्तिसंगत बनाया जा सकेगा और कर्मचारियों को लाभ होगा। डीसी रेट अकुशल (अनस्किल्ड), अर्द्घकुशल (सेमिस्किल्ड) और कुशल श्रमिकों (स्किल्ड) की मजदूरी है। इसे डीसी की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति तय करती है। सरकार ने इस मामले की समीक्षा कर न्यूनतम मजदूरी व जिला विशेष उपभोक्ता मूल्य के सिद्धांतों पर डीसी रेट तय करने का निर्णय लिया है। डीसी रेट का प्रारंभिक उद्देश्य आसानी से उपलब्ध श्रम दर होना है। इसका उपयोग समय की कमी के कारण निविदाओं को आमंत्रित न कर पाने, आपातकालीन स्थिति में श्रमिकों को लगाने आदि के लिए किया जा सकता था।
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डीसी रेट में किराये के आवास का मूल्य, सब्जी की कीमतें, स्कूल शुल्क दरें आदि शामिल हैं। प्रदेश में जिलों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। श्रेणी-ए में गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और सोनीपत, श्रेणी-बी में पानीपत, झज्जर, पलवल, करनाल, अंबाला, हिसार, रोहतक, रेवाड़ी, कुरुक्षेत्र, कैथल, यमुनानगर, भिवानी, जींद व श्रेणी-सी में महेंद्रगढ़, फतेहाबाद, सिरसा, नूंह और चरखी दादरी शामिल हैं।
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मजदूरी समूह के अनुसार डीसी रेट ग्रुप-बी (स्किल्ड), ग्रुप सी-1 (सेमिस्किल्ड नॉन टेक्निकल), ग्रुप सी-2 (सेमिस्किल्ड 2-टेक्निकल) और ग्रुप डी (अनस्किल्ड) पर लागू होगा। मुद्रास्फीति के साथ तालमेल बनाये रखने के लिए सालाना 5 प्रतिशत की वृद्धि इस रेट में की जा सकेगी। डीसी रेट को युक्तिसंगत बनाने का मामला कुछ समय से राज्य सरकार के विचाराधीन था। उन्होंने बताया कि डीसी रेट का निर्धारण जिला विशेष और मुख्य रूप से प्रचलित न्यूनतम मजदूरी व जिला विशेष श्रम दरों पर आधारित हैं। सभी जिलों में मजूदरी की दरों में काफी अंतर है। डीसी दरों में वृद्धि न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि के अनुपात में नहीं होने के कारण या तो बहुत अधिक या बहुत कम है। मुद्रास्फीति आदि जैसे मापदंडों के आधार पर डीसी रेट में संशोधन अभी संस्थागत नहीं है।