Khelo India Youth Games: कोई पिता का कर्ज तो कोई गरीबों के लिए अकादमी खोलने को बना खिलाड़ी, प्रेरणादायक है इनकी कहानी
एक तरह खेल के मैदान में स्वर्णिम इतिहास रचते हैं तो दूसरी तरफ परिवार की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। इनमें प्रदेश की बेटियां भी बेटों से कम नहीं हैं। कोई अपने भाई का पढ़ाई का खर्च उठा रहा है तो कुछ खिलाड़ी खेल में बेहतर प्रदर्शन के जरिए सरकारी नौकरी पाकर अपने पिता का कर्ज चुकाना चाहते हैं।
विस्तार
अगर जिंदगी को जिंदादिली से जीना है, तो खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने पहुंचे हरियाणा के खिलाड़ियों से सीखिए। वे अथक प्रयासों से अपनी मंजिल तक पहुंचने के साथ अपने माता-पिता के अधूरे सपनों को भी पूरा कर रहे हैं। एक तरह खेल के मैदान में स्वर्णिम इतिहास रचते हैं तो दूसरी तरफ परिवार की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। इनमें प्रदेश की बेटियां भी बेटों से कम नहीं हैं। कोई अपने भाई का पढ़ाई का खर्च उठा रहा है तो कुछ खिलाड़ी खेल में बेहतर प्रदर्शन के जरिए सरकारी नौकरी पाकर अपने पिता का कर्ज चुकाना चाहते हैं। वहीं एक खिलाड़ी गरीब बच्चों के लिए अकादमी खोलना चाहता है, ताकि उसके जैसे तमाम बच्चों को अपने मंजिल का चुनाव करने के लिए भटकना नहीं पड़े।
गांव की अकादमी बंद हुई तो पिता ने बढ़ाया हौसला
खेलो इंडिया यूथ गेम्स की सेक्टर-14 के गवर्नमेंट गर्ल्स पीजी कॉलेज में वेट लिफ्टिंग के 55 किलो भारवर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली रोहतक की गांव मोरखेड़ी की उषा देश की लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने लगातार तीसरी बार खेलो इंडिया यूथ गेम्स में पदक जीता है। रोहतक की बेटी खेल में देश का नाम तो रोशन कर रही है, अपने पिता की जिम्मेदारियां भी पूरी कर रही हैं। उषा ने बताया कि उसे हर माह दस हजार रुपये स्कालरशिप मिलती है। उन पैसों से अपने छोटे भाई रमन की पढ़ाई का खर्च उठाती हैं। खुद 2024 में ओलंपिक में देश के लिए पदक और अपने भाई को सेना का अधिकारी बनाना चाहती हैं। उषा ने बताया कि उसके पिता सुरेंद्र कुमार इलेक्ट्रीशियन हैं। उसकी मां सपना हाउस वाइफ हैं।
उषा ने बताया कि खेल उसने इसलिए चुना है कि उसके गांव में सिर्फ वेट लिफ्टिंग ही सिखाया जाता है। करीब तीन से चार साल पहले गांव की अकादमी अचानक बंद हो गई। उस समय उसकी हिम्मत डगमगा गई, घर से बाहर जाकर ट्रेनिंग करने के लिए पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। उस समय पिता ने हौसला बढ़ाया और उषा उठ खड़ी हुई। दिल्ली में राजस्थान के राजगढ़ स्थित उर्मिला स्पोर्ट्स अकादमी के लिए ट्रायल दिया और वहां उसका चयन हो गया। जहां उसे फ्री में रहने और खाने के साथ ट्रेनिंग की भी सुविधा मिली। धीरे -धीरे वह आगे बढ़ती गई और आज वर्तमान में लखनऊ के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में 2024 में होने वाले ओलंपिक की ट्रेनिंग कर रहीं हैं।
ऑटो चालक के बेटे ने जीता स्वर्ण, पिता का कर्ज चुकाने के लिए बनेगा कोच
योगासन में आर्टिस्टिक ग्रुप के लड़कों के वर्ग में हिसार निवासी सागर ने अंडर-18 आयुवर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया है। सागर के पिता प्रदीप कुमार ऑटो चलाते हैं। सागर ने अपने माता-पिता के लिए कई सपने बुने हैं। वह सरकारी कोच बनकर अपने पिता का लाखों रुपये का कर्ज चुकाना चाहता है। उसने बताया कि उसके पिता ने अपनी दोस्त की बेटी की शादी के लिए अपने क्रेडिट पर बैंक और कुछ लोगों से ब्याज पर पैसे लेकर दिए थे, लेकिन वह लौटा नहीं पाए। अब उसके पिता कर्ज में डूब गए हैं। पूरे दिन ऑटो चलाते हैं तो बड़ी मुश्किल से सात से आठ सौ रुपये कमा पाते हैं। कुछ बैंक की किस्त में कट जाता और कुछ कर्ज चुकाने में। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता है। ऐसे में गुरुग्राम के सरकारी स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले सागर ने खेल के रूप में योग को चुना, ताकि आगे चलकर कोच बनकर पिता का कर्ज चुका सकें। इसमें डाइट का बहुत ज्यादा रोल नहीं है। बॉडी फ्लेक्सिबल होनी चाहिए। पैसे के अभाव के चलते सागर ने दूसरे खेलों की जगह योग पर फोकस किया। इससे पहले नेशनल में दो बार स्वर्ण और एक बार सिल्वर व राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में चार बाद स्वर्ण पदक जीत चुका है।