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Panchkula News: मां के सहमति संबंध साथी के डीएनए टेस्ट का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द
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चडीगढ़। मानसा की लड़की की याचिका मंजूर करते हुए मानसा की फैमिली कोर्ट द्वारा उसकी मां के सहमति संबंध साथी रहे याचिकाकर्ता के डीएनए टेस्ट करवाने के आदेश को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि याची को पिता साबित करने के लिए उसे डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
मानसा निवासी व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि मानसा की फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2022 में याचिकाकर्ता का डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया है जो सही नहीं है। लड़की ने फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उसकी मां और याचिकाकर्ता सहमति संबंध में रहते थे। इस दौरान याचिकाकर्ता उसे अपनी बेटी मानता था। 2015 में दोनों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए थे और याची ने उसे बेटी मानने से भी इन्कार कर दिया।
2017 में उसने फैमिली कोर्ट में केस दाखिल किया और कहा कि वह सहमति संबंध से पैदा हुई है और ऐसे में याची की बेटी का उसे दर्जा मिलना चाहिए। उसकी मां ने गुजारा भत्ते के लिए केस भी दाखिल किया था। याची उसका पिता है यह साबित करने के लिए उसने डीएनए टेस्ट करवाने का आदेश जारी करने की अपील की थी। फैमिली कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए याची का डीएनए टेस्ट करवाने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
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जस्टिस अलका सरीन ने कहा कि डीएनए टेस्ट के संबंध में कानून स्पष्ट है। भारत में अदालतें सामान्य रूप से डीएनए परीक्षण का आदेश नहीं देती हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के समक्ष दोनों पक्ष पहले ही सबूत पेश कर चुके हैं। ऐसे में अब कथित बेटी का केस मजबूत करने के लिए डीएनए टेस्ट करवाने की अनुमति देना सही नहीं है और याची को इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
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मानसा निवासी व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि मानसा की फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2022 में याचिकाकर्ता का डीएनए टेस्ट करने का आदेश दिया है जो सही नहीं है। लड़की ने फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उसकी मां और याचिकाकर्ता सहमति संबंध में रहते थे। इस दौरान याचिकाकर्ता उसे अपनी बेटी मानता था। 2015 में दोनों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए थे और याची ने उसे बेटी मानने से भी इन्कार कर दिया।
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2017 में उसने फैमिली कोर्ट में केस दाखिल किया और कहा कि वह सहमति संबंध से पैदा हुई है और ऐसे में याची की बेटी का उसे दर्जा मिलना चाहिए। उसकी मां ने गुजारा भत्ते के लिए केस भी दाखिल किया था। याची उसका पिता है यह साबित करने के लिए उसने डीएनए टेस्ट करवाने का आदेश जारी करने की अपील की थी। फैमिली कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए याची का डीएनए टेस्ट करवाने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
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जस्टिस अलका सरीन ने कहा कि डीएनए टेस्ट के संबंध में कानून स्पष्ट है। भारत में अदालतें सामान्य रूप से डीएनए परीक्षण का आदेश नहीं देती हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के समक्ष दोनों पक्ष पहले ही सबूत पेश कर चुके हैं। ऐसे में अब कथित बेटी का केस मजबूत करने के लिए डीएनए टेस्ट करवाने की अनुमति देना सही नहीं है और याची को इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।