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गुरशरण सिंह

Tue, 17 Sep 2019 02:27 AM IST
Panchkula bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Tue, 17 Sep 2019 02:27 AM IST
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gurshran singh
चंडीगढ़। ओ धरती वांगू बोल्या.. दीवारां वांगू नई बोल्या, वो साजां वांगू बोल्या, हथियारा वांगू नई बोल्या.. यह हैं पद्मश्री सुरजीत पातर। उनकी यह चार लाइनें सुप्रसिद्ध नाटककार गुरशरण सिंह को एकदम बयां कर जाती हैं। पद्मश्री सुरजीत पातर ही नहीं, कई प्रसिद्ध नाटककारों और साहित्यकारों ने एक ही मंच से गुरशरण सिंह की 90वीं जयंती पर उनको शिद्दत के साथ याद किया। मौका था पंजाब कला भवन में सोमवार को पंजाब संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित नेशनल थियेटर सेमिनार और तीन दिवसीय थियेटर फेस्टिवल का।
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पहले दिन प्रसिद्ध नाटककार और एनएसडी के पूर्व निर्देशक राम गोपाल बजाज मुख्य अतिथि थे। इस मौके पर पद्मश्री नीलम मान सिंह, पद्मश्री बंसी कौल, डा. स्वराज बीर भी मौजूद रहे। इस मौके पर पद्मश्री सुरजीत पातर ने कहा कि वास्तव में गुरशरण सिंह का कोई सानी नहीं। उन्होंने पंजाब में संकट के समय में भी एक जलती लौ की तरह काम किया। वास्तव में उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ भी आवाज उठाई और पुलिस के खिलाफ भी। उन्होंने एक सच्चे नाटककार की तरह ही काम किया। उन्होंने कहा कि काफी लोग व्यवस्था से डरते हैं पर गुरशरण सिंह के साथ ऐसा नहीं रहा। इसी वजह से उन्होंने यह चार लाइनें गुरशरण सिंह को समर्पित कीं।
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इस मौके पर मौजूद नीलम मान सिंह ने कहा कि वह भोपाल में एक मीटिंग अटेंड करने गईं थीं। उस मीटिंग में उनको गुरशरण सिंह मिले। वास्तव में वहां बड़े-बडे़ राइटर आए थे और उन्होंने जब एक पंजाबी को देखा तो उन्होंने उनसे मुलाकात की और उसके बाद जब उनके बारे में मालूम हुआ तो कई बातों को जाना। उन्होंने कहा कि गुरशरण सिंह जैसा नाटककार देखा नहीं।
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इस मौके पर पद्मश्री बंसी लाल ने कहा कि वास्तव में गुरशरण सिंह नुक्कड़ नाटक के लिए जाने जाते थे। उनके नाटकों में दिखावा कम होता था और समाज की कुरीतियों पर सीधा कटाक्ष होता था। उन्होंने कहा कि ऐसा साहित्यकार और नाटककार शायद ही मिले।

एक ही मुलाकात में समझा दिया सब
प्रसिद्ध फिल्म आर्टिस्ट पद्मश्री राम गोपाल बजाज ने कहा कि वास्तव में गुरशरण सिंह के साथ काम करने का मजा एकदम अलग था। उन्होंने कहा कि वह पंजाब में आए थे और उनको एक नाटक करना था। वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। ऐसे ही वह चिंता में थे तो उनको एक व्यक्ति मिले और कहा कि टैगोर पर नाटक करें या न करें, इस बात का फैसला कल करेंगे। दूसरे दिन जब वह वहां उनसे मिलने पहुंचे तो गुरशरण सिंह ने उनको एक शेर सुनाया और उसके बाद कहा कि अब जो चाहें करें। बस शेर उनके मन में ऊर्जा भर गया और उन्होंने रबींद्र नाथ टैगोर पर यहां नाटक कर डाला। इस मौके पर राम गोपाल बजाज ने कहा कि अब थियेटर बदलने लगा है, लेकिन अभी भी स्कूलों और कालेजों के साथ थियेटरों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। तभी काम ज्यादा बेहतर हो सकेगा।
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